(२. आत्मज्ञान, मायाज्ञान, ब्रम्हज्ञान)
मैं ना ही मन, देह, नाम, पहिचान्, नाते, जगत्, वस्तु हूँ ।
ना मैं जीवन, सृष्टि के जनक हूँ, ना मृत्यु के अस्तु हूँ ॥
ना मेरा रुप, वासना, घर, पता, इच्छा नहीं लक्षण ।
पर ऐसा अनुभव नहीं जगत में मैं ना मिलूँ तत् क्षण ॥
स्वयंभू, परिपूर्ण, निर्गुण, सरल शाश्वत, अपार सत्व हूँ ।
निराकार, असीमित, अनन्त, अविचल, नित्य मैं सार तत्व हूँ ॥
कालातीत, हर क्षेत्र के अधिपति, मैं ज्योति के पुंज हूँ ।
अंधेरा कूप, शून्यता, विकट हूँ, आनन्द के कुंज हूँ ॥
ये माया प्रतिबिंब, छद्म रचना, लीला रचाती हुईं ।
मेरा निर्मल भाव में उभरती संसार नचाती हुई ॥
मै विश्वस्मृति, पंचभूत्, गगन हूँ जीव वस्तु मैं नाद हूँ ।
सारा खेल् सपना झूठा जगत का अभाव, मैं भाव हूँ ॥
मेरे तेज प्रकाश के चमक है आकाश, तारा, रवि ॥
मैं साकार कण-व्याप्त हूँ, प्रकट में, अस्तित्व मेरा छवि ।
कोई कर्म नहीं, न याचक, धृत, कर्ता न हर्ता भला ।
मैं दाता नहीं हूँ, न भक्त, भगवान, भोग्य न मेरा कला ॥
सम्वन्ध, अलगाव, भेद्, निकटता कोई न दूरी यहाँ ।
मेरा ही रुप, भाग, अंग, अवतार, ब्रम्हाण्ड सारा जहां ॥
मिथ्या मैं, और सत्य मैं, अनुभवी, मैं ज्ञान हूँ, भ्रम हूँ ।
साक्षी मैं, ठहराव, दृश्य, गति मैं, द्रष्टा मैं हूँ ब्रम्ह हूँ ॥
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