गुरुक्षेत्र

 गुरुक्षेत्र


ज्ञान प्रसार के समग्रता गुरुक्षेत्र है । गुरुक्षेत्र में ज्ञानका श्रोत, ज्ञानका भण्डार, ज्ञानका संयोजन, ज्ञनका व्यवस्थापन, ज्ञानका प्रत्यक्षीकरण आदि ज्ञान से सम्वन्धित सभी विषय और इन विषयों को प्रकट करनेवाला सभी प्रकट अस्तित्व आ जाता हैं । विशेष रुप से ज्ञानको प्रत्यक्षीकरण करानेवाला, अज्ञानका नास करानेवाला, अँधेरे से उजाले की ओर ले जानेवाला बुद्धिमान, स्वचेतन और मुक्त चित्त के श्रेणी में रहनेवाले सभी ज्ञानी जन, ऋषि मुनी आदि से संयुक्त क्षेत्र ही गुरुक्षेत्र है ।


अस्तित्व में प्रकट और अप्रकट दो भाग एक सिक्के कि दो पहलू कि तरह है । अप्रकट सत्य है, और प्रकट मिथ्या है । हम सभी इसी माया में जी रहे हैं । इसका कारण भ्रम और अज्ञान है, जो माया का लीला है । माया इससे निकलने नहीं देती । परन्तु प्रकट अस्तित्व के विकासक्रम में मानव चित्त इस स्तर तक पहुँच गया है कि अपने बुद्धिके द्वारा माया के मिथ्या खेलको समझ सके, और अपना सत्य स्वरुपको जान सके । इसि उद्देश्य हेतु गुरुक्षेत्र कि रचना हुई है, यानी कि अज्ञानी जनोंको उनका अज्ञान हटाके सत्य स्वरुप दिखानेके लिए गुरुक्षेत्र कि आवश्यकता है ।


गुरुक्षेत्र ने विभिन्न माध्यामद्वारा ज्ञान प्रसार कर के उल्लेखित उद्देश्य हासिल करने के लिए विभिन्न लीलाएँ होते है जैसे किः-

  • अज्ञान से कैसे मुक्ति पाया जा सकता है वो खोज करके,

  • नेति नेति विधि के द्वारा अपने मिथ्या और सत्य स्वरुप को पहचान करके, 

  • किस स्तरके अज्ञान और अज्ञानी को किस माध्याम और किस तरह से अज्ञान से निकाला जा सकता है उस स्तर के अनुसार उपयुक्त विधि और माध्यामको अवलम्वन करके,

  • प्रत्यक्ष गुरु-साधक वार्ता, छलफल एवं प्रश्नोतर करके,

  • अप्रत्यक्ष रुपमे किसी भी रुप में प्रकट होकर, 

  • व्यक्ति के विकास, प्रकृति और स्वभाव अनुरुप उपयुक्त मार्ग अवलम्वन करने के लिए सल्लाह एवं सुझाव प्रदान करके, 

  • उस मार्गमें प्रगति करने के लिए आवश्यक सहायत करके,

  • कैसै प्रगति हो रही है उसको परीक्षा, समिक्षा एवं मूल्यांकन करके,

  • परोक्ष एवं अपरोक्ष रुपसे साधकको विभिन्न कृपा करके,

  • आवश्यकतानुसार उपयुक्त सबक़ सिखा के भी गुरुक्षेत्र द्वारा ज्ञानका प्रसार होता है ।


माया में कर्म के अनुसार फल आते हैं । कर्म, फल भोग, और कर्म बन्धन से मुक्ति के लिए सोहि अनुरुप के व्यक्ति के द्वारा कर्म होते हैं । इसी अनुसार व्यक्तिका अवतरण और आरोहण होता हैं । ये क्रम मे व्यक्ति किस समय किस प्रकार के कर्मबन्धन में है और उसको उस बख्त किस तरहके ज्ञान ज़रूरी है सोही अनुरुप उपयुक्त समय में उपयुक्त ज्ञान देता है । इस तरह से ज्ञानार्जनका उपयुक्त समय व्यक्ति का विकासक्रम, आध्यात्मिक प्रगति, जिज्ञासा और मुमुक्षत्व मे निर्भर होता है ।


गुरुक्षेत्रका प्रकट और अप्रकट दोनों रुप है । अप्रकट रुपमें ज्ञानी जनों के अपरोक्ष अनुभव और तर्क के आधार में गुरुलोक कहा गया है । प्रकट रुप मे समग्र गुरुक्षेत्र के प्रतिनिधित्व करके गुरुव्यक्ति प्रकट होता है । इस प्रकार गुरुव्यक्ति, सत्संग, आश्रम, ज्ञानालय सभी अनुभव और प्रकट अस्तित्व में गुरुक्षेत्र विद्यमान है । गुरुक्षेत्र स्थान से परे है । 


अस्तित्व में स्वयं को जानने कि क्षमता होता है, और यही क्षमता ही गुरुक्षेत्र है । इसीलिए गुरुक्षेत्र स्वयं अस्तित्व है । गुरुक्षेत्र किसी भी रुपमें प्रकट हो सकता हैं । किसि घटना के रुपमे, वस्तु के रुप में, जीव के रुपमें, व्यक्ति के रुपमें,  ऋषि-मुनी के रुपमें, चित्त के रुपमें, स्थान के रुपमें (नदी, पहाड़, हिमाल, जंगल, उद्यान आदि), समय के रुपमें । इन विभिन्न रुप में प्रकट होकर कुछ न कुछ ज्ञान देते हैं ।


आत्मज्ञान, मायाज्ञान और ब्रम्हज्ञान के मूल ज्ञान तक गुरुक्षेत्रका व्यापकता देखा जाता है । इसके आगे जानने के लिए कुछ नहीं है । इसीलिए गुरुक्षेत्र के विषय में भी कुछ नहीं कहा जा सकता । सत्य यानि कि अनुभवकर्ता के स्तरपर ज्ञानका सीमा समाप्त हो जाता है, क्यूँकि मनुष्य बुद्धि के सीमा मे गुरुक्षेत्र और अनुभवकर्ता को नहीं जाना जा सकता अज्ञेय है ।


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