दृष्य द्रष्टा विवेक
दृष्य द्रष्टा विवेक का अर्थ क्या है?
दृष्य द्रष्टा विवेक के बारेमे जानने के लिए ये तीनों शब्द का अर्थ समझना आवश्यक है। जो भी भौतिक/अभौतिक, प्रकट/अप्रकट अनुभव है वो सभी दृष्य है। उन सभी दृष्योंको देखनेवाला द्रष्टा है। दृष्य एवं द्रष्टाबीचका भेद पता करने कि क्षमता, चित्त कि योग्यता विवेक है। इस प्रकार से क्या दिखाई दे रहा है और उस दृष्य को कौन देख रहा है ये जानने की योग्यता ही दृष्य द्रष्टा विवेक है।
दृष्य द्रष्टा विवेक क्यूँ है? ये भेद करना क्यूँ आवश्यक है?
दृष्य द्रष्टा विवेक ही सत्य असत्य जाननेका मूलभूत आधार है। अनुभव अपनेआपको देख नहीं सकता और जो देख रहा है वो शरीर, जगत, मन जैसे कोई भी अनुभव नहीं है। द्रष्टा के प्रकाश से ही दृष्य प्रकट है, प्रकाशित है। आत्मज्ञान यानि कि स्वयंको जानने के लिए, ब्रम्ह यानि कि अस्तित्व को जानने के लिए दृष्य द्रष्टा विवेक आवश्यक है।
दृष्य द्रष्टा विवेक का भेद कौन करता है और कहाँ होता है?
मनुष्य चित्त दृष्य और द्रष्टा के बीच भेद करता है। जो व्यक्ति जिज्ञासु और मुमुक्षु है उसमें स्वयंको और अस्तित्वको जानने कि अभिलाषा होती है। भ्रमको हटाकर सत्य जानना ही मनुष्य जीवनका लक्ष है और यही मुक्ति है। जिसमें आत्मज्ञान हुआ है वही साधक ये भेद करता है। जिसमें आत्मज्ञान नहीं है उसमें ये क्षमता विकसित नहीं होता है। ये क्षमता मनुष्य चित्त के उपरी परत बुद्धिके साथ होता है।
दृष्य द्रष्टा विवेक कब प्रकट होता है? और कब तक इसका प्रयोग जरुरी है?
व्यक्ति जब सत्य के खोज में लग जाता है तब सही मार्ग और गुरु आवश्यक होता है। गुरु के सही मार्गदर्शन से उसका आध्यात्मिक साधना गतिमान होता है। यदि कुछ दिखाइ दे रहा है या प्रतीत हो रहा है तो उस प्रतीति के पिछे कुछ तो अवश्य होगा, ये क्या है? अनुभव स्वयंको जान नहीं सकता तो फिर जाननेवाला कौन है? मैं कौन हूँ और क्या नहीं हूँ? इस प्रकार के प्रश्न करते करते सत्य और मिथ्याका भेद पहचान कर ही लेता है। जब तक चेतना पूरी तरह से स्थापित नहीं होता तब तक ये विवेक का प्रयोग जरुरी है।
दृष्य द्रष्टा विवेक कितना होता है? इसका प्रयोग कितना आवश्यक है?
दृष्य द्रष्टा विवेक का प्रयोग व्यक्ति के बुद्धि और चेतना के स्तर पर निर्भर होता है। जो बुद्धिमान और चेतनशील है उसमें अधिक विवेक होता है और जल्दि प्रगति कर लेता है, चेतना या साक्षीभाव स्थापित होता है। जो अज्ञानी है उसमें ये विवेक शुन्य या न्यून होता है। आत्मज्ञान प्राप्त करके उस ज्ञान में हमेशा स्थापित होनेके लिए जिसको जितना इस विवेक का प्रयोग करना आवश्यक है उतना कर सकता है।
दृष्य द्रष्टा विवेक कैसे बढाया जाता है और कैसे प्रयोग किया जाता है?
नेति नेति विधिके द्वारा अज्ञान को हटाकर तत्व या सत्य तक पहुँचा जाता है। निरन्तर साधना से सत्य और मिथ्या का भेद स्पष्ट होता है, स्वयंमें स्थित होनेका भाव विकसित होता है। दोनों का भेद पहचान करने के लिए दृष्य और द्रष्टा को अलग करना पडता है। कौन देख रहा है और क्या दिख रहा है ये विवेक का प्रयोग करके ही जाना जाता है। अनुभव नहीं देख सकता और अनुभवकर्ता नहीं दिख सकता।
सार
स्थूल और सुक्ष्म कोई भी अनुभव मैं नहीं, मैं जगत नहीं, शरीर नहीं, मन और कोई भी मानसिक अनुभव नहीं, यहाँ तक कि चेतना भी मैं नहीं। इन सभी को देखनेवाला साक्षी मैं हूँ। चेतना आती हैं, जाती है, द्रष्टा नहीं आता जाता। कोइ भी चिज से प्रभावित नही होता। द्रष्टा चेतनाको आते जाते हुए देख रहा है। यदि अनुभव को देखने वाला द्रष्टा नहीं होगा तो अनुभव नहीं होगा। अनुभव और अनुभवकर्ता हमेशा एकसाथ होते है, आपस में व्याप्त है, तत्व और छाया के रुपमें । ऐसे में क्या सत्य और क्या मिथ्या है ये जानने के लिए, दोनोंका भेद पता करने के लिए दृष्य द्रष्टा विवेक आवश्यक एवं उपयोगी है।
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