खोज

खोज


खोजका अर्थ क्या है?

कोई भी विषय से सम्वन्धित जानकारी प्राप्त करनेके लिए उस विषय के सभी आयाम के गहराईं तक पहूँचकर सत्य तत्य पता लगाना ही खोज है। खोज आध्यात्मिक और अनेक सांसारिक विषयों में हो सकते है लेकिन स्वयं को जानने के लिए जो खोज किया जाता है वही सब से बडा खोज है। खोज ही ज्ञान का बिज है।


खोज करना क्यूँ आवश्यक है?

सत्य जानने के लिए खोज करना आवश्यक है। सांसारिक उत्तरजीविता में समाजद्वारा अनेक मान्यताएँ थोपे जाते हैं। उन मान्याताओं को आँख बन्द करके अबलम्वन किया जाता है। यदि उन मान्यताओं पर प्रश्न न किया जाए तो वही सही लगने लगता है और इस भ्रम ने ज्ञान को ढक लेता है। यही भ्रम और अज्ञान हटाकर सत्य जानने के लिए खोज करना आवश्यक है।


खोज कैसे किया जाता है?

प्रश्न ही खोज का आधार है। हर मान्यताओं और धारणाओं पर कमसेकम सात प्रश्न लगाकर उन प्रश्न का उत्तर खोजना सही और सरल विधि है। जिस विषय पर खोज किया जा रहा है उस अनुसार अलग-अलग विधि एवं प्रक्रिया हो सकते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्रमें स्वयंके खोज के लिए नेति नेति विधिका प्रयोग किया जाता है। स्वयं के बारेमें जो भी मान्यताएँ थी मैं नाम हूँ, सम्बन्ध हूँ, वस्तु हूँ, शरीर हूँ, मन हूँ आदि आदि एक एक करके हटाया जाता है। अत्य में जो बचता है वही मैं हूँ वही सत्य है यही खोजका परिणाम है। चाहे आध्यात्मिक हो या सांसारिक हो हर खोज में जिज्ञासा होना आवश्यक है। अपरोक्ष अनुभव और तर्क का प्रयोग ही उस विषय का सत्य ढूँढने का सही रास्ता है। खोज के लिए बचपन से ही जिज्ञासा जागृत रखना आवश्यक है। बुद्धि और जिज्ञासा जागृत रखने के लिए सम्पूर्ण ज्ञान एक साथ नहीं देना है, केवल बिज डालना है, खोजी के द्वार खुली रखना चाहिए। संकेत मात्र करना है, आधा बताना है; बाक़ी साधक ने स्वयं खोज लेना चाहिए।


खोज कब और कहाँ करना आवश्यक है?

जब किसी व्यक्ति में स्वयं को जानने कि इच्छा होती है तब वो सही मार्ग और गुरु के खोज में लग जाता है। गुरु से ही स्वयं के खोज के लिए एक सही दिशा मिलता है। जबतक स्वयंको नहीं जान लेता आत्मज्ञान, ब्रम्हज्ञान और मायाज्ञान नहीं होता, तबतक खोज जारी रहता है। ज्ञान होनेके बाद खोज समाप्त हो जाता है लेकिन उस ज्ञान में स्थित रहना आवश्यक है। खोज अन्यत्र कहीं नहीं स्वयं में ही होता है। स्वयं का खोज ही अस्तित्व का खोज है। स्वयं को जान लेना ही अस्तित्व को जान लेना है।


कौन कितना खोज करता है?

कोई भी मुमुक्षु और जिज्ञासु साधक अपने बुद्धि और ज्ञान के स्तर अनुसार सत्यका खोज कर के सही समय में खोजका परिणाम प्राप्त कर लेता है। खोज क्रमबद्ध होता है लेकिन जब खोज का चरण पूरा होता है तब बुद्धि के सीमा और अज्ञेयता के स्तर तक खोज का पूरा परिणाम आना चाहिए। सत्य आधा अधूरा नहीं होता, सम्पूर्णरुपसे होता है। 


सार

खोज के द्वारा ही अज्ञान हटाना और सत्यको जानना सम्भव है। व्यक्ति में जिज्ञासा, उत्सुकता, सही दिशा निर्देश करनेवाला गुरु और दृढ संकल्प है तो खोजका सही परिणाम अवश्य आता है। सही गुरु ही खोज के लिए उपयुक्त संकेत देते हैं। उन संकेतों का डोर को पकड़ते हुए शिष्य सत्य तक पहूँच जाता है। सत्य को खोजकर स्वयं को पा लेता है।






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