न्यूनतावाद
न्यूनतावाद का अर्थ उपभोग्य चीजों को कम से कम उपयोग करना है, जिससे कि काम चल सके, आधारभूत आवश्यकता पूरी हो सके । ऐसा उपयोग भौतिक श्रोत साधन, प्राकृतिक एवं शारीरिक- मानसिक ऊर्जाएँ आदि कोई भी उपभोग्य वस्तुओं का हो सकता है ।
अस्तित्व में जो भी ऊर्जा, जीव, वस्तु आदि सभी अनुभव है उन सभी का अपना अपना महत्व और प्रयोजन है । इन सभी से अस्तित्व में पूर्णता है । इनके समुचित प्रयोग से ही ये सन्तुलन बना रहता है । विभिन्न कारणों से न्यूनतावाद आवश्यक है । जैसे किः-
विकास क्रम एवं उत्तरजीवीता सन्तुलन के लिए
प्रकृति ने उत्तरजीवीता के लिए आवश्यक व्यवस्था कर रखी है । आवश्यकता से अधिक प्रयोग करने से सन्तुलन बिगड़ जाता है, चाहे वो भौतिक हो, शारीरिक हो, या मानसिक हो ।
सान्सारिक दुःख पीड़ा से मुक्ति के लिए
अधिक उपभोग करने से समाज में हिंसा, असमानता, ग़रीबी आदि बढ़ जाता है । व्यक्ति में लोभ, लालच, दम्भ, घमण्ड आ जाता है । सान्सारिक दुःख, पीड़ा बढ़ जाता है । न्यूनतावाद से समानता का भाव स्थापित हो जाता है, “सभी के प्रगति ही मेरा प्रगति है” ये भाव आ जाता है और सरलता से दुख कष्ट से मुक्ति मिलता है ।
आध्यात्मिक प्रगति के लिए
अत्याधिक आर्जन और प्रयोग से व्यक्ति व्यभिचारी होता है, सान्सारिकता में लिप्त होता है ।आध्यात्मिक प्रगति में बाधा आ जाता है । न्यूनतावादी हो कर साधा जीवन जीने से विचार उच्च होता है । सरल और सात्विक जीवन होता है “सभी मेरा ही रुप है” ये भाव आता है, आत्मज्ञान स्थापित होता है समग्र आध्यात्मिक प्रगति तेज हो जाता है ।
न्यूनतावाद स्थापित करने के लिए आध्यात्मिक चेतना बहुत आवश्यक होता है । निम्न उपाय न्यूनतावादी बनने के लिए उपयोगी हो सकता हैः-
न्यूनतावादी होने के लिए चेतना और बुद्धि विवेक का प्रयोग आवश्यक होता है । आत्मज्ञान से सत्य और मिथ्या पता चल जाता है । मिथ्या में आवश्यकता का कोई सीमा नहीं है, सत्य के लिए कुछ नहीं चाहिए । सत्य पता चलते ही व्यक्ति न्यूनतावादी हो जाता है ।
न्यूनतावादी होने के लिए सान्सारिकता से आसक्ति छोड़ना पड़ता है । विलासिता से विरक्त होना पड़ता है ।
अनावश्यक इच्छा और वासना छोड़ना पड़ता है । जो आवश्यक है वो आपने आप हो जाएगा ।
जो अति आवश्यक चीज़ या वस्तुएँ है उसका पूर्ण उपयोग करना चाहिए ताकि उसका Waste न हो पाए ।
जो चीज़ पुनः प्रयोग किया जा सकता है, जो पुनर्नवीकरण किया जा सकता है उसको पुनः प्रयोग एवं पुनर्नवीकरण करके उपयोग करना चाहिए ।
सान्सारिक जीवन एवं उत्तरजीवीता के लिए उपभोग के हर क्षेत्र में न्यूनतावाद आवश्यक है । खानपान, कपड़े और अन्य उपभोग के सभी साधन न्यूनतम होना चाहिए । अधिक सामग्री केवल कचरे का ढेर है । आध्यात्मिक क्षेत्र में भी एक मार्ग, एक गुरु और एक साधना से ही प्रगति तेज़ हो जाता है । जहाँ खली होता है वही भरा जा सकता है । ख़ाली जगह, ख़ाली मन, बुद्धि में ही आवश्यक गुणों से भरा जा सकता है ।
वैसे तो हर व्यक्ति न्यूनतावादी होनी चाहिए, फिर भी जो अध्यात्म मार्ग पर है, उसको न्यूनतावादी होना अधिक ज़रूरी होता है । इसीलिए विगत में गुरुकुल और आश्रम होते थे । ऋषिमुनी और ज्ञानी जन जंगल और गुफ़ाओं में रहते थे ।अधिक से अधिक जमा करने का लालच केवल मनुष्य को है, बाक़ी जीव कोई संग्रह नहीं करते, तो भी उनका जीवन सरलता से चल रहा है, सन्तुष्ट है । जमा करने वालों ने जितना भी जमा किए हैं उनको असन्तुष्टि ही है, और अधिक चहेते हैं । क्यूँकि मनुष्य को जिसका खोज है, जिसको पाना हैं उसको पहचाना ही नहीं है इसलिए अन्य सब कुछ मिलने पर भी असन्तुष्ट हैं ।
जो चीज़ अति आवश्यक है, जिसके बिना न्यूनतम जीविका नहीं चलता, जिसके बिना शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य एवं सुरक्षा नहीं हो सकता, जिसके बिना आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकता वो चीज़ आवश्यक है बाक़ी सब निरर्थक है ।
इसी तरह से जब उपभोग्य साधनों से ज़रूरतमंदों का उद्धार हो, सेवा एवं उपकार हो, जब किसी आध्यात्मिक पुण्य कर्मों के लिए आवश्यक हो, तब अधिकतम लाभ हासिल करने के लिए ;साधनों को प्रयोग करना चाहिए ।
इस प्रकार आधारभूत आवश्यकता पूरी करने के लिए जितना चाहिए उतना ही उपयोग करना चाहिए, उससे अधिक जमा करना प्राकृतिक नियम विरुद्ध है, आध्यात्मिक प्रगति नहीं होता । दूसरों का हिस्सा हनन होता है, कर्मफल सही नहीं आएगा । इसीलिए सर्वोच्च प्राप्ति, सन्तुष्टि, शांति एवं आनन्द के लिए “न्यूनतावाद” आवश्यक है ।
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