प्रतियोगिता
प्रतियोगिता
सांसारिक जीवन में क्षमता, योग्यता, बल, बुद्धि आदि में विजय-पराजय के मनसा से अपने आप को दूसरों से तुलना करना और दूसरों को हराने का प्रयत्त करना, आपस में प्रतिस्पर्धा करना प्रतियोगिता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सृष्टि चक्र ही माया है तो प्रतियोगिता माया के उपर का माया है, दोहरी तेहरी माया है।
सुख
सुख
सुख क्या है?
सुख चित्त निर्मित एक मिथ्या अनुभव है जो कर्म के प्रतिक्रिया स्वरूप शारीरिक और मानसिक रुपमें क्षणिक तुष्टि दिलाता है, चित्त द्वारा कर्म के पुरस्कार के रुपमें मिलता है। दुःख का अभाव सुख है, लेकिन संसार में दुःख का अभाव सम्भव नहीं है, सुख-दुःख दोनों माया है। सुख-दुःख के परे जो मुक्ति है, वो आनंद वास्तविक सुख है।
कर्म
कर्म
कर्म का अर्थ क्या है?
व्यवहारिक स्तर में जीव के “कर” द्वारा जो गतिविधियाँ होते है उसको कर्म कहते हैं। आध्यात्मिक स्तर पर माया के सभी लीलाएँ या विश्वस्मृति में जो भी प्रक्रियाएँ चल रहे हैं वो सब कर्म ही है। सू्र्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षेत्रों का गति; पंचमहाभूत कि गति; शरीर कि गति; मन कि गति आदि सब कर्म ही हैं।
निर्धनता
निर्धनता
निर्धनता का अर्थ क्या है?
सामान्य अर्थ में जीवन जीने के लिए धन का अभाव होना निर्धनता है। निर्धनता सापेक्षिक शब्द है। व्यक्ति, समाज, देश के विकासस्तर अनुसार निर्धनता के अलग-अलग परिभाषा हो सकता है। धन सम्पत्ति केवल रुपये पैसे, भौतिक साधन आदि नहीं है। स्वास्थ्य ख़ुशी, सुख, मानसिक शांति, आध्यात्मिक चेतना, आनंद ही वास्तविक धन संपत्ति है। इनका अभाव होना ही निर्धनता है।
खोज
खोज
खोजका अर्थ क्या है?
कोई भी विषय से सम्वन्धित जानकारी प्राप्त करनेके लिए उस विषय के सभी आयाम के गहराईं तक पहूँचकर सत्य तत्य पता लगाना ही खोज है। खोज आध्यात्मिक और अनेक सांसारिक विषयों में हो सकते है लेकिन स्वयं को जानने के लिए जो खोज किया जाता है वही सब से बडा खोज है। खोज ही ज्ञान का बिज है।
समर्पण
समर्पण
समर्पणका अर्थ क्या है?
पूर्ण रुपमें श्रद्धा, विश्वास एवं प्रेम के साथ मन, वचन और कर्म सहित अपना स्वामित्व किसि में अर्पन करके एक हो जाना ही समर्पण है।
गुरु
गुरु
गुरु का अर्थ क्या है?
मनुष्यों को अज्ञान के अन्धकार से मुक्त करनेवाला, गुरुक्षेत्रका प्रतिनिधि गुरु है, जो व्यक्ति के रुपमें अवतरित होता है। व्यक्ति एवं समाज में जो अज्ञान है, गुरुके ज्ञान प्रकाश और संकेत से दूर होता है। अनेक प्रकार के गुरु में से अन्धकारका नाश करके स्वयं से मिलाकर मुक्तिके मर्ग में ले जानेवाला गुरु सद्गुरु होता है।
जीवनमुक्त
जीवनमुक्त
स्वयं को यानि कि सत्य को जाननेवाला जीवनमुक्त है। जो आत्मज्ञान प्राप्त करके जीवित अवस्था में ही सांसारिक माया और बन्धनों से स्वतन्त्र है वही जीवनमुक्त है । सांसारिक विषय सुख में आसक्ति ना होना सत्य और मिथ्या को जानना ही जीवनमुक्ति है । जिसने जीवन मृत्यु के मिथ्या खेल को समझ लिया वो जीवनमुक्त है।