साधक

“साधक”

सामान्य अर्थमें कोई भी विषय और मार्ग में निष्ठा और लगन के साथ उस विषय और मार्ग के नियमानुसार साधना करने वाला व्यक्ति को साधक कहते हैं । सधक का अर्थ समझने के लिए साधना का अर्थ समझना आवश्यक होता है । ज्ञानमर्ग में साधना का अर्थ इस मार्ग का नियम और गुरु निर्देश अनुसार जो आत्मज्ञान ब्रम्हज्ञान और माया का ज्ञान हुआ है उस ज्ञान में स्थित रहना साधना है । ज्ञान में स्थित रहने के लिए श्रवण, मनन, निदिध्यासन जरुरी होता है । जो व्यक्ति निष्ठा, लगन, इमानदारिता और अनुशासितरुपसे ज्ञान का श्रवण, मनन, निदिध्यासन करते हुए साक्षी भाव यानी कि चेतना में रहता है वही साधक है ।

मनुष्य जीवन का लक्ष्य मुक्ति है । मुक्ति के लिए ज्ञान जरुरी है । ज्ञान के लिए सही साधना आवश्यक है । सही साधना योग्य और असल साधक ही कर सकता है । इसीलिए ज्ञानमार्ग में योग्य साधक ही आगे बढ सकता है, वही मोक्ष और ज्ञानका अधिकारी होता है । केवल स्वयं ही नहीं योग्य साधक ने दूसरों को भी मुक्ति के मार्ग में सहायता कर सकता है । ज्ञानमार्ग को आगे बढा सकता है, गलत कर्म होने से बचाने का प्रयास करता है । इससे स्वतः सान्सारिक दुःख पीडा कम होते है, वैयत्तिक और सामाजिक सच्चरित्र का विकास होता है । सान्सारिक एवं आध्यात्मिक प्रगति तेज हो जाता है । इसीलिए योग्य साधक होना आवश्यक है । 

ज्ञानमार्ग में ज्ञान आर्जन मूल लक्ष्य है और साधक के गुणों का विकास करना उप-लक्ष्य है । योग्य एवं असल साधक होने को लिए साधक में कुछ गुण होना आवश्यक है । मुख्य रुपमें साधक में षट सम्पत्ति (सम, दम, उपरति तितिक्षा, श्रद्धा और समाधान) जैसे गुण होना चाहिए । बुद्धि-विवेक, जीज्ञासा और मुक्ति के इच्छा पहला आवश्यकता है । नैतिकता, अनुशासन, पवित्रता, सदाचार, सत्य निष्ठा, धैर्यता,  सहनशिलता जैसा गुण ज्ञानमार्ग के साधक को मार्ग पर  दृढ निश्चय  का साथ चलने के लिए आवश्यक है । इसी तरह से तार्किकता एवं समालोचनात्मक गुण विकास करना पड़ता है । स्वस्थ शरीर होना और इन्द्रीय को नियन्त्रण करना भी उतना ही जरुरी है । भाषा में शुद्धता, श्रवण, लेखन, बाचन और संचार कौशलता बढाना जरुरी है । श्रद्धा और समर्पण भाव से साधक मार्ग में अविचलित हो कर आगे बढ़ सकता है, अपना विकास तेज प्रगति कर सकता है । इन गुणों में से व्यक्तिका स्वभाव से सम्वन्धित गुण जन्म सिद्ध होते हैं । सीप और क्षमता सम्वन्धी गुणों को अभ्यास एवं प्रशिक्षण के माध्याम से विकसित किया जा सकता है । गुण, बुद्धि और ज्ञानका आपसी अन्तरसम्वन्ध होता है । एक को विकास करते ही दूसरा अपने आप विकास और शुद्धिकरण होता है । इसप्रकार से एक योग्य साधक तैयार होता है ।

जिस मनुष्य में मुक्ति का इच्छा है उसमें साधक होनेका सम्भावना हो सकता है, परन्तु यहाँ पर बात रुचि और तैयारी का है । साधक के गुण विकास के लिए सर्वप्रथम साधक स्वयं ही तैयार रहना पड़ता है । जब साधक तैयार रहता है, तब मार्ग और गुरु तैयार मिलते हैं । गुरु निर्देश का पालना, स्वयं का नियमित साधना और अभ्यास, विभिन्न सत्सङ्ग एवं साधक समुह में सहभागिता आदि द्वारा साधकका विकास सम्भव है । स्वयं का ज्ञान और साधना के बाद दूसरों को भी ज्ञान और मुक्ति के दिशा में सही दिशा निर्देश करना योग्य साधकका कर्तव्य है ।

यदि सैद्धान्तिक तवर से देखा जाये तो जितने भी अनुभव है, वो सब मुक्ति के दिशा में अग्रसर है, इसीलिए जैसे अनुभव असीमित है वैसे ही साधक और साधना का सम्भावना भी असीमित हो सकता है । उदाहरण के तौर पर हम किसि भी अनुभव को ले सकतें हैः- मनुष्य और हर जीव उपरी स्तर और मोक्ष के लिए साधनारत है । यहा तक कि मिट्टि और पत्थर को ही ले लें, मिट्टि उर्वरता बनाए रखने के लिए साधनारत है । पत्थर कठोरता बनाए रखने के लिए साधनारत है । यदि व्यवहारिक दृष्टिकोण से देखाजाए तो जितने भी मार्ग है और इन पर जितने भी साधक व्यवस्थितरुपसे चल रहे हैं वो सभी साधक है । ज्ञानमार्ग पर मार्ग के नियम और गुरुका निर्देश अनुसार इमादारी और निष्ठापूर्वक जितने भी व्यक्ति साधनारत है वो सभी साधक है ।

जो साधक ज्ञानमार्ग में व्यवस्थित रुपसे आ पाया है उसका विकास के लिए गुरुक्षेत्र कि कृपा एवं तैयारी पहले से है और जब मर्ग पर आया है तो साधक के प्रगति के लिए सही समय यही है । यदि मार्ग पर नही है तो जब साधक आवश्यक गुणों को विकास करके तैयार रहता है तब ही साधना और योग्य साधक बनने के लिए सहि समय आता है । इसके लिए पूर्वजन्म के साधना और कर्मफल का भी भूमिका होता है । यदि कोई व्यक्ति अब तक योग्य साधक नहीं बन पाया तो भी “जब जागा तब सबेरा” ये समझकर सही मार्ग पर चलना चाहिए । 

इसप्रकार उचित मार्ग पर सही ढंग से जिसने उपयुक्त साधना कर रहा है वही साधक है । केवल स्वयं को मनुष्य जीवन से मुक्त करने के लिए ही नहीं जो तैयार एवं इच्छुक है उनको भी सही और उचित मार्गदर्शन करके मुक्त करवाने के लिए योग्य साधक आवश्यक होता है । स्वयं के साधना, गुरु के निर्देश, सत्सङ्ग के उपयोग, प्रशिक्षण आदि द्वारा साधक के गुणों को विकास किया जा सकता है । हर अनुभव विकास और मुक्ति के दिशा में अग्रसर है परन्तु जो तैयार है उसने सही गुरु सही विधि और उपयुक्त मार्ग पकड कर आगे बढना चाहिए ।


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