अनासक्ति

अनासक्ति

अनासक्तिका अर्थ क्या है?

माया-मोह, विषय-वासना, भौतिक सुख-सुविधा, श्रोत-साधन जैसे विषयों के प्रति लिप्त ना होना, सांसारिक चीज़ों को अधिक महत्व ना देना, सांसारिक प्राप्ति को तुच्छ समझकर उनके प्रति लगाव ना होना ही अनासक्ति है। अनासक्ति शब्द आसक्ति का विपरितार्थक है। इस भाव में सांसारिक गतिविधियों से यथासंभव दूर रहा जाता है। सुख सुविधा और सांसारिक प्रगति पर कोई रुचि नहीं होता है। अनासक्त साधक सभी गतिविधियों के प्रति स्विकार भाव में रहता है। अकर्ता भाव में जो कुछ भी हो रहा है वो होने देता है। कर्म करता है लेकिन फल कि आशा नहीं रखता। जो भी इच्छा वासना आता है उसको सचेत द्रष्टा के रुपमें देखता है। उसपर कोई आशा या अभिरुची नहीं रखता। 


किस कारण से अनासक्तिका भाव आता है और ये भाव क्यूँ आवश्यक है?

आत्मज्ञान होने से सत्य और असत्यका पता चलता है। सत्य में आनन्दका अमृत रस पान करने से अन्य सभी सांसारिक सुख-सुविधा तुच्छ लगते हैं; इसी कारण से साधक में अनासक्तिका भाव आता है। ये भाव आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है, क्यूँकि जब कोई व्यक्ति सांसारिक विषय वासना प्रति आसक्त है तो उसी में डुबे रहना चाहेगा और मिथ्या के दलदल में फँसता चला जाएगा। अनासक्ति साधकका बहुत बड़ा और आवश्यक गुण है । अनासक्त होने से सम, दम, तितिक्षा, मुमुक्षत्व जैसे गुणों को बढ़ाया जा सकता है। कोई भी गुणका विकास या शुद्धिकरण दूसरे गुणको बढाने में सहायक होता है, इनमें पूरक सम्बन्ध होता है ।


अनासक्तिका भाव कैसे बढाया जा सकता है?

आत्मज्ञान ही अनासक्त होने का मुख्य उपाय है। साक्षी भाव में रहकर स्वयंका तत्व और सत्य में स्थित होने से अनासक्तिका भाव अपने आप आ जाता है, कोई प्रयास नहीं लगता, अन्य कोई विधि या प्रक्रिया भी मन गढन्त है। क्यूँकि अनुभवकर्ता निर्गुण है, उसको कुछ नहीं चाहिए; फिर भी उस तत्वका छाया जो कुछ भी लीला रचाती है उसको निर्विकार द्रष्टा के रुपमें देखता रहता है। एक जीवको जीनेके लिए जो अति आवश्यक है वो तो होना ही है, और अपने आप हो जाएगा, प्राकृतिक रुपसे ही होता है। उसी में लिप्त होकर अनावश्यक हरकतें करना नहीं पड़ता। इसका प्रमाण अन्य सभी जीव जन्तु है जो कोई आसक्ति के बिना भी सरल जीवन जी रहे हैं। अनासक्त व्यक्ति सभी वृत्तियों को सरलता से, स्विकार भाव से देख लेता है, इच्छा, वासना आए या जाए, पूरा हो या न हो उसको कोई फर्क नहीं पडता । यदि कोई गलत कर्म होनेवाला है तो बुद्धि और चेतना का प्रयोग करके उसको रोक लिया जाता है । 


अनासक्ति भावका प्रयोग कहाँपर उचित है? और इसका क्या लाभ है?

व्यक्ति में अनासक्ति का भाव आध्यात्मिक यात्रा तर्फ का संकेत भी है। जो व्यक्ति सांसारिकता से विरक्त होकर मुक्तिका विकल्प खोजता है उसका कदम आध्यात्मिक क्षेत्रमें पड़ जाता है। आध्यात्मिक प्रगति के लिए तो ये भाव जरुरी है ही, सांसारिक सफलता के लिए भी ये भाव उतना ही उपयोगी है। क्यूँकि ये भाव से इच्छा, वासना कम होतें है। काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे दुर्गुण कम होतें है। आसक्ति कम होने से प्रतिस्पर्धा कम होता है। हिंसा, दुराचार, असमानता कम होता है। दूसरों के प्रगति में अपना उन्नति दिखाई देता है। दूसरोंका सुख और खुशी अपना सुख और खुशीका कारण बन जाता है। मित्रता, प्रेम और एकत्वका भाव बढ़ जाता है। व्यवस्थित सांसारिक जीवन आध्यात्मिक प्रगति के लिए सहायक होता है।


अनासक्त भाव में कौन रहता है? ये भाव कब प्रकट होता है? और कितनी मात्रा में होनी चाहिए?

ये भाव आध्यात्मिक प्रगति चाहनेवाले साधक में होता है। सत्य असत्य का भेद जाननेवाला ही अनासक्त हो सकता है। जो आसक्त है वो केवल उत्तरजीविता में लिप्त रहता है, लोभ उसका मुख्य अस्त्र है। अनासक्त साधक आध्यात्मिक प्रगति के लिए सचेत रहता है और त्याग उसका प्रमुख अस्त्र है।

स्वयं के खोज शुरु होने से ये भाव भी प्रकट होने लगता है। इस क्रम में उचित मार्ग और गुरु मिलने से अनासक्त भाव दृढ हो जाता है। आसक्ति अनावश्यक सांसारिक चिजों में नहीं होनी चाहिए। आध्यात्मिक प्रगति के लिए भी अति नहीं करना है। जहाँ अति का झलक दिखता है वहाँ आसक्ति हो ही जाता है चाहे वो इच्छा सांसारिक हो या आध्यात्मिक। इसीलिए जितनी मात्रामें होने से न्यूनतम उत्तरजीविता चल सके और स्वभाविक रुपमें आध्यात्मिक प्रगति हो सके उतनी उचित है इसका कोई निर्धारित मानदण्ड नहीं है, ये व्यक्तिनिष्ठ विषय है।


सार

सांसारिक विषयों में अनासक्त होने से ही साधक आत्म केन्द्रित हो सकता है। यही आत्मज्ञान और साक्षी भाव के सफलता के कड़ी है। यदि व्यक्ति विषय-वासना में लिप्त रहता है तो वो सांसारिकता में ही रमने लगेगा, अनेक कर्म बन्धनों में फसता चला जाएगा। आसक्ति हर क्षेत्र में बाधक है व्यक्तिको उस विषय से हटने नहीं देता, लिप्त रखता है।  जो विषयों पर मुग्ध है, लिप्त है उसको मुक्ति मिलना कठिन है। मुक्ति के लिए त्याग और अनासक्ति आवश्यक है। अनासक्ति से त्याग, त्याग से वैराग्य, वैराग्य से मुक्ति मिलेगी। मुक्ति में  ही सुख, शान्ति एवं आनन्द  है। यही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है।





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