श्रद्धा
कोई व्यक्ति के गुण, महत्व, अच्छाइयाँ, आदर्श आदि से प्रेरित होकर उनके प्रति उत्पन्न होने वाला सद्भाव, आदर भाव, निष्ठा, आस्था और विश्वास को श्रद्धा कहते हैं । “श्रद्धा” श्रद्धालु और उसके आदर्श व्यक्ति या गुरु बीच का समर्पण और प्रेम का भाव है ।
कोई श्रद्धालु विशेष व्यक्ति को अपना आदर्श मानकर उनके उपर अगाध श्रद्धा रखता है । क्यूँकि उनके और अपने रुचिकर मार्ग, विचार और भावना मिलता है, यानी की जिससे मिलता है उसी को अपना आदर्श मानता है । उस मार्ग में अविचलित रुपमें अनुशासित हो कर चलने के लिए उनके उचित मार्ग निर्देशन आवश्यक होता है । जिसका निर्देशन सही हो, अपने हितों में हो, उसके आज्ञा को ब्रम्ह वाक्य के तरह लगता हो और पालन करने में आनन्द महसूस होता हो वही किसी का आदर्श या गुरु होता है ।
श्रद्धा दिल से होता है, बिना शर्त होता है, और बिना कोई अपेक्षा के होता है । क्यूँकि श्रद्धा में पूर्ण विश्वास अन्तर्निहित होता है, आदर्श व्यक्ति या गुरु ने जो भी करेगा अपने भले के लिए ही होगा, ये विश्वास होता है, पूर्ण समर्पण होता है । जहाँ निःस्वार्थ प्रेम होता है वही श्रद्धा होता है, इसीलिए श्रद्धा प्रेम का पूरक भी है । श्रद्धा का जो भाव है, उसको बड़ी निष्ठा पूर्वक पालन किया जाता है । गुरु या आदर्श व्यक्ति ने जब कोई कर्म करने या न करने के लिए निर्देश देता है, कोई सच्चा साधक या श्रद्धालु हो तो उसका पूरी तरह से पालन करेगा । उसके विपरीत जाने का प्रयास भी नहीं कर सकता, यदि किया भी तो उसके दिल को कभी भी स्वीकार्य नहीं होगा, और ऐसा प्रयास सफल भी नहीं होगा । श्रद्धा में इतना ताक़त होता है ।
जो व्यक्ति जैसा है, उसने अपने ही अनुकूल का अपना आदर्श व्यक्ति ढूँढता और पाता है । ख़राब और व्यभिचारी व्यक्ति का आदर्श वैसा ही व्यक्ति हो सकता है । जो संसार में लिप्त हो, प्रगति और मुक्ति के इच्छा न हो तो उसका कोई आदर्श व्यक्ति या गुरु नहीं भी हो सकता है । एक योग्य साधक ने जिन व्यक्ति या गुरु का लक्ष्य पवित्र हो, निःस्वार्थ हो, सेवा और जीव-कल्याण के लिए हो, जिसमें सत्य-असत्य पहचान करने के क्षमता और विवेक हो, जिसने अज्ञान नाश करके मुक्ति दिलवा सकता है, उनको ही अपना आदर्श व्यक्ति या गुरु मानेगा, उन्हीं पर पूर्ण श्रद्धा से समर्पित हो जाएगा ।
जहाँ स्वार्थ और आसक्ति हो वहाँ, श्रद्धा नहीं हो सकता, वो श्रद्धा नहीं है, वो तो चापलूसी है । श्रद्धा निष्कपट होता है । अन्ध श्रद्धा भी उचित नहीं है । क्यूँकि वो आदर्श व्यक्ति या गुरु भी मनुष्य है, यदाकदा वो भी ग़लत हो सकता है । यदि आदर्श व्यक्ति या गुरु से कोई त्रुटि हो गई या अपना आदर्श विचलित भी हो गया तो उस त्रुटि या विचलन पर शुद्ध भाव और प्रेम से निवेदन करना चाहिए, ताकि कोई हानि होने से बचा सके, गुरु या व्यक्ति का, अपना और अन्य सभी का कल्याण हो सके ।
श्रद्धा को क़ायम रखने के लिए श्रद्धालु का ही भूमिका प्रबल होता है । क्यूँकि उसी ने किसी को उपयुक्त समझ कर अपना आदर्श मान लिया था । श्रद्धा में इतना बल भी होता कि आवश्यकता पड़ने पर अपना आदर्श को भी विवश कर सके ।
पूर्ण श्रद्धा ही फलदायक होता है, पूरी मन से होनी चाहिए, आधा अधूरा नहीं । एक बार हुआ तो फिर टूटता नहीं और फेरबदल होने वाली चीज़ भी नहीं है श्रद्धा । घटनेवाली और बढ़ने वाली चीज़ भी नहीं है । यदि घट-बढ़ हुआ तो वो श्रद्धा नहीं स्वार्थ पूर्ण सम्बन्ध था जो लेनदेन के आधार पर घट-बढ़ हुआ ।
श्रद्धा एकत्व का आधार है, दो को एक करने की कड़ी है । प्रेम का बन्धन है, विश्वास का धागा है और निष्ठा का फल है । श्रद्धा पवित्र और बिना शर्त होता है, ये एक ऐसा विश्वास है, जिसने अपना आदर्श स्थापित करता है, और उसी के मार्ग पर निश्चिंत होकर पूरा समर्पण के साथ चलता है ।
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