कृपा
क्या; आध्यात्मिक क्षेत्र में उपयुक्त पात्र या साधक पर गुरु या गुरुक्षेत्र का विशेष स्नेह, करुणा, निगाह, वरदान या प्रेम ही कृपा है । यदि कोई काम कम प्रयास में भी बड़े आसानि से बड़े उपलब्धिपूर्ण हो रहा है, अभूतपूर्व परिणाम आ रहा है, उत्प्रेरणा सन्तुत्टी और तृप्ति मिल रहा है तो वहाँ पर कृपा वरष रहा है ये समझ लेना चाहिए ।
क्यूँ: अच्छे संस्कार, नैतिक आचरण, और उच्च सेवा भाव के कारण कृपा प्राप्त होता है । जो अपने अच्छे व्यवहारके कारण कुछ फल प्राप्त करने का योग्य अधिकारी है उसको उसका कर्मफल मिलने या उत्प्रेरित करने के लिए कृपा का महत्वपूर्ण भूमिका होता है । कृपा से व्यक्ति का मनोबल वृद्धि हो जाता है । उसका अच्छा कर्म और अच्छा एवं प्रभावी होता है । अनपेक्षित और अप्रत्यासित शुभ नतिजा प्राप्त होता है ।
कैसे: आध्यात्मिक या सांसारिक जो भी उपलब्धि हो वो केवल प्रयास मात्र से नहीं होता, कृपा से होता है । हम सब देख ही रहे हैं कि कोई बिना प्रयास के भी प्रगति और महत्वपूर्ण नतिजा प्राप्त कर लेता है और कोई कितना भी प्रयास कर ले; अपेक्षित प्रगति नहीं कर पाता । कृपा का कारण ही ऐसा होता है । शुद्ध मनोभाव, नैतिक आचरण, ज्ञान, चेतना, सत्प्रयास, सुकर्म, सेवा भाव, धैर्यता, श्रद्धा, समर्पण, दया, करुणा, प्रेम, आज्ञाकारीता आदि गुण ही कृपा प्राप्ति के कड़ी है ।
कौन: आध्यात्मिक प्रगति के लिए गुरु और गुरुक्षेत्र से कृपा प्राप्त होता है । कृपा के लिए पात्रता होना अनिवार्य है, साधक कृपा के योग्य होना चाहिए । जो कोई भी कृपा प्राप्त करने लगे तो वो कृपा का दुरुपयोग होगा और ऐसा कभी होता भी नहीं । क्यूँकि प्रकट अस्तित्वका आधार नाद ही द्वैत चक्रीय, और ध्रुवीय है । अभाव से ही भाव का अहमियत है । ग़लत व्यक्ति के लिए कृपा हानिकारक भी हो सकता है । यदि उस कृपा के स्तर तक प्रगति नहीं हुआ हो, कृपा ग्रहण और सदुपयोग करने कि क्षमता न हो, सही समझ न हो तो वंदर के हाथ में नारियल जैसा हो जाएगा । उपयुक्त पात्र नें कृपा का उपयोग करना जानता है । कृपाका मूल्य और मर्यादा समझता है । कृपा का ऋण चुकाने के लिए अधिक से अधिक अच्छे कर्म करेगा, जरुरतमन्दों को आवश्यक सहायता करते हुए संसार से अज्ञान और दुःख हटाने में योगदान करेगा ।
कितना: कृपा परिमाण में मापा नहीं जा सकता । कृपा हर क्षण अविरल वरष रहा है । पात्र और पात्रता जितना उचाँ होता है कृपा उतना ही इकठ्ठा होता है । जो कृपा वृष्टि में भीगना चाहेगा वो कृपा से ओतप्रोत हो जाएगा और जो छाता लगाएगा उसने तो कृपा वृष्टि को स्वयं ही रोक देता है । जिसमें गुरु आज्ञा एवं गुरुमार्ग पर श्रद्धा और समर्पण हो, पवित्र उद्देश्य पर निष्ठा हो वो अपना बुद्धि, चेतना और अच्छे कर्म के द्वारा कृपा का बड़ा पात्र भर लेता है । यदि किसी में सीमित बुद्धि, सीमित प्रयास, जल्दि प्राप्ति कि अभिलाषा या लालसा के कारण छोटा ही पात्र होता है तो उसके उपर कृपा भी क्षणिक ही होता है । कृपा के लिए धैर्यता भी आवश्यक होता है । सही समय में उचित कृपा अवश्य मिल जाता है ।
कब/कहाँ: कृपा अविरल है, सदा से है और हरक्षण यत्रतत्र वरष रहा है, कोई ऐसा स्थान नहीं है जहाँ कृपा वृष्टि न हुआ हो । लेकिन ज्ञान, संस्कार, कर्म और ग्रहणशीलता निर्णायक होता है । जहाँ ज्ञान है वहाँ कृपा को पहचाना जाता है और उसका सम्मान किया जाता है । जहाँ अज्ञान है वहाँ कृपा लुप्त है । जहाँ अच्छा संस्कार है वहाँ कृपा का मर्यादा, आदर और स्वागत किया जाता है । जहाँ खराव संस्कार है वहाँ कृपा अहंकार द्वारा तिरस्कृत होता है । जहाँ अच्छे कर्म होते हैं वहाँ चार चाँद लगाने के लिए गुरुक्षेत्रका आकर्षण और उपस्थिति होता है । जहाँ कुकर्म है वहाँ कृपा विकर्षण होता है । जहाँ ग्रहणशीलता है वहाँ कृपा जमा हो पाता है, टिकता है और उपयोग हो जाता है । जहाँ ग्रहणशीलता नहीं है वहाँ कृपा उपयोगहीन होकर विखर जाता है ।
सार: कृपा ज्ञानगंगा है, अस्तित्वका सद्भाव वृष्टि है । इसीलिए सर्वत्र और सभी में समान है । कृपा प्राप्त करने के लिए पात्रता और सदुपयोग करने के लिए सद्भाव आवश्यक है । निष्कपट भाव से सही उद्देश्य और कर्म के लिए प्रार्थना किया जाए तो वो सुना जाता है और कृपा वृष्टि सही व्यक्ति के तरफ बह जाता है, योग्य पात्र पर एकत्रित होता है । यदि पात्रता और सद्भाव हो तो कोई भी जीव कृपा से लाभान्वित हो सकता है, प्रगति तेज कर सकता है ।
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