गुरु वन्दना

(१. गुरु वन्दना)

प्रमाणित विधि से लिखा तरुण ने ज्ञानमार्ग का ये विधान ।

सेवा तन्मय ज्ञान ख़ातिर सदा प्रधान करुणानिधान् ॥

हर् वाक्य गूढ़ अर्थ वेद सरि का धारा प्रबाह कला ।

वृष्टि प्रेमिल ज्ञान, सत्य पहचान, शीतल सुमधुर गला ।।

सम्पूर्ण गुरु क्षेत्र है पटल में इन को चुना क्षेत्र ने ।

प्रज्ञा दीपक शीर में सरस्वती, निश्वार्थ प्रेम नेत्र में ॥

प्रक्षेपित सभा प्रत्यक्ष मुनि से जो बोधिवार्ता मिला ।

सत्य प्रकट सामने जगत का मिथ्या धरोहर हिला ॥

प्राणी मार्ग विहीन थी भ्रमित थी, मार्ग, गुरू जो मिले ।

खोजी पूर्ण हुआ हटा दुख पीड़ा, आनन्द के गुल खिले ॥

ख़ाली अंजलि प्यास आश बूँद को सागर् खींचा भर दिया । 

बेचैनी मन व्यग्र था, मलिन था, ज्ञानाग्नि ने हर दिया ॥

उन्हीं के पदमार्ग में अविचलित् चल्ना सदा साथ में ।

जो लक्ष्य गुरु का अनुशरण हो उन्मुक्ति के आश में ॥

दूश्रा जन्म दिया बना जनक वो पैदा हुईं जानकी ।

मेरा जीवन धन्य जो गुरु मिले तरुण प्रधान जी ॥

अध्यात्म पथ आप के निकट में है फूलके रास्ते ।

पंछी घोंसल छोड़ के गुम न हो उड़ान के वास्ते ॥

ये शिष्या शरणागति दुर्बल है कृपा करुणा भरें ।

थामा जीवन मुक्ति हेतु कृपया नैया किनारा करें🙏






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