सन्तुलन

 सन्तुलन 

दो विषयों और पक्षों के बीचमें यथोचित सम्वन्ध कायम रखने के लिए दोनों के बीच का अवस्था ही सन्तुलन हैं । अस्तित्व ही सन्तुलन में टिका है, इसीलिए हर प्रकट अनुभव में सन्तुलन बना हुआ है । यदि कोई इस सन्तुलन पर बिघ्न डालने का प्रयास करता है तो सामान्य अवस्था में उथल पुथल हो सकता है, चाहे वो भौतिक हो, परा भौतिक हो या मानसिक हो । संतुलन शब्द को मनन करने के लिए दो दृष्टिकोण से देखना उचित होता है, एक अमूक शब्द पर आधारित होकर और दूसरा उस शब्द के विभिन्न आयामों पर विहंगम दृष्टिकोण से । यहाँ पर दोनों तरीक़े से मनन करने का प्रयास किया गया है ।


सन्तुलन का कारण बारेमें मनन करने के लिए भी विभिन्न स्तर पर देखा जा सकता है । यदि हम केवल सन्तुलन शब्द को ही लेकर समग्र अस्तित्व के स्तर पर देखें और प्रश्न करें कि सन्तुलन क्यूँ है ? तो उत्तर आएगा कि ये बिना कारण है, बस है, इसि से अस्तित्व टिका है । 

दूसरा दृष्टिकोण से सन्तुलन क्यूँ आवश्यक है ? ये प्रश्न करके बृहत रुपसें दिखें तो विभिन्न उद्देश्य दिखाया जा सकता है, इनमें से ये कुछ उद्देश्य हो सकते है:-

  • सभी अनुभव के बीच में उचित सम्वन्ध के लिए ।

  • सत्य और मिथ्या के बीचमें उत्तरजीविता वृत्ति संचालन के लिए ।

  • सान्सारिकता में रहते हुए आध्यात्मिक प्रगति के लिए ।

इसी तरह से यदि सुक्ष्म रुपसे देखें तो भी हर अनुभव के बीचमें सन्तुलन दिखाई  देता है । शक्ति, जीवन शैली, स्वास्थ्य, सम्वन्ध, व्यवहार आदि उपयुक्त ढंग से संचालन के लिए संतुलन आवश्यक होता है ।


सनतुलन होने का प्रक्रिया मनन, विश्लेषण करने के लिए भी निम्न लिखित स्तर पर देखना उचित होगा:- 

  1. यदि पूरी अस्तित्व के आधार पर देखा जाए तो सन्तुलन कि प्रक्रिया अज्ञेय है, अस्तित्व में सन्तुलन जैसे भी है, बस है, अपने आप सन्तुलन है, माया के लीला से सन्तुलन है, जिसकी कोई प्रक्रिया नहीं है ।

  2. द्वैध के स्तर पर आकर ढुडें तो नाद के परिकल्पना के आधारमें देख सकते है । नाद में चक्रीय परिवर्तन है, और दो अवस्था का परिपर्तन है । इसका मतलव ही है कि यहाँ पर सन्तुलन स्वभाविक रुप से है । हर अनुभव का चक्रीय रुपमें दो अवस्था मे विस्तार/फैलावट होता है । ये प्रक्रिया में मध्य विन्दु तो अवश्य होता है, यहि सन्तुलन है ।

  3. यदि सृष्टि के स्तर पर आकर देखें तो ग्रह नक्षत्रों के बीच गुरुत्वाकर्षण और विकर्षण के कारण सन्तुलन है । प‌ंचमहाभूत के कारण जीवन में सन्तुलन है । सत्य असत्य बीच जीवन को सन्तुलित बनाने के लिए विसत्य को प्रयोग में लाया गया है ।


अस्तित्व ही सन्तुलन पर टिका है । सभी भौतिक और मानसिक अनुभव में सन्तुलन है । ग्रह नक्षेत्रों के बीच, पंचमहाभूत के बीच, ठण्डा-गरम के बीच, सुख-दुख के बीच, दिन-रात के बीच, जीवन-मृत्यु के बीच सन्तुलन है । उत्तरजीवीता के हर क्षेत्र में सन्तुलन है । वातावरणीय सन्तुलन, परिस्थितियों के बीच सन्तुलन, जीवन शैली में सन्तुलन, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में सन्तुलन, सान्सारिकता और आध्यात्मिकता के बीच सन्तुलन आवश्यक है ।


अस्तित्व के स्तर पर सन्तुलन भी अनादी से अनन्त तक है । अहम के स्तर पर व्यक्ति के व्यवहार में निर्भर होता है कि अपना जीवनका प्रगति और आध्यात्मिक प्रगति पथ में कब किस प्रकारका सन्तुलन बनाना है, वो उसका कर्म से निर्धारित होता है, और उचित समय पर कर्मफल मिलकर सन्तुलन बनता है । 


कर्ता तो कोई नहीं है, इसीलिए सन्तुलन किसी से नहीं होता फिर भी जीव या अनुभव के माध्याम से विश्वस्मृति में जो संस्कार पडे हैं उसी से उत्तरजीवीताका भी सन्तुलन बनता है । माया स्वयं अपनी लीला से संतुलन बनाती है ।


सन्तुलन को परिभाषित करने के लिए भी अस्तित्व के तरह ही शाश्वत रुप से देखना चाहिए । सन्तुलन दो अवस्था के बीचका अवस्था है । इसीलिए ये शुन्य में ही होता है । अस्तित्व में यही द्वैत और अद्वैत का भी बीचका, यानि कि विलय का अवस्था है । अवस्थाओं में यही सन्तुलन समाधि की अवस्था है । इस प्रकार से सभी भैतिक, अभैतिक, परा भौतिक, परा मानसिक आदि सभी अनुभव आपस में सन्तुलित रुपसे जुडे हुए है, यानी कि सन्तुलन में टिके हैं । मनुष्य ने इस प्राकृतिक सन्तुलन पर अनावश्यक रुपमें प्रयोग करके, विभिन्न तरह के विघ्न डालने से भौगोलिक, वातावरणीय एवं जीवन वृत्ति में भी अनेकानेक असन्तुलित प्रभाव दिखाई दे रहें हैं । इस पर समय में ही सचेत हो कर प्रकृती के प्रति उचित व्यवहार आवश्यक है । नहीं तो माया के उपर मनुष्य का खिलवाड़ का प्रभाव भयंकर हो सकता है ।


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