प्रतियोगिता
सांसारिक जीवन में क्षमता, योग्यता, बल, बुद्धि आदि में विजय-पराजय के मनसा से अपने आप को दूसरों से तुलना करना और दूसरों को हराने का प्रयत्त करना, आपस में प्रतिस्पर्धा करना प्रतियोगिता है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से सृष्टि चक्र ही माया है तो प्रतियोगिता माया के उपर का माया है, दोहरी तेहरी माया है।
अज्ञान के कारण संसार में हर जीव प्रतियोगिता में लिप्त है। हर क्षेत्र, हर समय में प्रतियोगिता है। सारे सुख-सुविधा, पद-प्रतिष्ठा आदि उपलब्धी दूसरों से ज्यादा मुझे ही मिले, मैं ही हर क्षेत्र में दूसरों सें आगे बढ़ूँ, सभी लोग मुझे ही सम्मान करें, मैं किसी से कम ना होना पड़े, ये भाव सभी अज्ञानी जीव में पाया जाता है। ये जीव का स्वभाव है और उचित मात्रा में आवश्यक भी है, नहीं तो उत्तरजीविता संभव भी नही होता। “जीने के लिए संघर्ष” सिद्धान्त भी यही कहता है, लेकिन “मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ और दूसरे कुछ नहीं” ये सोच मानसिक दरिद्रता है, मनोविकार है।
प्रतियोगिता नैतिक अनैतिक दोनों तरिके से होता है। खेलकुद में मनोरंजन के लिए प्रतियोगिता का आयोजन को नैतिक माना जाता है। राजनीति प्रशासन व्यवसाय जहाँ योग्यता सिद्ध करना आवश्यक है, अयोग्य से काम करवाना नुक़सानदायक हो सकता है वहाँ प्रतियोगिता ज़रूरी है, परन्तु स्वस्थ प्रतियोगिता होना चाहिए, अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा हानिकारक है। जीवन के अधिकाशं गतिविधि में अनैतिक प्रतियोगिता पायी जाती है। कोई किसी विषय में प्रगति करके आगे बढ़ना लगे तो उसको अनेक अवरोध खड़ा करके, अनेक षडयन्त्र करके दूसरोंको गिराकर, स्वयं को आगे जाने के लिए साम दाम दण्ड भेद आदि उपाय करके भी हर क्षण प्रतियोगिता का ही माहौल बना रहता है। ये सर्वथा अनुचित है।
प्रतियोगिता हर क्षेत्र में होता है। राजनीति में, प्रशासन में, खेलकुद में, उद्योग व्यापार व्यवसाय में, प्रविधिमें, आर्थिक विकास में, आणविक अस्त्र-सस्त्र बनाने में, यहाँतक कि अध्यात्म में भी प्रतियोगिता का भाव दिखाई पड़ता है। मेरा मार्ग श्रेष्ठ, मेरे गुरु श्रेष्ठ, मैं श्रेष्ठ ऐसा भाव होता है। स्वयं को सर्वश्रेष्ठ अधिपति और दूसरोंको तिनका बराबर समझ लेते हैं।
अस्वस्थ प्रतियोगिता अज्ञान का लक्षण है। जिसमें ज्ञान नहीं है उसे ही स्वयं और दूसरे भिन्न लगते हैं, प्रतियोगिताका भाव आता है। जो ज्ञानी है वो तो सभी को स्वयंका ही रुप जान लेता है। सभी रुप एक ही है तो किस से प्रतियोगिता करना? जब सभी का उन्नति होगा तब ही मेरा उन्नति सभव है। “यदि दूसरे दुःख में है, अभाव में है, अज्ञान में है तो मैं कैसे सुखी हो सकता हूँ” ये ज्ञानीका स्वभाव है। एक ज्ञानी ही सभी के प्रगति के लिए प्रयत्न करता है। प्रतियोगिता का नहीं प्रेमका भाव रखता है। प्रेम से सभीका मन जीता जा सकता है। ज्ञान से अज्ञान और दुःख को जिता जा सकता है, विनम्रता से ही श्रेष्ठता मिलता है, प्रतियोगिता से नहीं।
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