निर्धनता

निर्धनता 

निर्धनता का अर्थ क्या है?

सामान्य अर्थ में जीवन जीने के लिए धन का अभाव होना निर्धनता है। निर्धनता सापेक्षिक शब्द है। व्यक्ति, समाज, देश के विकासस्तर अनुसार निर्धनता के अलग-अलग परिभाषा हो सकता है। धन सम्पत्ति केवल रुपये पैसे, भौतिक साधन आदि नहीं है। स्वास्थ्य ख़ुशी, सुख, मानसिक शांति, आध्यात्मिक चेतना, आनंद ही वास्तविक धन संपत्ति है। इनका अभाव होना ही निर्धनता है।

संसार में निर्धनता क्यूँ है?

निर्धनता के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन अज्ञानता ही सबका मूल जड है। लोभ लालच एवं आसक्ति से असीमित अपेक्षाएँ एवं आवश्यकताएँ होतें है। समसामयिक पर्यावरणीय परिवेश, घटना परिघटना एवं रोग व्याधी, न्यून आर्थिक गतिविधि एवं आर्थिक मंदी के कारण समग्र आर्थिक क्षेत्र प्रभावित होता है। हिंसा एवं असुरक्षा, भ्रष्टाचार एवं अनैतिकता, विभेद अन्याय अत्याचार एवं शोषण दमन सामाजिक विचलन विखंडन अनुसासनहीनाता, सांस्कृतिक उच्छृङ्खलता के कारण न्यायोचित वितरण नहीं हो पाता। व्यक्ति में आलसीपना निष्क्रियता, बेरोजगारी आदि के कारण सांसारिक निर्धनता है। 

बेचैनी, भड़काव, सही लक्ष्य मार्ग और गुरु का ना मिलना, अस्थिर मनस्थिति, आध्यात्मिक निरक्षरता, बुद्धिहीनता, चेतना विहीनता, परंपरागत सोच विचार, मान्यताएँ, धारणाएं संकीर्ण मानसिकता आदि कारण आध्यात्मिक ग़रीबी के लिए जिम्मेदार हैं।

सांसारिक और आध्यात्मिक क्षेत्रमें निर्धनता का क्या प्रभाव पडता है?

निर्धनता से व्यक्ति के जीवन में अनेक नकारात्मक और बुरे प्रभाव पढ़ते है, प्रगति रुक जाता है। न्यूनतम आधारभूत आवश्यकता पूरा न होने पर व्यक्ति को कुपोषण, दुर्बलता, अशक्तता, अनेक रोग व्याधि आदि ने घेर लेता है। व्यक्ति का जीवन कष्ट कर होता है, असामयिक मृत्यु, परिवार और समाज में कलह, झगड़ा, वैमनस्यता, शत्रुता, व्यभिचार, हिंसा आदि बढ़ जाता है। व्यक्ति, परिवार, समाज, देश गरीबी के कुचक्र में फंस जाता है। उन्नति और विकास पीछे छुट जाता है। व्यक्ति का ध्यान जीने में ही केन्द्रित हो जाता है। आध्यात्मिक विकास की तरफ ध्यान ही नहीं जाता। मुक्ति तो दूर अनेक जन्मों तक सांसारिक दलदल में ही भटकता रहता है।

निर्धन कौन है और कहाँ कितना निर्धनता है ये कैसे पता चलता है?

निर्धनता सापेक्षिक विषय है। किसी के लिए खाना, कपड़ा, वासस्थान जैसे न्यूनतम आधारभूत आवश्यकताओं का परिपूर्ति करने के लिए भी कठिन होना निर्धनता है और किसी के लिए बड़े बड़े घर, महल, कल कारखाना, उद्योग व्यवसाय ना होना निर्धनता हो सकता है। जहाँ सहजता और आत्म निर्भरता से आधारभूत आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पाते, आर्थिक गतिविधि न्यून है, अशान्ति और कलह है वहाँ निर्धनता व्याप्त है। देशव्यापी और विश्वस्तर में निर्धनता मापन के अपने-अपने मानदण्ड होते है। इन मानदण्डों को विश्लेषण करके निर्धारित गरीबी का रेखा (Poverty Line) से निचे का आय स्तर होनेवाले सभी को निर्धन माना जाता है। यदि आध्यात्मिक स्तर से देखें तो न्यून बुद्धि, चेतना का ना होना, सुख शांति आनंद ना होना ही निर्धनता है। जिसमें मूलज्ञान नहीं है स्वयंको नहीं जाना है वो निर्धन है।

निर्धनता को कब और कैसे हटाया जा सकता है? 

निर्धनता से मुक्ति पाने के लिए ज्ञान ही कड़ी है।  जब शिक्षा, ज्ञान और चेतना बढ जाता है तब सभी कार्य चेतना में होने लगेंगे। चेतना में अनावश्यक कुछ नहीं होता है, जो भी कार्य होंगें, सार्थक और सफल होंगें। सार्थक कार्य का अर्थपूर्ण प्रतिफल आता है। आर्थिक गतिविधिओं का विस्तार, उद्योग धन्दा, कलकारखाना प्रविधि आदि के विकास से वितरण प्रणाली सुदृढ होता है। सभी के लिए अवसर उपलब्ध होतें हैं। सुरक्षा एवं स्थिरता होने से उत्तरजीविता के गतिविधि निर्वाध रुपसे स‌ंचालन हो पाते हैं। 

आसक्ति छूट जाने से व्यक्ति न्यूनतावादी होता है। उसके आवश्यकता सीमित होते हैं। सीमित आवश्यकता पूरा करने में अधिक कठिनाई नहीं होता। वाणी, बुद्धि, विचार, चेतना शुद्ध हो जाता है। शुद्धिकरण से आस पास के सभी वातावरण मैत्रीपूर्ण होंगे। इससे सर्वत्र आय आर्जन, रोजगारी आदि उत्तरजीविता के आवश्यक अवसर एवं रास्ते खुलने लगेंगे और निर्धनता से सहज मुक्ति मिल जाएगा।

सार

समाजमें जब समानता और सामाजिक न्याय कायम होता है तब सभी में “बसुधैव कुटुम्वकम्” का भावना जागृत होता है। सभी में मेरा ही तत्व, मेरा ही रुप दिखाई देता है। एकत्वका भाव आ जाता है। जो सक्षम है वो दूसरों के उत्तरजीविता और प्रगति में सहायक बन सकता है। आध्यात्मिक चेतना से शरीर स्वस्थ हो जाता है। सक्रियता और स्फुर्ती बढ़ जाता है, व्यक्ति सक्षम हो जाता है। अस्तित्व में सभी गतिविधियों का चक्रीय प्रभाव होता है। यदि एक क्षेत्र में सुधार हो जाये तो सभी में सुधार शुरु होता है। व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से देश, देश से जगत में सुधार का प्रभाव पढ़ता है। 

सांसारिक सुव्यवस्था के कारण उत्तरजीविता सहज होते ही व्यक्ति का ध्यान आध्यात्मिक उन्नति के तरफ बढ़ जाता है। जब आध्यात्मिक चेतना विकसित हो जाता है तब सभी स्तर में समृद्धि आता है। नैतिकता, सदाचार बढ़ जाता है। भ्रष्टाचार, असमानता, अशांति, अस्थिरता दूर होते हैं। शांति, मैत्री, समानता, सुरक्षा सुदृढ होता है। यहीं से सांसारिक सुख और आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग खुल जाता है। यही सुधारका चक्रीय प्रभाव निर्धनता से मुक्तिका उपाय है। ये सब व्याख्या व्यवहारिक स्तर पर है। अस्तित्व में समृद्धि और निर्धनता दोनों है और दोनों का अभाव भी है, जो है पूर्ण और सुन्दर है।

 


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