परिवर्तन

परिवर्तन 

परिवर्तनका अर्थ क्या है ?

अनुभवों को एक रूप से दूसरे रूप में बदलने का भ्रमपुर्ण प्रक्रिया ही परिवर्तन है। रचना और विनाश का आधार परिवर्तन है। जो जीव और जीवन के लिए उपयोगी परिवर्तन है उसको रचना कहा जाता है। जो उपयोगी नहीं है उसको विनाश कहा जाता है, लेकिन ये परिवर्तनका ही निरन्तरता है। 


परिवर्तन क्यूँ होता है ?

परिवर्तन ही नादका नियम है। इसिलिए ऐसा ही होता है, परिवर्तनका अन्य कोई कारण नहीं है। माया में परिवर्तन अवश्यम्भावी है। परिवर्तन नहीं होता तो अनुभव भी नहीं होता। इन्द्रियों ने परिवर्तन को ही पकड पाते है और इसी से हमें अनुभव होता है। अनुभव और परिवर्तन स्मृतियों पर आधारित है, स्मृति में तुलना के कारण ही परिवर्तन दिखता है।


परिवर्तन कितने प्रकार के है और कितने परिमाण में होता है? 

परिवर्तन खण्डित नहीं निरन्तर है, द्वैत और चक्रीय है, अनन्त है। परिवर्तन परिकल्पना है, इसीलिए विज्ञान और प्रयोग के आधार में सरल और जटिल माना गया है। नादका एक अवस्था से निकटतम दूसरे अवस्था में छोटा छोटा परिवर्तन सरल होता है। सरलतम परिवर्तन के लिए न्यूनतम दो अवस्था में परिवर्तन आवश्यक हैl नाद में योग होने से जटिल परिवर्तन होता है, यानि कि दो से अधिक अवस्था का परिवर्तन जटिल होता है।  एक ही अवस्था का परिवर्तन भी जटिल और अर्थहीन हो जाता है, क्या बदल गया सरलता से नहीं जाना जाता। नाद के गति का मात्रा और आवृत्ति के आधार में परिवर्तन का परिमाण और सघनता निर्भर होता है । 


किसमें क्या परिवर्तन होता है ?

सभी अनुभव जगत, शरीर और मन के अनुभव में आते हैं। चर-अचर, जीव, वनस्पति, वस्तु, पदार्थ, जड-चेतन, भौतिक-मानसिक, स्थान, समय आदि सभी अनुभव परिवर्तनशील है। सरल से जटिल परिवर्तन होने वाले अर्थपूर्ण नाद से नादरचनाएँ बनते हैं। इन्हीं नादरचना जीव, वस्तु और मन के अनुभव के रुपमें होते हैं, निरन्तर बदलते हैं, सभी अनुभव क्षणिक है। जो हर अनुभव में और निरन्तर है वो केवल “यही है और इसी में है” ऐसा नहीं कहा जा सकता है।


परिवर्तन होने का प्रक्रिया क्या है ?

मायाके नियम का जो भ्रम और नश्वरता है वो किसी भी प्रक्रियाद्वारा सिद्ध करने से सत्य नहीं हो सकता, फिर भी माया को जानने के लिए प्रतिरुप बनाकर इसी के आधार में अनुभव के परिवर्तनशीलताका अध्ययन किया जाता है। वस्तु नाद रचनाएँ के समूह से बनते हैं। नियमित और धीरे से परिवर्तन होने के कारण स्थाई प्रतीत होते हैं। क्रमशः परिवर्तन होने के कारण कोई भी वस्तु परिवर्तन होने के बाद भी वही वस्तु के रुपमें जाना जाता है। अति शिघ्र परिवर्तन को इन्द्रीयाँ भी नहीं पकड पाते और अनुभव में भी नहीं आते। इंद्रियों से प्रतिक्रिया करने से ही नाद में परिवर्तन प्रतीत होता हैl


स्मृति में नाद का प्रारूप संचित होता है, इसी से परिवर्तन का और अनुभव का पता चलता है। दो स्मृतियों को तुलाना करके परिवर्तन ज्ञात हो जाता है। नियमित नाद रचना में परिवर्तन भी नियमित होता है, और क्या परिवर्तन हुआ है वह भी जाना जा सकता है। स्मृति और नाद पराभौतिक परामानसिक है। स्मृति स्वयं को स्थाई रखने का प्रयत्न करती है, दूसरे से प्रभावित होना नहीं चाहती। इसलिए स्मृति में एक जडत्व होता है, जिसने जल्दी परिवर्तन होने नहीं देता लेकिन सभी अनुभव परिवर्तनशील है, जरा सा भी परिवर्तन पूरा परिवर्तन का प्रमाण है।


परिवर्तन कब होता है ? 

जो अनादि से अनन्ततक निरन्तर है उसको समय सीमा में व्यक्त नहीं किया जा सकता, लेकिन माया में जीवन है इसलीए प्रतिरुप के माध्याम से जाननेका यथासंभव प्रयास किया जाता है। अनुभव और परिवर्तन चाहे वर्तमान में सामने से हो, चाहे स्मृतियों पर आधारित हो, दोनों ही अवस्था पर मिथ्या है। धीरे बदलने वाले वस्तुओं को इन्द्रियों ने बदला दिखाता है। बुद्धि और स्मृति में संचय का कारण स्थायीकरण का भ्रम हो जाता है लेकिन हर अनुभव हरक्षण परिवर्तन होता रहता है, जैसे पानी का उत्पत्ति, बहाव, लहरें और भँवर, जीवों और बनस्पति का विकासक्रम आदि। दो परिवर्तन बीच कितने मात्रा और आवृत्तिका अंतरराल है सो ही आधार में सरल और जटिल रचनाएँ प्रकट होते है। 


परिवर्तन कहाँ होता है ? 

माया में सभी अनुभव मिथ्या प्रकट होता है और सभी परिवर्तनशील है, केवल अनुभवकर्ता ही अपरिवर्तनीय है। यदि परिवर्तन का अवस्थिति स्थानों पर खोजा जाए तो स्थान भी मिथ्या है, परिवर्तनशील है। यदि कहाँ शब्द का प्रयोग अन्य अनुभवों पर किया जाए तो भी प्रकट अस्तित्व के सभी अनुभव में परिवर्तन होता है। इसीलिए परिवर्तन स्थित होने का स्थान नहीं बल्की स्थान और अनुभवका परिवर्तन होता है। 


यही परिवर्तनशीलता या नश्वरता माया का नियम है। हर अनुभव का आधार नाद और इसमें होनेवाले द्वैत एवं चक्रीय परिवर्तन है, जो परिकल्पना मात्र है। यही परिकल्पना से माया का प्रतिरुप बना के मायाका अध्ययन किया जाता है, मायाको जाना जाता है। प्रतिरुप भी परिवर्तन पर आधारित होना चाहिए, तभी मायाका व्याख्या सही हो सकता है। परिवर्तन का अध्ययन, मनन आध्यात्मिक और सांसारिक दोनों क्षेत्र में प्रगति के लिए उपयोगी है । सांसारिक क्षेत्र में बदलाव को देखते हुए उत्तरजीविता क्रमबद्धरुपमें सरलता से आगे बढाया जा सकता है । आध्यात्मिक क्षेत्र में परिवर्तनशीलता के डोर को पकड़ते हुए ही अपरिवर्तनीय सत्य तक पहूँचा जा सकता है ।


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