कामवासना

कामवासना


कामवासना का अर्थ क्या है?

जीव में विभिन्न प्रकार के वृत्तियाँ चलते रहते हैं। कामवासना ऐसी ही एक वृत्ति है जो जीव का शारीरिक और उत्तरजीविता के आवश्यकता पूरा करने के लिए आधारभूत वृत्ति के रुपमे सबसे निचले चक्रमें चलता है। इस वृत्ति में यौन इच्छा के लिए शारीरिक संकेत, विपरित लिंगी के प्रति आकर्षण, मानसिक आवेग और उत्तेजना, वासनापूर्तिका प्रयास आदि विभिन्न प्रक्रिया चलतें हैं। इस वासना के सही एवं नैतिक प्रयोग से सृष्टि चक्र आगे बढ़ता है, सांसारिक सुख और तृप्ति मिलता है। गलत और अनैतिक प्रयोग से अनेक दुःख, कष्ट, बेचैनी के साथ नारकीय जीवन भोगना पड़ता है।


कामवासना क्यूँ होता है? अर्थात् क्या प्रयोजन है?

जीव में जिस प्रकार से भूख प्यास कि वृत्ति चलती है उसी प्रकार ये वृत्ति भी चलती है।  तत्काल के लिए सीधे प्रयोजन देखा जाए तो एक प्रकारका शारीरिक-मानसिक आवेग, कामोत्तेजना तृप्त करना और प्रजनन् प्रक्रिया स‌ंचालन करके विकासक्रम आगे बढ़ाना इस वृत्तिका मुख्य उद्देश्य देखा जाता है। विपरित लिंगी के प्रति आकर्षण, प्रजनन योग्य उम्र, सन्तान उत्पादन कि इच्छा आदि कारण भी दिखाया जा सकता है; लेकिन ऐसे हर उद्देश्य एवं कारण पर और प्रश्न लगाते जाएगें तो सभी क्षणिक और मनगढ़न्त हो जाएंगे; ये बिना कारण के मिलेगा। क्यूँ कि कारणों का अन्नत श्रृंखला बन जाएगा और फिर से वही कारण दोहराता रहेगा। इसीलिए इस सृष्टि का नियम ऐसा ही है। नादका स्वभाव ही द्वैत और चक्रीय परिवर्तन है। हर अनुभव में यही मिलेगा। 


कामवासना कैसे उत्पन्न होता है और कैसे तृप्त किया जाता है?

यही प्रक्रिया से कामवासना उत्पन्न होता है ये बताना संभव नही है। क्यूँकि हर जीव में निश्चित उम्र अवधि में ये वृत्ति स्वतः ही प्रकट होता है। यदि चढ़ती जवानी, शादि करना, वासनापूर्ति के उपाय का उपलब्धता, परिस्थितिजन्य अनुकुलता आदि प्रक्रिया बताया जाए तो भी इन्हीं प्रक्रियाओं के उपर वैसे ही प्रश्न चिन्ह लगाया जा सकता है, और इसका अन्नत शृंखला चलेगा; लेकिन बिना उत्तर के वही सिलसिला दोहोराता जाएगा। इसीलिए इसका कोई प्रक्रिया नहीं; अपने आप होता है। तृप्ति के लिए भी वही नियम है। क्षणिक तृप्ति मिलता है, दूसरी वासना उत्पन्न होती है, ये वृत्ति बारबार चलती है। इसीलिए सभी क्षणिक सुख भ्रम मात्र है। माया का इस रहस्यको जानना ही मुक्ति है, वास्तिक तृप्ति और आनन्द है।


कामवासना कहाँ और कब उत्पन्न होता है?

यदि समग्रता में बात किया जाए तो जिस लोक में सृष्टि और जीवन के संभावना है वहीं जीव में ये वासना पायी जाती है, और यदि जीव के शरीर के परत पर बात किया जाए तो जीव कि मूलाधार चक्र से ये वासना दिखाई देता है। लेकिन ये भी क्षणिक और मनगढ़न्त उत्तर है। क्यूँकि उस लोक और उस परत में कहाँ से आया है? उत्तर में कारण शरीर से कहाँ जा सकता है, लेकिन कारण शरीर में कहाँ से? इस प्रश्न के उत्तरका कोई ओरछोर नहीं मिलेगा। 


 कामवासना किसमें कितना होता है?

यदि जीव के स्तर पर देखा जाए तो उस जीव के इच्छा, वासना, कर्म और कर्मफल के अनुसार कामवासना न्यूनाधिक हो सकता है। व्यक्ति या जीव कितना कामूक है? कैसा संस्कार पड़ा है? कितना नैतिक और ज्ञानी है? इसमें निर्भर होता है। जीव में भी मनुष्य में ये वासना अन्य जीवों के तुलना में भिन्न पाया जाता है। अन्य जीवों में ये वासना मासिक, त्रैमासिक, अर्धवार्षिक, वार्षिक आदि समय चक्रमें चलता है। मनुष्य में ये वृत्ति दैनिक चक्र में चलता है। जब वासना के श्रोत जीव नहीं है तो जीव के ही स्तर पर देखकर छोड़ देना उचित नहीं है। इसका श्रोत तक जाना पड़ेगा। श्रोत नाद है और नाद में अनन्त संभावना है, निरन्तर दोहराव है।


कामवासना का क्या लाभ हानी होता है?

इस जगत में सृष्टि चक्र चलाने और विकासक्रम आगे बढ़ाने के लिए कामवासना आवश्यक है। यदि जीवमें कामवासना नहीं होता तो प्रजनन क्रिया आगे बढ़ाना असंभव था। कामवासना को व्यवस्थित और अनुशासित बनाने के लिए पति पत्नी में निश्वार्थ प्रेम, विश्वास, समर्पण,  एक दूसरे के इच्छा का क़दर और आपस में मर्यादापूर्ण व्यवहार, ज़रूरी है। सामाजिक सुव्यवस्था, रिस्ता, कुटुम्ब और सम्वन्ध विस्तार होकर मित्रता, बन्धुत्व एवं सद्भाव कायम रखने में सहायक है। यदि कामवासना एक मर्यादा और नैतिकता में आधारित न हुआ हो तो संसार में दुःख, विकार, हिंसा, बलात्कार, अत्याचार, विभेद, असमानता जैसे घृणित कृत्य के जड़ भी कामवासना ही है। 


सार

कामवासना जीव के नैसर्गिक वृत्ति है। जैसे श्वास प्रश्वास, निद्रा, भूख, प्यास, मल त्याग, आदि वृत्तियाँ चलते हैं वैसे ही कामवासना कि वृत्ति भी चलती है। सांसारिक क्षेत्र में सृष्टि चक्र संचालन एवं आध्यात्मिक क्षेत्र में माया का खेल या लीला जानने के लिए उपयोगी है। इस विषय पर मनन् करके जड़ तक पहूँचने के प्रयास में परिकल्पित नाद में चलनेवाले वृत्तियाँ ही हर प्रश्न के उत्तर के रुपमें आते है; जो केवल भ्रम है, क्षणिक है और कभी तृप्ति न होनेवाला, कभी शान्त न होनेवाला चक्रीय वृत्ति है। ये सत्य जानना ही कामवासना से मुक्ति के उपाय है। जब सत्य स्वरुप चीरस्थायी आनन्द सामने होगा तब कामवासनाका क्षणिक तृप्ति और मिथ्या सुख सदा के लिए स्खलित होकर परम आनन्दका द्वार खोल देगा।


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