प्रमाणित विधि से लिखा तरुण ने ज्ञानमार्ग का ये विधान ।
सेवा तन्मय ज्ञान ख़ातिर सदा प्रधान करुणानिधान् ॥
हर् वाक्य गूढ़ अर्थ वेद सरि का धारा प्रबाह कला ।
वृष्टि प्रेमिल ज्ञान, सत्य पहचान, शीतल सुमधुर गला ।।
सम्पूर्ण गुरु क्षेत्र है पटल में इन को चुना क्षेत्र ने ।
प्रज्ञा दीपक शीर में सरस्वती, निश्वार्थ प्रेम नेत्र में ॥
प्रक्षेपित सभा प्रत्यक्ष मुनि से जो बोधिवार्ता मिला ।
सत्य प्रकट सामने जगत का मिथ्या धरोहर हिला ॥
प्राणी मार्ग विहीन थी भ्रमित थी, मार्ग, गुरू जो मिले ।
खोजी पूर्ण हुआ हटा दुख पीड़ा, आनन्द के गुल खिले ॥
ख़ाली अंजलि प्यास आश बूँद को सागर् खींचा भर दिया ।
बेचैनी मन व्यग्र था, मलिन था, ज्ञानाग्नि ने हर दिया ॥
उन्हीं के पदमार्ग में अविचलित् चल्ना सदा साथ में ।
जो लक्ष्य गुरु का अनुशरण हो उन्मुक्ति के आश में ॥
दूश्रा जन्म दिया बना जनक वो पैदा हुईं जानकी ।
मेरा जीवन धन्य जो गुरु मिले तरुण प्रधान जी ॥
अध्यात्म पथ आप के निकट में है फूलके रास्ते ।
पंछी घोंसल छोड़ के गुम न हो उड़ान के वास्ते ॥
ये शिष्या शरणागति दुर्बल है कृपा करुणा भरें ।
थामा जीवन मुक्ति हेतु कृपया नैया किनारा करें🙏
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