समर्पण
समर्पणका अर्थ क्या है?
पूर्ण रुपमें श्रद्धा, विश्वास एवं प्रेम के साथ मन, वचन और कर्म सहित अपना स्वामित्व किसि में अर्पन करके एक हो जाना ही समर्पण है।
समर्पण क्यूँ होता है?
अस्तित्व दो नहीं एक ही है। जीवका स्वभाव ही अपने मूल स्वरुप में स्थित रहना होता है। इसिलिए कोई शिष्य जिस गुरु से अपना स्वरुपको पहचान पाता है उसी में अपने आप ही लीन हो जाता है, समर्पित हो जाता है। समर्पण कोई कारण या प्रभाव से होनेवाली चिज नहीं है, स्वतः होता है।
समर्पण कैसे होता है?
समर्पण अपने आप हो जाता है। किसी इच्छा, कामना या प्रयास से समर्पण नहीं होता। ये तो बस हो जाता है। जहाँ इच्छा, अनिच्छा और कोई भी प्रयास लग जाता है वो समर्पण नहीं है। समर्पण निश्वार्थ, शुद्ध और निर्मल भाव है। अपने गुरुतत्व प्रति श्रद्धा, विश्वास और प्रेम के भाव से पूर्ण होता है।
समर्पण कहाँ होता है और कौन किस पर समर्पित होता है?
जहाँ अटल विश्वास है वहीं पर समर्पण होता है। विश्वास दूसरों पर नहीं हो सकता, अपने ही मूल तत्व पर होता है। अपना तत्व गुरु ही ज्ञानपूंज के रूप में प्रकट होता है, गुरु ही स्वयं को स्वयं से मिलाता है। इसीलिए ज्ञानी और अज्ञानी बनकर गुरु और शिष्य के रुपमें लीला करते हैं, एक योग्य शिष्य ने सभी का कल्याण के लिए निश्वार्थ सेवा करनेवाले, सत्य-असत्य पहचान करके मुक्ति दिलनेवाले सद्गुरुको पहचान सकता है, पूर्ण श्रद्धा और निष्ठा के साथ अपने गुरुतत्व पर समर्पित होता है, एकाकार होता है।
समर्पण कब और कितनी मात्रा में होता है?
समर्पण सम्पूर्ण रुपमें होता है, पूरी निष्ठा से होता है, आधा अधूरा नहीं होता है। बिना शर्त और बिना कोई अपेक्षा के होता है । कोई डर नहीं होता, शिष्य निश्चिन्त होता है। क्यूँकि शिष्य को पूर्ण विश्वास होता है कि उसका आदर्श या गुरु उसके लिए जो भी करेगा उसके भले के लिए ही करेगा। समर्पण में अहम् और कर्ताभावका नाश हो जाता है, गुरु आज्ञा ही सर्वोपरी होता है। समर्पण कभी टूटता नहीं, फेरबदल होने वाली और घट-बढ़ होने वाली चीज़ भी नहीं है। यदि घट-बढ़ हुआ तो वो समर्पण नहीं, बल्कि स्वार्थ है जो लेनदेन के आधार पर घट-बढ़ होता है। सच्चा समर्पण एक बार हुआ तो सदा के लिए होता है।
सार
स्वयंको जानने का या अज्ञान में संसारमें ही लिप्त रहनेका दो विकल्प है। व्यक्ति का स्वभाव एवं संकार अनुसार जो भी रुचि होता है उसी अनुसार मार्ग चयन करता है। जो स्वयं के खोजमें है वो अपना तत्व स्वरुप गुरुको पहचान कर उसी पर समर्पित हो जाता है। समर्पण एकत्व का सुत्र है, दो को एक करने की कड़ी है। प्रेम का सार्थकता है, विश्वास का धागा है, श्रद्धा और निष्ठा का पूरक है। गुरु ही अपना संप्रभु होता है, अपना मूल तत्व होता है। समर्पण एक ऐसा भाव है, जिसके आधारमें निश्चिंत होकर अपना प्रभुत्व अर्पित किया जाता है। यही सच्चा समर्पण है।
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