अहम् ब्रम्हास्मि
‘अहम् ब्रम्हास्मि” इस कथनका अर्थ क्या है?
“अहम् ब्रम्हास्मि” इस कथन में तीन शब्द प्रयुक्त है-अहम्, ब्रम्ह, अस्मि। इसका हिन्दी रुपान्तर होता है “मैं ब्रम्ह हूँ”। इसका अर्थ है-मैं ही सम्पूर्ण हूँ, अनुभव हूँ, अनुभवकर्ता हूँ, अस्तित्व हूँ। अहम् की अवस्था बदलती रहती है। अनुभवकर्ता, जीव, शरीर, मन, वस्तु, नाम, सम्वन्ध आदि में स्थित होता है। यहाँ पर “मैं” वो परम सत्य में स्थित है, जो सम्पूर्ण हो कर भी शुन्य, मुक्त, और शुद्ध है। मैं परम तत्व हूँ, मैं निर्गुण, निराकार हूँ, सगुण और साकार भी मैं ही हूँ। मैं कोई नाम या परिभाषा में सीमित नहीं हूँ और सारे नाम भी मेरे ही है।
प्रकट, अप्रकट सारे चीजों का समग्रता, सूक्ष्म-स्थूल, भौतिक-अभौतिक, शारीरिक-मानसिक, दैहिक-वैदेहिक, लोक-परलोक, सत्य-असत्य, सही-गलत, माया-वास्तविकता, शून्यता-पूर्णता, प्रकाश-अंधकार, गति-ठहराव, सीमित-अनंत, अनुभव-अनुभकर्ता सभी मैं ही हूँ l इस प्रकार से “अहम् ब्रम्हास्मि”का तात्पर्य अस्तित्व में जो कुछ भी है वो शुन्यता और सम्पूर्णता ब्रम्ह ही है, वही मैं हूँ। आत्मन् भी मैं और ब्रम्हन् भी मैं ही हूँ।
मैं ब्रम्ह क्यूँ हूँ? किस कारण से मुझे ब्रम्ह कहा गया है?
मेरे होनेका का कोई कारण, प्रभाव नहीं है l किसी घटना का कारण-प्रभाव और उद्देश्य है भी तो वह मेरे भीतर ही है, कोई कारण, प्रभाव या उद्देश्य से मैं नहीं बल्कि मुझ से ही सभी प्रकट होते है l इसीलिए मैं अकारण हूँ, स्वयंभू हूँ l मैं निर्गुण हूँ फिर भी अस्तित्व में जो भी गुण है, वो मेरा ही गुण है l भौतिक-अभौतिक, पराभौतिक-परामानासिक, शुद्ध, शाश्वत, मुक्त-स्वतंत्र, शांत, नैतिक-अनैतिक शून्य-सम्पूर्ण, आनंद, प्रेम-घृणा सुन्दर-कुरुप, सत्य-असत्य सभी मुझ में ही है l
मैं ब्रम्ह कैसे बन गया?
मैं ब्रम्ह होनेका कोई प्रक्रिया नहीं है l कोई विधि, प्रक्रिया मुझ से बाहर नहीं, मेरे होने से पहले या बादमें नहीं l जो भी होता है सब कुछ मेरे अंदर ही होता है l ब्रम्ह, अस्तित्व, अनुभव और अनुभवकर्ता जो कुछ भी नाम दिया गया हो, मैं तो एक ही हूँ। कोई जिस रुपमें देखना चाहेगा मुझे उसी रुपमें पाता है। समय और स्थान से परे, बिना कारण, कोई नीति, विधि और सिद्धांत के बिना जो स्वतंत्र, शास्वत, शान्त, शून्य, सम्पूर्ण स्वरूप में सदा विद्यमान है, वही मैं हूँl मैं कुछ करता नहीं हूँ और सब कुछ मैं ही करता हूँ।
मैं अर्थात ब्रम्ह कहाँ हूँ और कब से हूँ?
मैं सभी अनुभव में व्याप्त हूँ, अविच्छिन्न हूँ, मुझमें समय और स्थान का कोई भी भेद नहीं है। मैं अनादि-अनंत, नित्य-निरंतर, असीमित हूँ, सर्वव्यपी हूँ, मेरा कोई सीमा और स्थान नहीं होताl यदि कोई समय, स्थान और शुन्यता पर मेरे अवस्थिती का कल्पना किया जाए तो वो कल्पना, स्थान और शुन्यता भी मैं ही हूँl मेरा जन्म नहीं हुआ, मृत्यु भी नहीं होगी, मैं सार्वभौमिक हूँ। अजन्मा-अजर-अमर हूँ, मैं नित्य निरन्तर हूँ।
मैं यानि ब्रम्ह कौन है?
मैं अनुभव और अनुभवकर्ता हूँ, मैं ही अस्तित्व हूँ, तत्व और छाया के रूप में अलग होकर अनुभवक्रिया से जुड़े हुए हैं। अनुभव के माध्यम से ही मुझको जाना जाता है, अनुभव मिथ्या है, मैं सत्य हूँ, मैंने अपने ही छाया स्वरूप का अनुभव कर रहा हूँ। द्वैत में देखा जाए तो तत्व और छाया दो है, अद्वैत में देखा जाए तो केवल एक ही है, मैं ही हूँ।
ब्रम्ह कितने है?
मैं एक ही हूँ। मेरा एक दो कर के गिनती नहीं होता है। मेरा अवस्था हमेशा अद्वैत का है। मैं सब कुछ हूँ और कुछ भी नहीं हूँ, सब कुछ मेरा है और कुछ भी मेरा नहीं है। अनेक भी मैं ही हूँ। मेरे बिना कोई अनुभव नहीं होता और अनुभव के बिना मुझे नहीं जाना जा सकता। अनुभवक्रिया के द्वारा मुझे मेरा ही मिथ्या रूप का अनुभव होता है। इस क्रिया में समय और स्थान का कोई भेद नहीं होता। मैं अखण्ड हूँ, सभी सजीव-निर्जीव वस्तु मैं ही हूँl कल्पना और यथार्थ भी मैं ही हूँ।
सार
मैं यानि ब्रम्ह का ज्ञान संभव नहीं है, केवल नकारात्मक ज्ञान और मान्यताओं का खण्डन किया जा सकता है। नेति नेति विधि के द्वारा अपरोक्ष अनुभव और तर्क के माध्याम से आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान होता है और इसी से “अहम् ब्रम्हास्मि”का बोध होता है। लेकिन इससे परे अज्ञेय है। सत्य-असत्य, भाव-अभाव सभी ब्रम्ह में है। ब्रम्ह सत्य-असत्य के परिभाषा एवं तर्क, बुद्धि और ज्ञान से परे हैं। सभी सांभावना ब्रम्ह में ही है। मैं यानि कि ब्रम्ह ही शुन्य और सम्पूर्ण है; यही सत्य, नित्य, और निरंतर है, केबल होना मात्र है-“अहम् ब्रम्हास्मि”।
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