माया

 माया


माया अस्तित्व का छाया है । जो वास्तव में है नहीं लेकिन होने का आभास होता है । भ्रमपूर्ण, अवास्तविक एवं मिथ्या प्रतीति होती है । सम्पूर्ण सृष्टि का प्रपञ्च, परिकल्पित शक्ति या नाद का लीला ही माया है । अनुभवकर्ता का प्रतिबिंब है । 


माया कोई भी कारण या प्रभाव के अधीन नहीं है । सभी कारण या प्रभाव माया के अन्दर ही है । यदि कोई कारण और प्रभाव का कल्पना किया जाये तो कारण और प्रभाव का अनन्त श्रृंखला बन जाएगा लेकिन माया का ओरछोर नहीं मिलेगा ।


माया बनने और बनाने का कोई विधि प्रक्रिया या पदार्थ नहीं है । माया स्वयं है । कोई विधि प्रक्रिया या पदार्थ का कल्पना करें तो वो सब माया में ही मिलेगा, माया के बाहर से नहीं मिलेगा । 


माया सम्पूर्ण अस्तित्व में व्याप्त है । सभी स्थान माया में है, माया स्थान में नहीं । स्थान भी मिथ्या है । यदि कोई स्थान में अवस्थिति की कल्पना किया जाए तो उससे बाहर का क्या है ? वो स्थान कहाँ पर है ? शून्यता पर ? फिर तो वही है माया । 


माया का कोई शुरुआत और अंत नहीं है । अनादि से अनन्त तक है । समय माया में है, माया समय में नहीं । शुरू और अंत घटनाओं का होता है, माया घटनाओं का अविराम श्रृंखला है । कोई शुरूआत और समाप्ति मान लिया जाए तो उससे आगे या पीछे का क्या है ? निःसन्देह माया ही है । माया परिवर्तनशील है, यही परिवर्तन के निरन्तरता का कारण स्थायी प्रतीत होता है । मिथ्या ही सदा है ।


कोई भी आकर, मात्रा, परिमाण में माया को मापा नहीं जा सकता, माया अखण्ड है, अपरिमेय है । सीमाहीन है । सीमा दो वस्तुओं में होता है, माया एक ही है, अंतहीन है । यदि कोई सीमा रेखा खिंच लिया जाए तो उससे बाहर का क्या है ? प्रश्न निरर्थक है,  उत्तर नहीं है । 


माया अनुभवकर्ता का मिथ्या दर्शन है । जो भी प्रकट अस्तित्व है वो माया ही है । माया का गणना सम्भव नहीं है । यदि गणना किया जाए तो दूसरा तीसरा क्या है ? इस प्रकार से सभी प्रश्न धराशायी हो जाएँगे, लेकिन उत्तर एक ही आएगा केवल माया । इससे आगे माया अज्ञेय है ।


माया का तत्व शुन्य है । प्रकट अस्तित्व माया है, ब्रम्ह का नाद यानि कि कंपन है । परिकल्पित नाद में चलने वाले मिथ्या प्रक्रिया का मिथ्या प्रतीति मात्र है । मिथ्या अनुभव के हर परत एवं इन्द्रियाँ मिथ्या स्मृति में संचित है । इसीलिए भाव प्रतीत होता है, अनुभव प्रतीत होते हैं,  प्रतीति केवल लीला है, वास्तव में केवल अभाव है, शून्यता है । यही माया है ।

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