सुख
सुख क्या है?
सुख चित्त निर्मित एक मिथ्या अनुभव है जो कर्म के प्रतिक्रिया स्वरूप शारीरिक और मानसिक रुपमें क्षणिक तुष्टि दिलाता है, चित्त द्वारा कर्म के पुरस्कार के रुपमें मिलता है। दुःख का अभाव सुख है, लेकिन संसार में दुःख का अभाव सम्भव नहीं है, सुख-दुःख दोनों माया है। सुख-दुःख के परे जो मुक्ति है, वो आनंद वास्तविक सुख है।
जीव सुख क्यूँ चाहता है?
जीव हमेशा दुःख से मुक्ति पाना चाहता है, इसीलिए, नैतिक, अनैतिक जो भी कर्म करके सुख ही पाना चाहता है। परन्तु अस्तित्व में केवल सुख ही नहीं, सिक्के के दूसरे भाग में दुःख भी है। दुःख है तब न सुख का महत्व पता चलता है। मिथ्या ही सही हर जीव सुखद मिथ्या चाहता है। केवल जीव ही नहीं प्रतिकूल और कष्टकर परिस्थितियों में तो वनस्पति भी नहीं उगते।
सुख कहाँ और कैसे मिलता है?
सुख-दुःख अस्तित्व के पूर्णता का भाग है, अस्तित्व में ही है। चित्त निर्मित अनुभव है, इसीलिए जिसका चित्त अज्ञान में फँसा है वो शारीरिक, मानसिक परिश्रम के बिना, दूसरों को दुख दे कर जैसे भी हो सुख भोगना चाहता है। हर चीज़ में, हर कर्म में, हर क्षण में सुख ही चाहता है, लेकिन सुख है तो माया, किसी चीज़ में नहीं मिलता, इसीलिए इधर-उधर भटकता रहता है। अज्ञानको हटाकर स्विकार भावमें अपने सत्य स्वरुपमें स्थित रहने से और आसक्ति का त्याग करने से सुख मिलता है।
सुख कब और किसको मिलता है?
सुख क्षणिक है, परिवर्तनशिल है, फिर भी नित्य है। सुख दुःख का चक्र घुमता रहता है। जब रोज़ी रोटी नहीं होता तब रोज़ी रोटी में सुख है, जब वो मिला तब घर गाड़ी चाहिए, वो भी मिला तो और अधिक चाहिए। ये चाहत का सिलसिला कभी भी अन्त्य नहीं होता, तृप्त नहीं होता, क्यूँकि मनुष्य को जो चाहिए वो पहचाना ही नहीं है। जितना भी सुख मिले व्यक्ति को सन्तोष नहीं होता, क्यूँकि ये माया का स्वभाव ही है। जब जीवका कर्मफल उसकी अपेक्षा अनुरूप आता है तब वो सुख का मिथ्या अनुभव करता है। अज्ञान से भरे संसार में कोई सुखी नहीं है और ज्ञान युक्त आध्यात्मिक जीवन में सुख ही सुख है।
किस चीज में कितना सुख है?
सुख केवल सत्य जानने में है बाक़ी कोई चीज़ में सुख नहीं है। जो चीज़ से आज सुख मिला है कल वही कटु हो जाता है, कष्टकर हो जाता है, दूसरा चाहत होता है। मिथ्या और क्षणिक सुख में मात्रा या मापन का कोई अर्थ नहीं है, जहाँ सच में सुख है वहाँ कम या ज्यादा नहीं होता पूर्णता में सुख मिलता है।
सार
सुख माया के खेल का गोटी है, जाल है। मनुष्य इसी में फँसे रहना चाहता है। जीसने तृप्ति का तत्व पहचान पाया, उसने जो भी है उसी में सर्वस्व पा लिया, वो पा लिया जिससे आगे पाने के लिए कुछ भी नहीं है। सुख भोग में नहीं त्याग में है, मुक्ति में है, जो सुख-दुःख से परे है वही मुक्त है। मुक्त ही आनन्द में है, आनन्द ही सुख का लक्ष्य है।
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