अस्थायित्व
अस्थायित्व का अर्थ क्या है?
जो स्थायी नहीं है, जिस स्थिति का मूल गुण या स्वभाव ही परिवर्तन होना है उस स्थितिको अस्थायित्व कहते हैं। ये स्थायित्वका विपरीतार्थक शब्द है। इस अस्तित्वमें अनुभवकर्ता स्थायी और सभी अनुभव अस्थायी हैं। सत्य और मिथ्या के रुपमें एक सिक्के का दो पहलू हैं।
अस्थायित्व क्यूँ है? या अस्थायित्व का कारण क्या है?
अस्थायित्व है इसीलिए स्थायित्व यानि कि सत्य का अस्तित्व समझ में आता है। माया का आधार नाद ही परिवर्तनशील है इसीलिए सभी अनुभव अस्थायी है, अनुभवका श्रृंखला निरन्तर है। नाद को अनुभव के अस्थायित्व का कारण दिखाया जा सकता है लेकिन नाद का कोई कारण नहीं है। यदि करण-प्रभावका श्रृंखला बनाया जाए तो अनन्त श्रृंखला बन जाएगा और दोहराता भी रहेगा। इसीलिए अस्थायित्वका कारण खोजना निरर्थक है।
अस्थायित्व होनेका कोई विधि या प्रक्रिया है? कैसे?
जो परिवर्तनशील है वो सब अस्थायी है। अभी कोई भी अनुभव का जो स्वरुप है पलभर में बदल चुका होता है। जैसे एक नदी में पानी हरक्षण बदल रहा होता है; उसी तरह से सभी अनुभव हरक्षण बदल रहे हैं। कोई अनुभव नियमित और धीरे से परिवर्तन होने के कारण स्थायी प्रतीत होते हैं। जो जल्दी परिवर्तन होता है और इन्द्रीयों के पकड में भी आता है वो अस्थायी प्रतीत होता है। कोई नाद इतनी जल्दी परिवर्तित होता है कि इन्द्रीयाँ भी पकड़ नहीं पाते, वो अनुभव में भी नहीं आते। जल्दी या धीरे जैसे भी परिवर्तन हो; सभी परिवर्तन अस्थायित्वका ही सूचक हैं। अनुभव मिथ्या है, परिवर्तन मिथ्या है, और अनुभव का आधार नाद ही मिथ्या है, परिकल्पना मात्र है। यही नाद में चलने वाले प्रक्रियाओं के आधार में मिथ्या अनुभवका अस्थायित्व गढ़ लिया जाता है।
क्या अस्थायित्व कोई स्थान पर या कोई आधार पर है?
अस्थायित्व हर अनुभव में नीहित है, अनुभव माया है और माया शुन्यता में है। अनुभव स्मृतियों पर आधारित है, स्मृति के कारण ही परिवर्तन दिखता है। स्मृति का कोई स्थान नहीं है। इसीलिए अस्थायित्व का अवस्थिति के लिए कोई स्थान या आधारका परिकल्पना करना निरर्थक है।
अस्थायित्व कब से है? और कब तक रहेगा?
अस्थायित्व समय में नहीं है। जब से अस्तित्व है तब से अस्तित्व का स्थायित्व और अनुभव का अस्थायित्व निरन्तर साथ-साथ है। कोई एक अनुभवका समय सीमा या आयु निर्धारित किया जा सकता है, जैसे कि ये जगत का उत्पत्ति और विलय समय सीमा में हो सकता है लेकिन ये क्रम एक लोक में रुक गया तो दूसरी लोक में चालु होता है। रुक गया तो भी फिर से शुरु हो जाता है। “अस्थायी” और “निरन्तर” ये बात विरोधाभासी भी लग सकता है। अनुभव और घटनाक्रम अस्थायी है परन्तु ये श्रृखला नित्य, निरन्तर है। अनादि से अनन्त तक यही सिलसिला चलता रहता है।
क्या अस्थायित्व को मापन या गणना किया जा सकता है?
अस्थायित्व को कोई परिमाण या संख्या में मापा नहीं जा सकता है। क्यूँकि भार जगत में नहीं है, संख्या मन गढन्त है, मिथ्या है, लेकिन अनन्त है। कोई गणना योग्य अनुभव नहीं है। हर अनुभव अस्थायी है।
क्या अस्थायित्व को कोई स्वरूप में किटान या संकेत किया जा सहता है?
माया में अनन्त सम्भावना है। कभी भी कुछ भी प्रकट हो सकता है और विलय भी हो सकता है। इसीलिए यहाँ पर जो कुछ भी प्रकट है सभी अस्थायी है। “ये और यहाँ अस्थायित्व है और इसमें नहीं”-ऐसा कभी नहीं कहा जा सकता है।
सार
जीव विकासक्रममें हरक्षण बदलाव है। जगत्, वस्तु, पदार्थ, हरक्षण परिवर्तनशील है। सभी मानसिक अनुभव क्षणिक है। इस प्रकार ये कहा जा सकता है कि माया के हर अनुभव में अस्थायित्व ही है। स्थायित्व को जानने और अर्थपूर्ण बनाने के लिए अस्थायित्व उपयोगी है।
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