जीवनमुक्त
स्वयं को यानि कि सत्य को जाननेवाला जीवनमुक्त है। जो आत्मज्ञान प्राप्त करके जीवित अवस्था में ही सांसारिक माया और बन्धनों से स्वतन्त्र है वही जीवनमुक्त है । सांसारिक विषय सुख में आसक्ति ना होना सत्य और मिथ्या को जानना ही जीवनमुक्ति है । जिसने जीवन मृत्यु के मिथ्या खेल को समझ लिया वो जीवनमुक्त है।
मेरा स्वभाव ही मुक्त है, मैं जीवनमुक्त होनेका कोई भी कारण नहीं है। मैं कभी भी जीवन और मृत्यु के बन्धन में नहीं हूँ। जीवन और मृत्यु मेरा नहीं है, मैं शास्वत हूँ, स्वयम्भू हूँ।
जीवनमुक्त होनेका कोई विधि, प्रक्रिया या पदार्थ नहीं है। मैं पहले से ही मुक्त हूँ। मेरा मुक्त स्वभाव ही सत्य है। सारे बन्धन अज्ञान है और अज्ञान को हटाना ही जीवनमुक्ति का अर्थ जानना है।
जिसको आत्मज्ञान हुआ है वो अपने स्वयं के स्वरुप यानि कि अनुभवकर्ता के स्वरुप में आ गया। वही मैं यानि कि अनुभवकर्ता ही जीवनमुक्त है। इसका अर्थ जो है वो मुक्त है, बन्धन तो केवल प्रतीति है, माया है। जिसने अज्ञान में बन्धनको मान लिया वो हमेशा बन्धन में है, और जिसने स्वयंको यानि कि सत्य को जान लिया वो हमेशा जीवनमुक्त है।
जीवनमुक्त किसी स्थान और समय के सीमा में नहीं है। यदि स्थान और समय के सीमामें होता तो वो मुक्ति नहीं होता, स्थान और समय के बन्धन में होता । मैं सर्वत्र मुक्त हूँ, हर अवस्था में मुक्त हूँ, और हमेशा से मुक्त हूँ।
मुक्ति सम्पूर्णता में है, किस्ता किस्ता में नहीं मिलता। मुक्तिका कोई हिस्सा, खण्ड या विभाजन नहीं है। आज ये होने से इतना मुक्ति हुआ, कल ये करुँगा तो इससे अधिक मुक्ति मिलेगा ऐसा कभी नहीं होगा। जीवनमुक्ति है तो पूर्ण रुप में है।
मैं हमेशा से मुक्त हूँ, सम्पूर्ण रुपसे मुक्त हूँ। जनम और मृत्यु के चक्र में नहीं हूँ। कोई भी सांसारिक सम्बन्ध, जीवन और मृत्युका जो बन्धन प्रतीत होता है वो केवल भ्रम है । जीवन और मृत्यु आता जाता है, मायाका खेल है, लीला है, अज्ञानका मान्यता है। मेरा कोई जीवन नहीं है, मुक्ति मेरा स्वभाव है। मैं जीवनमुक्त हूँ।
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