कर्म

कर्म


कर्म का अर्थ क्या है?

व्यवहारिक स्तर में जीव के “कर” द्वारा जो गतिविधियाँ होते है उसको कर्म कहते हैं। आध्यात्मिक स्तर पर माया के सभी लीलाएँ या विश्वस्मृति में जो भी प्रक्रियाएँ चल रहे हैं वो सब कर्म ही है। सू्र्य, चन्द्र, ग्रह, नक्षेत्रों का गति; पंचमहाभूत कि गति; शरीर कि गति; मन कि गति आदि सब कर्म ही हैं। 


कर्म क्यू है?

नाद में निहित चक्रीय परिवर्तन और गति के कारण ही कर्म प्रतीत होता है, परन्तु नाद स्वयं एक परिकल्पना है। इसलिए अद्वैत के स्तर पर कोइ कर्म नहीं। माया के स्तर में ब्रम्ह का नाद ही कर्म का मूल है, वही कारण भी है। इसीलिए कर्म का प्रयोजन खोजना निरर्थक है। व्यवहारिक स्तर पर उत्तरजीविता सरल बनाने के लिए, उत्तरदायित्व निभाने के लिए, इच्छा पूर्तिके लिए कर्म होते है। जो भी असल या ख़राब कार्य होते हैं उसका कर्मफल के द्वारा पुनर्जन्म या मुक्ति प्राप्त करने के लिए, समाज में व्यवस्था एवं अनुशासन क़ायम रखने के लिए कर्म और कर्ता का मिथ्या नाम देना आवश्यक होता है ।


कर्म कैसे है?

अस्तित्व में माया के स्तर पर कर्म का कोई विधि या प्रक्रिया नहीं है। जो भी हो रहा है वो स्वयं ही हो रहा है। नादका परिणाम मात्र है। नाद, प्रक्रिया (कर्म) कर्मफल, संकार और पुनः यही प्रक्रिया कर्म के रुपमें बारबार दोहोराता रहता है। व्यवहारिक स्तर पर जीवनवृति चलाने के लिए मनोशरीर यन्त्र कठपुतलि के तरह चलता रहता है और अहम् वृत्ति उसीको अपना कर्म मान लेता है।


कर्म कब, कहाँ और कितने होते है?

अद्वैत में कोई कर्म नहीं। माया में जहाँ जो भी लीलाएँ और गतिविधियाँ चल रहे हैं वो सब कर्म है; तो कर्म कोई समय और स्थान के अधिन नहीं है। कर्म नित्य, निरन्तर और सर्वत्र है। जो भी कर्म होता है वो पूर्व निर्धारित है और वही कर्मफल के अनुसार निरन्तर दोहराता रहता है। कर्म को संख्या या परिमाण में मापा नहीं जा सकता। यदि व्यवहारिक स्तर पर देखा जाए तो जब व्यक्ति में जीवित रहने के लिए और इच्छा पूर्ति के लिए कुछ आवश्यकता या वासना उत्पन्न होता है उस समय जो स्थूल या सुक्ष्म कर्म उसके सामने प्रकट होता है तब वो कर्म करता है। जितनी उसकी इच्छाएँ है और संस्कार पड़े हैं उतने ही कर्म होते हैं। प्रक्रियाएँ अनन्त है, संस्कार अनन्त है, लीलाएँ अनन्त है। 


कर्म कौन करता है? कर्म किसका है?

कर्ता कोई नहीं और कर्म किसी का नहीं है; लेकिन माया के खेल रूपी कर्म में जो प्रत्यक्ष रूप से सहभागी होता है, समाज के द्वारा उस खेल को कर्म और खेलाडि को कर्ता भाव थोप दिया जाता है। अहम् भाव के कारण उस गतिविधि को कर्म और अपने आप को कर्ता मान लेता है। कर्मफल और उत्तरदायित्व लेने के लिए ये जरुरी भी है।

 

सार

माया के स्तर पर विश्वस्मृति के हर परत में चलने वाले गतिविधि कर्म है। सभी परत में अपने अपने गतिविधियाँ चलते हैं। यही प्रक्रिया (कर्म) के अनुसार माया का लीला चल रहा है। विकासक्रम आगे बढ़ाने के लिए कर्म जरुरी है। इसीलिए सभी नामरुप माया के लीला या खेल में सहभागी है। यन्त्रवत रुपमें क्रियाशील है, कर्म करते हुए प्रतीत होते हैं । अंत में कर्म और कर्ता कोई नहीं होता, शून्यता में निहित अनंत सम्भावना और माया के खेल के अनुसार सब अपने आप चल रहा है ।


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