गुरु

गुरु 


गुरु का अर्थ क्या है?

मनुष्यों को अ‌ज्ञान के अन्धकार से मुक्त करनेवाला, गुरुक्षेत्रका प्रतिनिधि गुरु है, जो व्यक्ति के रुपमें अवतरित होता  है। व्यक्ति एवं समाज में जो अज्ञान है, गुरुके ज्ञान प्रकाश और संकेत से दूर होता है। अनेक प्रकार के गुरु में से अन्धकारका नाश करके स्वयं से मिलाकर मुक्तिके मर्ग में ले जानेवाला गुरु सद्गुरु होता है। 


गुरु क्यूँ आवश्यक है?

मानव चित्त अपने बुद्धिके द्वारा माया के मिथ्या खेलको समझने, अज्ञान से निकल कर अपना सत्य स्वरुपको जानने का स्तर तक विकसित हुआ है। ये बात गुरुको ही पता होता है। अपना सत्य स्वरुप दिख पाने के लिए गुरु कि आवश्यकता है। आत्मज्ञान लेकर उस ज्ञान में स्थित होते रहने के लिए शिष्यों का कोई भी अवस्था को पहचान कर, समझकर सद्गुरू ही वहाँ से उपर उठा सकता है।


गुरु कौन और कितने हैं?

जीवन के हर क्षण में जिससे जो भी सीखने को मिलता है वो सब में गुरु के गुण होते हैं, जैसे कि नदी, पहाड़, हिमालय, जंगल, पत्थर जानवर, किट, पतंग आदि से भी गुरुक्षेत्र द्वारा निःसृत ज्ञान ही मिलता है। एक व्यक्ति के जीवन में विभिन्न उम्र और समय क्रम में अनेकों से कुछ न कुछ सिखनेको मिलता है लेकिन सद्गुरु एक ही होता है। गुरु स्वयं अस्तित्व है।


सही गुरुका पता कैसे लगाया जाए? और गुरु अज्ञानको कैसे दूर कर सकता है?

व्यक्ति स्वयं में कितनी अज्ञान, जिज्ञासा, मुक्ति कि इच्छा, आध्यात्मिकता में रुचि, लगाव, और क्षमता है इन सवालों का विश्लेषण करके ही सही गुरुका पता लगाया जा सकता है। समर्पण और मुमुक्षत्व व्यक्ति को सदुगुरुके पास पहूँचा सकता है। जिसको सुनने में आनन्द मिलता है, जिज्ञासा समाप्त हो जाते हैं, अपनापनका महसूस होता है, अज्ञात अधूरापन मिट जाता है, और दिल से अपना कर स्वयं में पूर्णताका आभास होता है वही सही गुरु है। जिससे गुण मिले उसको ही गुरु बनाना चाहिए । साधक में ज्ञान के स्तर अनुसार उचित समय में सही गुरु मिलता है।


गुरु ज्ञान नहीं थोपता, व्यक्ति स्वयं का अपरोक्ष अनुभव और तर्क के माध्याम से अज्ञानको हटाकर सत्य को पहचान करने योग्य बना देता है। बुद्धि, ज्ञान, बाचन और संचार कौशलता, धैर्य, विवेक, व्यक्तिका मनोदशा की समझ, सामाजिक ज्ञान, आदि से युक्त होता है। प्रगति और मुक्ति के लिए अनेक साधनाद्वारा उपाय खोजता रहता है। अपनी कुशलता से गुरुक्षेत्र में ज्ञानका जो श्रोत है, भण्डार है, उसको सही ढंग से संयोजन और व्यवस्थापन करके प्रत्यक्षीकरण करता है। दुःख कष्ट झेल कर भी अनेक उपाय खोज करके शिष्यों को मुक्ति दिलवाता है। प्रत्यक्ष गुरु-साधक वार्ता, छलफल एवं प्रश्नोतर करके, अप्रत्यक्ष रुपमे किसी भी रुप में प्रकट होकर, कैसै प्रगति हो रही है उसको परीक्षा समिक्षा एवं मूल्यांकन करके, परोक्ष एवं अपरोक्ष रुपसे साधकको विभिन्न कृपा करके, आवश्यकतानुसार उपयुक्त उपाय सुझाव एवं सबक़ सिखा के भी अज्ञानका नास करवाने और मुक्ति दिलवाने में हर क्षण दत्तचित्त रहता है।


गुरु कब और कहाँ मिलता है?

अस्तित्व में स्वयं को जानने कि क्षमता होता है, यही क्षमता गुरु मार्फत प्रकट होता है। इसिलिए गुरु हर समय और स्थान में है। प्रकट-अप्रकट जिस रुपमें आवश्यक है उसी रुप में शिष्यों के साथ होता है। गुरुलोक, आश्रम, समाज, सांसारिक गतिविधि, अनलाइन सत्संग, ईमेल इन्टरनेट आदि प्रविधियों का उपयोग आदि जो भी आवश्यक और उपयुक्त हो वो सब करके जहां से भी ज्ञान ही प्रसार करता है। शिष्यों को गुरु की आवश्यकता जहां जहां होता है वहाँ वहाँ होता है गुरु, कहीं प्रेरणा बनके, कहीं हौसला बनके, कहीं मार्गदर्शक बनके, कहीं आदर्श बनके, कहीं सहयात्री बनकर शिष्यों के मन में प्रकट होता है। 


सार

गुरु सर्वश्रेष्ठ है, सम्माननीय है। किसि घटना के रुपमे, वस्तु के रुप में, जीव के रुपमें, व्यक्ति के रुपमें, मुनि के रुपमें, चित्त के रुपमें, स्थान के रुपमें, समय के रुपमें आदि विभिन्न रुपों में प्रकट होकर आत्मज्ञान, मायाज्ञान और ब्रम्हज्ञान तक लेकर जाता है। सत्य तत्व दिखाकर वहाँ तक पहुँचा देता है जहां ज्ञानका सीमा ही समाप्त हो जाता है, जहाँ से आगे जानने के लिए कुछ नहीं बचता। जहाँ केवल मुक्ति है वहाँ पर गुरुशिष्य सम्पूर्णता में मिल जाते हैं, विलय हो जाते हैं। गुरु स्वयं ब्रम्ह है।

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