स्थिरता
स्थिरता
स्थिरता का अर्थ होता
है कि विना चञ्चलता या विना हिले एक जगह पर स्थित होना, अडिगपन होना । स्थिरता में गति नहीं होती है, बहाव नहीं होता है और क्रिया प्रतिक्रिया अधिक नहीं होता है । स्थिरता का क्या
प्रयोजन है ? अर्थात् स्थिरता क्यूँ आवश्यक है ?
स्थिरता शब्द कोई एक
विषय से संबंधित नहीं बल्कि अस्तित्व के तत्व और क़रीब क़रीब हर विषय या अनुभव से
सम्वन्धित है । इसी लिए इसका प्रयोजन भी फ़रक फ़रक होता है । कुछ प्रयोजन इस
प्रकार हैः-
स्थिरता और अस्थिरता
के मानदंड के आधार पर तत्व और नामरुप के भेद पहचान करने के लिए ।
चंचल मन को ध्यान और
साधना के द्वारा नियन्त्रण करने और स्थिर रखने के लिये ।
स्थिरता किस क्षेत्र
पर और कैसे प्रयोग में लाया जा सकता है ?
“स्थिरता” शब्द अस्तित्व के
तत्व और अनुभव के करिव करिव सभी प्रकार में प्रयोग में लाया जा सकता है । तत्व ही
स्थाई यानि कि अपरिवर्तनीय है । अपरिवर्तनीय होने के लिए स्थिर भी होना पड़ता है ।
सभी अनुभव अस्थिर है, क्यूँकि सभी अनुभव नाद आधारित है, नाद में गति है, दोहराव है और चक्र
में चलता है । इसीलिए अनुभव स्थिर होने का प्रश्न ही नहीं उठता । हालाँकि स्थिरता
के समयावधि और मात्रा में शीघ्रता और विलम्ब हो सकता है परन्तु सभी अनुभव अस्थिर
और परिवर्तनशील है ।
ज्ञान के लिए चित्त स्थिर होना पड़ता है । अस्थिर
चित्त से सत्य को जानना मुश्किल होता है ।
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