अद्वैत
अद्वैत का अर्थ होता है कि दो नहीं है । अस्तित्व के सारे प्रकट-अप्रकट रुप दो नहीं बल्कि एक ही है । अप्रकट रुप प्रकट में व्याप्त है, उसी अप्रकट से प्रकाशित है । अस्तित्व में सत्य और मिथ्या एक सिक्के का दो पहलु मात्र है, जिसमें से एक को अलग नहीं किया जा सकता । इसीलिए अस्तित्व एक ही है और अज्ञेय है । भाव भी है, और अभाव भी है सम्पूर्णता है, यहि अद्वैत है ।
यहि एक अस्तित्व को जानने के लिए विभाजन करना पड़ता है, द्वैत का सहारा लेना पड़ता है, एक अनुभवकर्ता और एक अनुभव के रुपमे । केवल चित्त ही ये विभाजन करता है, जो मिथ्या विभाजन है । क्यूँकि एक ही अवस्था में ज्ञान सम्भव नहीं है । जानने के लिए कोई विषय और उसको जाननेवाला चाहिए होता है ।
अस्तित्व को जानने के लिए चित्त द्वारा दो भाग में काल्पनिक विभाजन किया गया है । अस्तित्व में ये विभाजन और सीमा रेखा कहीं नही मिलेगा क्यूँकि विभाजन है ही नहीं, दो कहीं है ही नहीं । उदाहरण के लि पानी और लहरें को ले सकतें हैं । इसमे लहरेंको पानी से अलग कभी नही किया जा सकता । पानी का विभिन्न स्वरुप जानने के लिए केवल भाषा का सहारा लिया गया है, यानी कि “लहर” और “पानी”नाम दिया गया है । इसी प्रकार से किसी भी अनुभव को ले लें और देखें, उसमें अद्वैत ही पाया जाता है, दो नहीं मिलेगा । दो भाग में बाटा नहीं जा सकता यदि बाटा गया तो वो वो नही रहेगा । बुद्धि का उपयोग करके अद्वैत के स्तर तक पहूँचने के लिए भाषा और शब्द के केवल सहारा लेना पडता है परन्तु परिभाषा में समेटा नही जा सकता । अद्वैत को जाना नहीं जा सकता हुआ जा सकता है, होना मात्र है, जो पहले से ही है ।
कहाँ तक द्वैध है, और कहाँ से अद्वैत शुरु होगा ? ऐसा कोई सीमा नहीं है, अद्वैत सर्व व्यापक है, असीमित है । सारे अनुभव स्मृति में संचित है, अलौकिक है, यहाँ इसी समय है । अनुभवकर्ता भी यहीं इसी समय है । बीच में कोई दुरी या समयका अन्तराल नहीं है, एक है । अनुभवकर्ता और अनुभव अलग मिलेगा या अलग होगा ये अवस्था कभी भी नहीं होगा ।
सत्य-असत्य, अन्दर-बाहर, सुख-दुख, ठण्डा-गरम, उच-नीच, लाभ-हानी आदि जो भी शब्द द्वैत बोलने के लिए प्रयोग में लाये जाते है, उन अनुभव में कोई विभाजन नहीं है । क्यूँकि वो दो अवस्था एक ही अवस्था का एक ही विन्दु से विपरित दिशा में विस्तारित रुप मात्र है ।
जब अस्तित्व के बारेमें कुछ जानना होता है तब चित्तद्वारा मन गढन्त “द्वैत” का उपयोग किया जाता है, अन्यथा हमेंशा अद्वैत ही अद्वैत है ।
सृष्टि माया के खेल से चल रहा है, हम मिथ्या और भ्रम में जी रहें हैं । जीने के लिए अहम वृत्ति आवश्यक है इसीलिए भेद सृजना होता है । मिथ्या का आधार सत्य है । इसीलिए सत्य और मिथ्या दोनो समझना आवश्यक है । अद्वैत का अनुभव संभव नहीं है, जानना सम्भव नहीं है, केवल होना मात्र है । अनुभवकर्ता और अनुभवका विलयका अवस्था अनुभवक्रिया है यहि अद्वैत है ।
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