विसत्य

 विसत्य

जो सत्य नहीं है और माया के स्तर पर असत्य भी नहीं माना जा सकता उसको ही विसत्य कहते हैं । सत्य एक ही है, जो अपरिवर्तनीय है और वो अनुभवकर्ता है । सभी अनुभव परिवर्तनशील है इसलिए है तो असत्य लेकिन उत्तरजीविता के लिए विसत्य के रुपमें ले कर आवश्यकता अनुसार व्यक्ति निष्ठ मानदंड के आधार में सत्य, असत्य और विसत्य के रूप में विभाजन किया जाता है ।


माया के स्तर में विसत्य ही काम आता है । उत्तरजीवीता संचालन के लिए, अहम वृत्ति के रक्षा के लिए, सुखदायी जीवन के लिए, अन्तर वैयक्तिक व्यवहार निर्धारण और संचालन के लिए, साझा सहमति और वस्तुनिष्ठता आदि प्रयोजन के लिए विसत्य आवश्यक है ।


सत्य को नहीं जाना जा सकता है, ये अन्तिम तत्व है, और एक ही है । माया का मिथ्या-असत्य जान कर छोड़ देने से विकास क्रम सम्भव नहीं है । इसीलिए विसत्य व्यक्ति निष्ठ मानदंड के आधार में निर्धारित होता है । देश, समाज, परिवार और व्यक्ति के स्तर और आवश्यकतानुसार अलग-अलग सत्य (विसत्य) होता है, एक के सत्य दूसरों के लिए असत्य हो सकता है ।


उसी तरह से एक सन्दर्भ का सत्य दूसरी सन्दर्भ में असत्य हो सकता है, एक समय का सत्य दूसरे समय में असत्य हो सकता है । इस प्रकार से विसत्य समय और सन्दर्भ अनुसार भिन्न होता है, बदल जाता है ।


विसत्य हमेशा द्वैत में है, इसीलिए हर अनुभव और हर लोक में भिन्न हो सकता है । विसत्य का मानदंड देश के स्तर में सरकार, परिवार के स्तर में घरमुली और व्यक्तिगत स्तर पर व्यक्ति ही निर्धारण करता है । जीतने विषय और उपयोगिता है उतना ही विसत्य का मानदंड होते हैं, इस का कोई सीमा नहीं है ।


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