करुणा

करुणा

सभी जीव वस्तु आदि अनुभव के प्रति प्रेम का भाव करुणा है । ये ब्रम्ह का गुण है,   सभी जीव में अन्तर्निहित दया और स्नेह भाव है, जो दूसरों के प्रति दर्शाया जाता है, निभाया जाता है । ये भाव सभी अनुभव में होता है, लेकिन निर्जीव के तुलना में संजीव और संवेदनशील प्राणी में प्रकट रुपमें पाया जाता है । 


करुणा ब्रम्ह का स्वभाव है, शाश्वत है, इसीलिए “करुणा” शब्द स्वयं बिना कारण ही है,  फिर भी करुणा का प्रयोजन दिखाया जा सकता है । सभी अनुभव के विकास क्रम और उत्तरजीवीता के वही आवश्यकता और वही प्रक्रिया होता है । करुणा का कारण ही वृक्ष फल देता है, नदी जल देता है, और पवन प्राण वायु देता है । सभी में किसी न किसी से आपसी अन्तरनिर्भरता होता है । माँ और बच्चे, गुरु और शिष्य आदि के बीच अपने अपने भूमिका निर्वाह करने के लिए करुणा आवश्यक होता है । इसी प्रकार से किसी एक ज़रूरतमंद कि कठिन परिस्थितियों में दूसरों का सहारा चाहिए होता है । इसके लिए भी करुणा का भाव होना ज़रूरी है ।


सभी अनुभव एक ही तत्व से बना है । जीव जिसमें अधिक संवेदना है उसमें तो है ही, निर्जीव वस्तुओं में भी करुणा का भाव होता है, क्यूँकि हम देख रहे हैं कि सभी वस्तुओं का अपना अपना महत्व, प्रयोजन और उपयोगिता है, ये करुणा का कारण ही तो है ।


करुणा होने या बनने का कोई प्रक्रिया नहीं है, ये स्वयं ही उत्पन्न होता है, फिर भी किसी उपाए से करुणा का भाव जगाया जा सकता है । क्यूँकि किसी में ये भाव निष्क्रिय होता है, और किसी में पूरी तरह से जागा हुआ नहीं होता है । जीव के अन्य गुण-अवगुण, परिस्थिति एवं स्वभाव के भीतर छुपा हुआ होता है । अज्ञान एवं ज्ञान के स्तर अनुसार न्यूनाधिक मात्रा में प्रकट हो सकता है । ज्ञान के माध्यम से करुणा का भाव जगाया जा सकता है । सत्य और मिथ्या पता चलते ही व्यक्ति में विवेक और सम भाव आ जाता है । दूसरों को भी अपना ही स्वरूप जानते ही करुणा का भाव स्वतः आ जाता है । दया, स्नेह, नैतिकता, सदाचार, सत्य निष्ठा, ईमानदारीता आदि जैसा सद्गुण बढ़ाने से करुणा भाव स्थापित होने लगता है, और काम करने लगता है । निर्जीव वस्तुओं से करुणा का भाव स्वतः ही न्योछावर होता है क्यूँकि ये अस्तित्व का ही गुण है ।


करुणा का भाव पूरी अस्तित्व में व्याप्त है, इसीलिए तो विकासक्रम और उत्तरजीवीता वृत्ति सम्भव हुआ है । सभी का संवेदना और करुणा का श्रोत एक ही है । जीव में तो है ही, निर्जीव में भी है । यदि निर्जीव में करुणा का भाव नहीं होता तो ज़मीन आश्रय और फसल नहीं भी दे सकता था, आसमान सन्तुलन बनाना छोड़ देता, सूर्य प्रकाश देना इन्कार कर देता । हवा और पानी बहना छोड़ देता । इस प्रकार अस्तित्व के सारे अनुभव आपसी अन्तर्निर्भरता पर टिका है, जिसका आधार करुणा है ।


जब से अस्तित्व है, तब से करुणा भाव भी है, अनादि से लेकर अनन्त तक अस्तित्व में व्याप्त रहेगा । विकास क्रम में निर्जीव के तुलना में जीव में चेतना, बुद्धि, और संवेदना के स्तर अनुसार करुणा का भाव प्रकट होता है । मनुष्य में चेतना का स्तर जितना बढ़ता जाता है, करुणा भी उतना ही अधिक स्पष्ट रुपमें प्रकट और उपयोग होता जाता है । निर्जीव वस्तुओं में अन्तरनिर्भरता और सन्तुलन के लिए जितना आवश्यक होता है उतना ही उपयोग किया जाता है ।


इस प्रकार से करुणा अनुभवकर्ता यानी तत्व का स्वभाव होने के कारण सभी अनुभव में व्याप्त है । संसार में दुःख कष्ट कम करने और सुख पूर्ण उत्तरजीवीता के लिए करुणा आवश्यक है ।  आवश्यकता, स्वभाव, ज्ञान और चेतना के स्तर अनुसार करुणा प्रकट एवं उपयोग किया जाता है । इसी भाव के कारण अस्तित्व में सन्तुलन और जीवन सम्भव है ।


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