१ चेतना और साक्षीभाव क्या है
साक्षी भाव आत्मज्ञान और अनुभवकर्ता के ज्ञान के साथ चेतना में स्थिर रहना है । सभी अनुभव का दृष्टा मैं हूँ ये आत्मज्ञान के भाव मे रहना, चेतना और साक्षी भाव है । साक्षी भाव अनुभव नहीं है ये एक सूक्ष्म वृत्ति है, चित्त की एक अवस्था, योग्यता है, और एक उन्नत चित्त वृत्ति है जो आता जाता है । जिस पर ध्यान है उसका अनुभव कर्ता मैं हूँ ये भाव रहता है । में ही अनुभव कर्ता हूँ ये आत्मज्ञान है । आत्मज्ञान स्वयका तत्व को जानने से होता है, अनुभवकर्ता का ज्ञान होने से होता है ।अनुभव कर्ता को अनुभव से नहीं जाना जाता है । उसका अनुभव नहीं होता और उस पर ध्यान भी नहीं जाता केवल होने का भाव आता है ।
साक्षी भाव अनुभव कर्ता द्वारा नहीं किया जा रहा है । वो तो इस भाव का भी साक्षी है । इसको स्थाई करने के लिए लगातार साधना आवश्यक है और साधना बहुत प्राकृतिक होना चाहिए । आत्मज्ञान के स्मरण से ही साक्षी भाव आ जाना चाहिए । विचित्र स्थिति नहीं है, बहुत सरल है । ये करने वाले नहीं होने वाली चीज़ है । चेतना आत्मज्ञान से आती है केवल शारीरिक, मानसिक गतिविधियों को साक्षीभाव से देखने से मात्र स्थिर नहीं हो जाती । चेतना स्वयं प्रकाशित अनुभवकर्ता का छाया है । जब ध्यान में अनुभव कर्ता का ज्ञान सम्मिलित होता है वो चेतना होता है । ये प्रयोगिक विषय है ।
चित्त के ज्ञान का आध्यात्मिक प्रयोग महत्वपूर्ण है । चित्त पर नियंत्रण कर के सांसारिक पीड़ा, दुख, कष्ट कम करने के लिए, मनोविकार और व्यसन हटाने के लिए, शारीरिक स्वास्थ्य तंदुरुस्त रखने के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है । श्रावण, मनन, निदिध्यासन ज्ञान प्राप्त करने विधि हैं । अनावश्यक इच्छा पर नियंत्रण कर के कर्म और कर्मफल को नियंत्रण किया जा सकता है ।
ध्यान और चेतना दोनों चित्त का अवस्था है । ध्यान में वस्तु पर ही ध्यान होता है, और अधिकतर एक ही इन्द्रिय का प्रयोग होता है । अन्य अनुभव और इन्द्रिय को अनदेखा कर दिया जाता है, नकारा जाता है । चेतना में सभी अनुभव का ज्ञान, मेरे होने का ज्ञान और अनुभव कर्ता का ज्ञान होता है । अनुभव कर्ता जो सभी अनुभवों का साक्षी है वो अस्तित्व स्वयं है । जब ध्यानमें अनुभव कर्ता आ जाता है चित्त की वृत्ति चेतना में बदल जाती है । चेतना अनुभव कर्ता का ही प्रतिबिम्ब है, जिसमें चित्त के द्वारा ये ज्ञान होता है कि अनुभव कर्ता है । ज्ञान के बिना गतिविधियोंको देखना केवल एक यांत्रिक प्रक्रिया ही रह जाता है ।
अनुभव कर्ता का सीधा ज्ञान कभी भी नहीं होता । जब तक चित्त में प्रतिबिम्बित नहीं होता तब तक उसका ज्ञान नहीं होता । जो भी अनुभव हो रहा है उसका अनुभव करने वाला भी है ये ज्ञान स्मृति में जब जाता है तब चेतना बनता है । अनुभव कर्ता और चित्त/अनुभव के बीच का मिलन बिन्दु चेतना है । जब साधक यहाँ पर स्थित हो जाता है तो ये सविकल्प समाधि होता है, समावेशी ध्यान से यहा तक पहुचा जा सकता है । चेतना में अनुभव कर्ता का होना अनिवार्य है । साक्षीभाव में कर्ता का नाश होता है, केवल कर्म के साक्षी का भाव रहता ।
अनुभव और अनुभव कर्ता को जानने के लिए दृश्य द्रष्टा भेद जानना आवश्यक है । ये अनुभव और अनुभव कर्ता का भेद मूल ज्ञान है । यहीं से सारा अध्यात्म शुरू होता है। यदि भेद नहीं किया तो अध्यात्म पर आगे बढ़ना असंभव है । ये भेद जानने के लिए बड़ा सूक्ष्म अंतर है, थोड़ा सा ध्यान देना पड़ेगा यह चित्त वृत्ति है या नहीं । केवल समझने के लिए हम इस तरह का भेद करते है, क्या चित्तवृत्ति है, क्या चेतना है,क्या अनुभव है,क्या अनुभव कर्ता है, समझने के लिए भेद करते है, हैं तो एक ही चीज़ सब कुछ मैं ही हूँ, सब कुछ आत्म ही है, जो ध्यान दे रहा है, वो भी मैं हूँ, जिसका ध्यान नहीं है वो भी मैं हूँ, जिसकी चेतना है, वो भी मैं हूँ, जो अचेतन है वो भी मैं हूँ, ये तो खेल है। ये तो केवल जागृति की सीढ़ियां हैं। कोई नीचे हैं, कोई ऊपर हैं। इन सभी अनुभवों में जिसको अनुभवों का ज्ञान होता है, वो प्रकाश है, वह शून्यता है जहाँ पर सभी अनुभव आकर गिरते हैं, जहाँ पर सभी अनुभव अपनी छाप छोड़ते है, शुद्ध ज्ञान है,अनुभव का जो भी अनुभवकर्ता है, वही आत्म है, वहीं ब्रम्ह है, वही स्वयं प्रकाशित सच्चिदानंद है, जो कोई वस्तु नहीं है जो, कोई अनुभव नहीं है,अनुभव कर्ता है।
२) साक्षी भाव का प्रयोजन क्या है ?
साक्षी भाव का मुख्य प्रयोजन आत्मज्ञान में स्थित रहना है । अनावश्यक और ग़लत वृत्तियों को नियन्त्रण करना है । मुक्ति के मार्ग में आगे बढ़ना है । इसको विस्तार से इस प्रकार बताया जा सकता हैः-
जो आत्मज्ञान और चेतनाका उद्भव हुवा है उसको बनाए रखने के लिए
एक बार जब चेतना का उद्भव हो गया तो भी व्यक्ति फिर मन की निचली प्रक्रिया में बार बार उलझता रह सकता है । निचली प्रक्रियाओं को नियंत्रण में लाने के लिए कई वर्ष लग जाते है । ऐसा क्यों होता है कि चेतना का जागृत होना कोई जादू नहीं है, कोई चमत्कार नहीं है, प्राकृतिक घटना है । जब भी हमारा जीवन किसी समस्या में पड़ जाता है, कुछ संघर्ष सामने आ जाता है, कोई स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसमें जीवन को खतरा हो तो ऊपर के परते निष्क्रिय हो जाते हैं और निचली परतें इस शरीर को पूरा नियंत्रित करती है। संपूर्ण मन को निचली परत नियंत्रित करती है। तब वहाँ पर ना चेतना रहेगी,न बुद्धि चलेगी,ना कुछ और चलेगा । व्यक्ति क्रोधित हो जाएगा, डर जाएगा, अनावश्यक कर्म करेगा । ये स्वाभाविक है । जब वो घटना होकर चली जाती है तो फिर बुद्धि वापस आती है, फिर चेतना आती है, गलत करनेका पश्चाताप करेगा । अनेक विचार फिर आएँगे। उसके बाद बुद्धि चलना शुरू हो जाति है । चेतना आती है लेकिन अधिक देर रहती नहीं है । ये स्वाभाविक है ।
जब तक जीवन है, जब तक हम है, जब तक इस शरीर को सुरक्षा की, खाने पीने की आवश्यकता है, जब तक प्रजनन की आवश्यकता है, तब तक निचली परतें ही आती जाती रहेंगी, तब तक उन्हीं का नियंत्रण रहेगा। हमको ये जीवन छोड़कर सिर्फ चेतना में बैठ जाना नहि है । मन के दरवाजे बंद करके अंधेरे में बैठ जाना नहि है । यहाँ हम अनुभव लेने आए हैं, अनुभवों को ही बंद करना नहि है । जिसके लिए आए हैं वो करना है, भले अपना कोई इच्छा हो, भले ही जन कल्याण या सेवा करना चाहते हैं वो करना है । एक ही बात ध्यान रखनी है की ये संपूर्ण चेतना में हो । निचली परतों को नष्ट करके नहीं ।
पुरानी वृत्तियां नियन्त्रण करने और सन्तुलनमे रखने के लिए के लिए
पुरानी वृत्तियां बड़ी शक्तिशाली है । इस का अर्थ ये नहीं कि उन पुरानी वृत्ति, उन भावनाओं को विचारों को पूरी तरह से मार डाले, जो प्राकृतिक है, जो आवश्यक है उसको होने दें । जो अनावश्यक है उसको खत्म कर दे। उसकी जगह चेतना ले आये। जितनी जल्दी ला पाए, उतना अच्छा है। जब तक चेतना स्थायी नहीं हो जाती, जब आवश्यकता पड़ती है निचली परतें आकर सक्रियता पूर्वक इस चीज़ को चलाएंगे । वो प्राकृतिक है। उस घटना से चेतना को नियंत्रित करने में जो भी सबक मिला है सीख ले । इससे धीरे धीरे चेतना का अपने आप नियंत्रण आ जाता है। बुद्धि पर भी नियंत्रण आ जाएगा। अब चेतना के प्रकाश में अनावश्यक विचार या अतार्किक मान्यता, अंधविश्वास अपने आप नष्ट हो जाएंगे ।
वृत्ति आएँगे, अपना काम करेंगे। क्योंकि ये मनोशरीर यन्त्र को तो चलने के लिए बनाया गया है। सारे वृतियों को हटाकर चेतना चलेगी ऐसा नहीं है । सभी वृत्तियां चलती है, उसके ऊपर चेतना चलती है। चेतना बाकी वृत्तियों मैं जुड़ जाती है । हमारी ये मान्यता है कि जब मैं चेतना पे रहूँगा तो बाकी कुछ होगा ही नहीं। ये सोचते हैं कि मुझे ये कार्य करना है। चेतना कोई कार्य नहि हैं। यदि मैं एक कार्य कर रहा हूँ तो दूसरा कार्य नहीं कर पाऊंगा ऐसा नहि होता । अभी हम जो कुछ भी कार्य कर रहे हैं लेकिन हमारी बुद्धि चल रही है, विचार चल रहा है, इन्द्रीय काम कर रही है, भावनाएँ चल रही होती है, ये समानांतर रूप से कार्य करती है। इसको कार्य समझना नही हैं ।
ज्ञान मार्ग में हम इसको होने देते हैं, लेकिन चेतना में होने देते है । कभी कभी चेतना फिसलेगी, इधर उधर जाएगी, जव पशु वृत्ति बहुत अधिक हो जाति है तो कभी कभी मनुष्य वृत्ति ऐसा हो जायेगा । एक दो महीने बाद जब उस पशु योनी की यात्रा से वापस आएँगे तब वापस ऊपरी परतों में ध्यान लगाना है। वापस चेतना के नियंत्रण में रहना है। ये चलता रहेगा।
ज्ञान मार्ग में शक्ति होती है। मार्ग बार बार खींच लेगा । यदि पुराने निचली वृत्ति मे अधिक लग गए तो वो मार्ग वापस खींच लेता है । प्रकृति माँ स्वयं साथ देगी, क्योंकि प्रकृति माया हमारे संकल्प पर चलती है। यदि आपकी चेतना बार बार गिर रही है, इसका अर्थ यह नहीं कि अब होगा ही नहीं, शुरूआत में ये होता है, चलते जाना है । गिरेंगे फिर पकड़के चलते जायेंगें ।
चित्त शुद्धि, सिद्धि और ज्ञानके लिए
परत के विकास क्रम में चेतना अलग सी परत है। ये कुछ ही व्यक्तियों को मिलती है। ये एक छोटी सिद्धी है। तभी आती है जब गुरुक्षेत्र से संपर्क हो जाता है। जब घर में तोता पालते हैं तो आवाज सुन सुन के वो बोलना सीख जाता है, इसी तरह से हम जब गुरु क्षेत्र के संपर्क में आते है तो वहाँ से जो भी प्रसारण हो रहा है, बारिश की तरह जो भी ज्ञान नीचे गिर रहा है उस की तरंगें उस तरह के नाद के संपर्क में हम आते हैं और हमारा प्राकृतिक रूप से विकास होता है। प्राकृतिक रूप से चेतना बनी रहती है, प्राकृतिक रूप से ही शुद्धीकरण होता है, कुछ नहीं करना पड़ता है।
देव योनी में भी मनुष्य चक्र होते हैं। जिस तरह से मनुष्य योनी में पशु चक्र है, सारी पशुता मनुष्य में है, इसमें कोई बुराइ नहीं। ऐसा ना हो तो मनुष्य योनी समाप्त हो जाएगी, लुप्त हो जाएगी। दो ही विकल्प है, जो नया रास्ता देखा है उस पर चलते जाये या फिर वापस पशु वृत्ति में चले जाये । बीच में रोकना संभव नहीं है। जैसे नदी बहती है उसका रुकना संभव नहीं है। कितना भी बड़ा पत्थर आ जाए उसको बाहा ले जाती है या फिर उसके आस पास से निकल जाती है, इसी तरह से बह जाना है ।
सभी अवस्था मे अपना सत्य खोजने के लिए
साक्षी भाव में जागृत अवस्था के प्रयोग से जागृत अवस्था की चेतना स्वप्न में दिखने लगेगी, स्वप्न के चेतना सूक्ष्म अवस्था में दिखने लगेगी, सूक्ष्म अवस्था की चेतना मृत्यु के बाद दिखने लगेगी । ये जन्म मृत्यु से मुक्ति है । जिनकी चेतना का एक झलक दिख गया है, चेतना क्या है वो जाना गया है उसको बनाए रखें, वो ज्योति को जलाये रखें । जब सत्य तक/अज्ञेयता तक पहुँचते हैं तब चेतना का भी कोई प्रयोजन नहीं है । चेतना होली के उस जलती हुई लकड़ी के तरह है जो अनावश्यक, मित्थ्या और अशुद्धियों को जलाकर स्वयं भी जल जाती है । जीस तरह से काँटे को निकालने के लिए काँटा ही काम आता है और काँटा निकालने के बाद उसको भी फेकदिया जाता है ।
३) साक्षी भाव में कैसे रहें ?
ध्यान को साध लेना साक्षी भाव में आनेका पहला सिंडी है । साक्षी भाव के लिए ध्यान देना आवश्यक है । “कोई भी अनुभव मैं नहीं हूँ” इतना सा भाव ध्यान में आना चाहिए । यह करने से अनुभव कर्ता होने वाले अवस्था में तुरंत आया जा सकता है । साक्षी भाव ध्यान की वस्तु का साक्षी होना है । इस अवस्था में ध्यान सीधे उठकर चित्त की सबसे ऊपरी परत में जाता है ।
हमारा लक्ष्य चेतना पर रहना है । चेतना चित्त की अवस्था है और शुरू में बहुत नाजुक होती है, बार बार गिर जाती है । यहाँ पर कोई वृत्ति का नाश नहीं करना, किसी चिंता का नाश नहीं करना, अहम का नाश नहीं करना, केवल चेतना में देखना है । जो भी आवश्यक हो वही होता है । गलत कार्य नहीं होता । चेतना ने अनियंत्रित भीड़ को नियंत्रण करती है । सब चित्तवृत्ति शांत हो जाते है, चित्तकी सभी परते अनुशासित होकर कतार में लग जाते हैं । जो आवश्यक हो उतना ही करते हैं, नियंत्रित हो जाता है, चेतना में वो बल है । चेतना प्रयास करके होनेवाली चीज नहि है, प्राकृतिक रुपसे अपने आप हो जाता है । फिर भी कुछ स्वभाविक उपाय इस प्रकार है-
चित्त वृत्ति, अहम, चेतना, साक्षी भाव, और अनुभवकर्ता के भेद पहिचान
अनुभव अति सूक्ष्म हो गया तो वृत्ति कम हो जाती है, लेकिन अहम भाव फिर भी बाक़ी है, और ये सोच रहा है की “ये सूक्ष्म वृत्ति में हूँ, चित्तवृत्ति का ना होना मैं हूँ” । जब साधक इस अवस्था से बाहर आता है तो अहम पूरी तरह प्रकट होता है । क्योंकि वो कहीं गया नहीं था तो प्रकट तो होगा ही । थोड़ी देर के लिए दब गया था, छुपा था, अंधकार में चला गया था, वापस प्रकाश में आ गया । जैसे घर की लाइट बंद कर देने से घर में रखे वस्तुओं नहीं दिखाई देती, चित्त कही नहीं जाता अनुभव कर्ता भी कही नहीं जाता सब साथ रह सकता है । चेतना भी एक तरह की स्मृति है, ज्ञान का स्मरण । इसीलिए चेतना को भी वृत्ति कहा है, परत कहा गया है। वृत्ति आती जाती है, इसीलिए चेतना आती जाती है । चेतना आने के कारण व्यक्ति की इच्छा, स्वतंत्रता नहीं है । बुद्धि को एक बार समझ में आ गया इसका महत्त्व तो इस चेतना की वृत्ति को प्राथमिकता दी जाती है।
जो अनुभवकर्ता द्रष्टा है, वो साक्षी है, और यदि हम ना भी चाहें तो भी वही करता है, यदि हम चाहें तो भी यही करता है । अपने अंदर उठती हुई तरंगों को अस्तित्व स्वयं देख रहा है । ये तरंगें विभिन्न रूप ले रही है, ये अवस्था अनुभव क्रिया है, जो अभी की सामान्य अवस्था है । इसमें द्वैत नहीं है । द्वैत तब हो जाता है जब चित्त कहता है की मैं अनुभव नहीं हूँ, मैं वो शून्यता हूँ जो अनुभव का अनुभव कर रहा है ।
“मैं अनुभव कर्ता हूँ” ये भी एक तरह का सूक्ष्म अहंभाव है, क्यूँकि यहाँ पर “मैं” तो आ ही गया । लेकिन ये बाकी स्थूल रूप से बहुत अच्छा है । ये ज्ञान में डूबा हुआ अहम है, क्योंकि उसको ये भान हो गया है की स्थूल अनुभव मैं नहीं । सूक्ष्म अनुभव और चित्तवृत्ति जो दबा दि गयी है वो भी मैं नहीं, वृत्ति सूक्ष्म हो गई है, जब यह ज्ञान हो जाता है समझ में आ जाता है कि कोई भी अनुभव हो मैं नहीं हूँ । कभी कभी अहम कहता है की मैं ऐसा हूँ मैं वैसा हूँ मैं शून्य हूँ, ये कहना और ये विचार भी मैं नहीं हूँ । जब केवल साक्षी रह जाता है, वो चेतना की अवस्था है । जब “मैं” का नाश हो जाता है, अहम नाश हो जाता है, जब ये विचार आने पर भी नकार दिए जाते हैं, तब अनुभव क्रिया रह जाता है, साक्षीभाव रह जाता है, इस भाव में रहना चेतना है । अनुभव कर्ता बनना ही चेतना नहीं है । जो पहले से है, बना नहीं जा सकता, हुआ जा सकता है । केवल ज्ञान हो सकता है, कही जाता नहीं कहीं आता नहीं है अनुभव कर्ता ।
अनुभव कर्ता को प्रकट करना चेतना नहीं है । वो प्रकट नहीं हो सकता जो पहले से प्रकट है । पहले से ही शून्य था तो प्रकट भी नहीं है । वो तो संपूर्ण अंधकार है । चेतना के द्वारा अनुभवकर्ताको लाया नहीं जा सकता । वो पहले से है जो भी है प्रकट अप्रकट चाहे पृष्ठभूमि हो चाहे सामने हो । उसका कुछ नहीं किया जा सकता, केवल जाना जा सकता है की वो है, और ये ज्ञान चेतना है । इस ज्ञान में रहना चेतना लीन होना है, ये अवस्था चैतन्य की अवस्था है । इस अवस्था में बार बार आना है । चेतना आती हैं, जाती है, द्रष्टा नहीं आता जाता । कोइ भी चिज से प्रभावित नही होता । द्रष्टा चेतनाको आते जाते हुए देख रहा है । प्रकाश में सारे काम होते हैं, और जब चेतना जाती है तो वही काम होता है, लेकिन अंधकार में होते हैं, कुछ बदलता नहीं है । जब चेतना चली जाए और वापस आ जाये तो स्मरण होता है की मेरी चेतना चली गई थी। ये कहने वाला भी चेतना है। कर्ता तो कही नहीं जाता, अटल है, और वो कुछ नहीं कहता ।
केवल अनुभवा किया जा रहा है । अनुभव हमारे स्मृति की वजह से लगता है कि स्थायी है, कुछ है, कुछ हो रहा है, समय का हमें भान होता है, कुछ चल रहा है, ऐसा लगता है ये सब आभास है। यदि आभास है तो क्या कुछ हो रहा है, क्या कोई प्रयास कर रहा है, क्या कोई कर्म हो रहा है, कोई कर्म करने वाला है नहीं, कुछ भी नहीं है । यही चेतना है। यदि अनुभव को देखने वाला द्रष्टा नहीं होगा तो अनुभव नहीं होगा। उसके स्मृति भी नहीं होगी । क्योंकि स्मृति है, और अंधकार में है, केवल ज्ञान चला गया था । उसकी जगह अज्ञान आ गया था कि मैं शरीर हूँ मैं ये हूँ वो हूँ । जब चेतना आ गई तब भी कर्म होंगे, जीवन चलेगा, जैसा चलता है वैसा ही चलेगा लेकिन ज्ञान के प्रकाश में होंगे । ये चेतना का प्रकाश है, चेतना आती जाती है, क्योंकि चित्तवृत्ति है, एक प्रकार की बुद्धि है, चित्त की एक अवस्था है, इसीलिए आती जाती है । प्रयास यही रहना चाहिए कि है ये ना जाए स्मरण हमेशा रहे ।
दृढ संकल्प
यथासभव हमेशा, नही तो जव आवश्यक होता है तव साक्षी भाव मैं रहने का दृढ़ संकल्प आवश्यकहै । तीव्र इच्छा होना चाहिए । इतना करने से ही हो जाता है, प्रयास व्यर्थ है । ये कोई कार्य नहीं, भाव है । स्मरण आना और साक्षी होना एक साथ होता है । मैं कौन हूँ ? कर्ता नहीं दृष्टा हूं । स्वयं को याद रखना आवश्यक है, बाक़ी अनुभव अपने आप याद आ जाएगा । जो भी हो रहा है, मनोशरीर यन्त्र से हो रहा है । अनुभव मिथ्या है । चित्त, परत, संस्कार, कर्म आदि सभी का साक्षी हो जाना है, सम्पूर्ण कर्म साक्षी भाव में हो जाएगा । इसको नियंत्रण होना भी कहते हैं ।
बार बार स्मरण
जो ज्ञान हुआ है उसको अपरोक्ष रूप में हमेशा देखकर स्वयं अनुभवकर्ता को जानना, इस भावमें रहना, अनुभवकर्ता बने रहना ही स्मरण है । स्मृति में और बाहर कोई स्रोत में रखा हुआ ज्ञान में नहीं, बल्कि स्वयं को अनुभवकर्ता के रूप में देख कर इस बातको हमेंशा मन और प्रयोग में लाना होता है । गरम तावा को छुना और भेडद्वारा पाला हुआ शेर के उदाहरण यहा बहुत सान्दर्भिक होता है ।
समर्पण
अस्तित्व अज्ञेय है । मनुश्य बुद्धिके सीमामे सम्पूर्ण अस्तित्व को कभी भी जाना नही जा सकता । स्वयं को व्यक्ति, अहम् और माया से मुक्त कर के अनुभवकर्ता के रूप में स्वीकार भाव में रहाना, अनावश्यक चीज़ों पर आशक्ति न होना, जो मिला है और अवश्यंभावी है उस पर संतोष भाव रखना, प्रेम पूर्ण रहना, सेवा भाव में रहना, क्षमाशील रहना, सब के ऊपर मैत्रीपूर्ण व्यवहार करना और जो बुद्धि के सीमा में हो उसको होस पूर्ण होकर पालन करना एवं बुद्धि के बाहर जो है उसको अज्ञेय समझ कर अस्तित्व पर छोड़ देना ही समर्पण है ।
कर्म पर चेतना के प्रकाश
चेतना आने के बाद वृत्तियाँ नष्ट नहीं होते, नियंत्रित होते हैं । चेतना का कार्य कर्मों को प्रकाशित करना है। चेतना में कर्मों पर अहं भावना नहीं होता है । कर्म सही और प्राकृतिक रूप से होते हैं । अनावश्यक कर्म नहीं होंगे, और जो भी होगा आनंद और शांति के पृष्ठभूमि में होगा । चेतना में कर्म होने से संवेदनशीलता, भाव भोग, बुद्धि बढ़ जाता है। चेतना की अवस्था में सभी कर्म अनुभवकर्ताकी पटल पर होता है । जो पशु वृत्ति है, कुछ नहीं कर सकती । चेतना को बल प्रदर्शन भी नहीं करना पड़ता, केवल प्रकाश डालना पड़ता है, और संपूर्ण नियंत्रण दिखाई देता है । कभी कभी वो चला जाता है, चिन्ता कि बात नहीं, जैसे ही आ जाये वैसे वही से जारी रखना है । चले जाए तो भी कोई बात नहीं ये भी चित्तवृत्ति है, जो चित्त स्वयं को देख रहा है, स्वयं को दोषी बता रहा है, इसको भी देखना है, इस पर भी चेतना का प्रकाश डालना है और वो भी चली जाएगी ।
बुद्धिको सरल, सीधा और, तेज करना
परिष्कृत बुद्धि के बाद चेतना आती हैं । ये एक प्रकार की बुद्धि है, जो ज्ञान होने के बाद प्रकट होती है । बुद्धि से ऊपर की परत है । चेतना स्थिर नहीं है, आती जाती है, प्रेम से रखना पड़ता है । अनुभव कर्ता नित्य है, हमेशा है, कहीं आता जाता नहीं चेतना आती जाती है। चेतना की परत कही नहीं जाती, वहीं रहती है, चेतना आने जाने के कारण यह है कि उस परत में चलने वाले वृत्तियाँ सक्रिय हैं या निष्क्रिय हैं; इसमें निर्भर होता है । यदि बुद्धि टेढ़ी हो गयी है तो वो जानना कठिन हो जाता है कि अनुभवकर्ता क्या है? पहले बुद्धि को सरल, सीधा करना पड़ता है । ये पहला चरण है । उसके बाद हमेशा दैनिक जीवन में याद रखना है कि मैं क्या हूँ, मेरा मूल तत्व क्या हैं? मैं शरीर नहीं हूँ, मैं मानसिक वृत्तियां नहीं हूँ। मैं कोई भी चित्तवृत्ति नहीं हूँ। मैं कोई भी वस्तु नहीं इतना ध्यान रखना, इतना याद रखना और सारे कार्य वैसा ही करना, जैसे रोज़ करते हैं । और कुछ नहीं करना है। कितने समय रहना चाहते हैं वो चेतना के अवस्था में ये रुचि, शुद्ध चित्त और बुद्धि की बात है । जितनी मन्द बुद्धि और अशुद्धियां होंगी, उतने समय लग जाएगा और बुद्धि जितनी शुद्ध और तेज होता है उतनी ही जल्दी होता है ।
विते हुए कर्मो पर चेतना के प्रकाश और साधना मे निरन्तरता
चेतना खो जाने की पश्चाताप भी एक और चित्त वृत्ति है । ये चेतना नहीं है । चेतना ये है की अब मुझे स्मरण आ गया है मुझे जारी रखना है । जो हो गया ना वो मैं हूँ, ना वो मेरा है, मैं जानता हूँ मैं क्या हूँ,और इसके स्मृति मुझे आ गई है, स्मरण हो गया है, अब मैं वो रहूंगा जो मैं हूँ । मैं द्रष्टा हूँ, द्रष्टाभाव में रहूंगा । जो पुराना हुआ जो बीत गया उस पर एक चेतना से भरी दृष्टि डालें, इतना भी बहुत है । क्योंकि चित्त में समय नहीं है । ये अस्तित्व समय हीन है, फिर भी पुरानी स्मृतियों पर चेतना की दृष्टि/प्रकाश डाल दे ये ये हुआ था तो भी वो इसी तरह का होगा जैसे की वो चेतना में हुआ हो । उसके संस्कार नहीं बनेंगे । अब अगली बार चाहे चेतना हो ना हो वो नहीं होगा, क्योंकि जो अंधकार में हुआ है उस पर प्रकाश डाल दिया है । भले ही थोड़ी देर बाद डाला हो, जो कल हुआ था उस पर आज प्रकाश डाला हो फिर भी वो संस्कारों के बीज उस प्रकाश में उस धूप में नष्ट हो जाएंगे, जल जाएंगे । संस्कारों से जो आवेग, भावनाएँ, ग्लानी उठती हैं वो शिथिल हो जायेंगे । जितना पुराना संस्कार होगा उसको जलाने में उतना समय लग सकता है ।
ध्यान मे क्रम बद्धता
जीवन में चेतना प्रयोग करने के लिए चेतना क्या है वो नहीं जानते तो प्रयोग भी नहीं होगा । आत्मज्ञान होने पर ज्ञान का प्रयोग करना है । यदि आवश्यक हो तो स्मरण साधन का प्रयोग भी कर सकते है । जीवन में साक्षी भाव लाने के लिए चार चरण महत्वपूर्ण होते है।
आस पास के वातावरण पर चेतना युक्त ध्यान । वातावरण में क्या हो रहा है इस पर सचेतना और ज्ञान ।
आस पास के व्यक्ति और उनके व्यवहार पर चेतना युक्त ध्यान । और उसे अपने में पड़ा हुआ प्रभाव ऊपर के सचेतना ।
अपने शरीर पर चेतनायुक्त ध्यान । (शरीर में क़रीब ८० पर्सेंट अन्य जीवों का कोष होता है ।) शरीर एक मनो शरीर यन्त्र है । इससे शरीर पर अनाशक्ति बढ़ जाएगी ।
सभी परतों के ऊपर चेतना युक्त ध्यान । संवेदना, भावना, विचार बुद्धि, चित्त, चेतना, अहम् कारण शरीर आदि हर परत पर क्या चल रहा है उस पर सचेतना । इन सब पर चेतना होने से परिवर्तन होने लगेगा । चित्त पर प्रकाश पड़ते ही बदलने लगेगा ।
ध्यान वस्तु का उपयोग और ध्यान में चेतना को समावेश करना
ज्ञान की शुरुआत ध्यान से होती है। ध्यान में चेतना का लाना आवश्यक है। अनन्य ध्यान हो, समावेशी ध्यान हो जब चेतना जागृत होती है तो समाधि में बदल जाता है । समाधि में अन्य प्रक्रिया का ज्ञान होता है, चाहे वो निर्विकल्प हो, सविकल्प हो, जैसी भी हो, वहाँ पर ध्यान होगा की २४ घंटे, ७ दिन १२ महीने, अनंत काल तक, हर वख्त में ही स्थायी हूँ। मैं ही निरंतर हूँ, आत्मा ही हमेशा है, बाकी सब आना जाना है, बाकी सब माया है, ये चित्र है जो उठते गिरते हैं, इस चिद्दाकाश में, चेतना के आकाश में। हम सभी पहले से समाधि में हैं। केवल ध्यान हट गया है ।
शुरु में स्थूल वस्तु, ध्वनि, नाद आदि का अनुभव या फिर मन के अंदर उठने वाले विचार जो चित्त के आकाश पर उभरते हैं, इनको एक के बाद एक करके चरणबद्ध रुपमे लेकर अन्दर की ओर ध्यान ले जाना हैं, स्थूल इन्द्रियों के अनुभव के ध्यान से आंतरिक इंद्रियों के अनुभव मैं ध्यान ले जाना हैं, और उसके बाद सुक्ष्म इन्द्रियों के अनुभव पर ध्यान ले जाना हैं । तब ही चेतना को देखना आसान हो जाता है। हर बदलते हुए विषयों के बीच चेतना वैसे की वैसी है । जब चेतना का मिश्रण हो जाता है अनुभव मे, जब अनुभव कर्ता का प्रतिविम्व दिखाई देता है, अनुभव मे, ये अनुभव अनुभवकर्ता के द्वारा ही प्रकाशित है, जब ये ज्ञान होता है तो वो चेतना कहलाता है । वह चित्त की अवस्था है जो, अनुभव कर्ता का प्रकाश से युक्त है, भले ही किसी भी तरह का अनुभव हो, भले ही अनन्य ध्यान हो, समावेशी ध्यान हो, जैसे ही अनुभव कर्ता के प्रकाश का ज्ञान होता है, वो चेतना में बदल जाता है । जब ध्यान में चेतना मिला देते हैं तो ध्यान तरल हो जाता है, बहने लगता है । उसमें अन्य अनुभव समावेश होने लगते हैं । चित्त शांत होने लगता है । अनुभव बंद नहीं होते, ध्यान फैल जाता है ।
चित्त वृत्ति पर सचेत
जब चेतना के प्रकाश नहीं होता तो ध्यान केवल चित्तवृत्ति हैं । इस अवस्था में चित्त की अवस्था का ज्ञान नहीं होता है । वो व्यक्ति या वो जीव पूरी तरह से अनुभव मैं मिल जाता है, लीन हो जाता है, इसको हम अचेतन अवस्था भी कहते हैं । उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति का झगड़ा हो जाता है किसी से क्रोध आ जाता है तो क्रोध में तरह तरह के उलटे सीधे कर्म कर देता है, मारपीट करता है या फिर कुछ बुरा भला बोलता है, कोई किसी तरह की हिंसा करता है तो उसका ध्यान तो बड़ा तेज है, उस समय उसका ध्यान पूरी तरह से अपने शत्रु के ऊपर है । जो भी हिंसा की वस्तु है, उसके ऊपर है, यदि वह व्यक्ति तलवार चलाना जानता है तो पूरे ध्यान के साथ चलाएगा । बंदूक चलाना जानता है तो उसका पूरा ध्यान रहेगा किसको मारना है, लेकिन चेतना का पूरी तरह से अभाव रहेगा । उसको ये ज्ञान नहीं होता की ये कौन है जो कर रहा है ? ये करना उचित है या नहीं ? वो अचेतन होगा, अन्धकार में होगा लेकिन ध्यान उसका पूरा होगा । जब उसको कोई कहता है कि देखो तुम्हें गलत कर रहे हो, इसके परिणाम ये होने वाले हैं तो क्रोध से उसका ध्यान हटकर उस व्यक्ति की तरफ जाता है, जो उसको समझा रहा है। जब उसको ध्यान दिलाया जाता है की देखो तुम क्या कर रहे हो ये क्रोध है, तुम नहीं हो तो उसका ध्यान का कोण बदलता है । ज़रा सा वो देखता है की मेरे हाथ में बंदूक है, मेरे हाथ में तलवार है और हाँ, ये मेरा क्रोध है मेरे मन में चलने वाली भावना है। उठने वाली तरंगें हे मन में जिसकी वजह से ये शरीर बुद्धि हिन तरीके से कार्य कर रहा है, यहाँ पर चेतना प्रकट होती है की मैं क्या कर रहा था और सही कर्म होता है, अब जैसे ही चेतना का प्रकाश आता है, जैसे ही अनुभव कर्ता का ज्ञान मिलता है, एक तरह के प्रतिबिंबित होता है अनुभव, उसके ऊपर प्रकाश डालदें तो वहाँ पर चेतना जागृत होती है।
ध्यान और अज्ञानका दिशा बदलना
ज्ञान के लिए छोटा सा दिशा बदलनी है ध्यान की और अज्ञान की । अब अज्ञान ज्ञान में बदल जाता है और यही साक्षीभाव है। ध्यान इंद्रियों से हटाकर जो इंद्रियों के स्वामी हैं, जो इंद्रियों को जानता है उसकी तरफ ले जाएं, जिसको अनुभव हो रहा है । यदि कुछ पता नहीं चलता किस को अनुभव हो रहा है कहाँ ध्यान ले जाऊ तो बड़ी समस्या है, क्योंकि अनुभवकर्ता के न रुप है न रंग हैं, वो वस्तु नहीं है, वो कोई अनुभव नहीं है । जीसको हम देख पाए, सुन पाए या जिसकी अनुभूति भी हो । दर्द की अनुभूति होती है जो सूक्ष्म है, विचारों की अनुभूति होती है जो सूक्ष्मतर है, वास्नाओं की अनुभूति होती है जो सूक्ष्मतम है, अनुभवकर्ता उससे भी सूक्ष्म है । प्रचंड अंधकार है अनुभवकर्ता, परन्तु सभी अनुभव अनुभवकर्ताद्वारा ही प्रकाशित है, इसीलिए वो दिखाई नहीं देता ।
चरणबद्ध रुपमे विभिन्न अवस्थाओं का प्रयोग
तीनों ही अवस्था में रहना है चेतना में -जागृति, स्वप्नावस्था और सूक्ष्म अवस्था । जागृत अवस्था से शुरू करना है । धीरे धीरे संपूर्ण चेतना आ जाएगी। उसके बाद ही चेतना स्वप्नावस्था में दिखेगी, और वही चेतना सूक्ष्म अवस्था में दिखेगी । संपूर्ण जीवन चेतना युक्त हो जाएगा । फिर मृत्यु की अवस्था में, सभी अवस्थाओं में प्रकट होगी, वहीं चेतना एक ही चेतना है । साक्षी भाव अलग-अलग अवस्थाओं में अलग-अलग नहीं मिलेगा, क्यूँकि ये एक ही है, साक्षी एक ही है । अवस्थाएं बदलती है । जो चित्त वृत्ति है, दिन में भी कितनी अवस्था में चित्त चला जाता है, सुबह शांत रहता है, फिर काम पर जाना रहता है, अशांत हो जाता है, फिर कुछ उल्टा सीधा हो गया तो दुखी हो जाता है, क्रोधित हो जाता है । शाम को फिर स्वीकार भाव में भी आ सकता है ।
स्वप्नावस्था भी कई होते है । कोई स्वप्न अच्छे होते है, कोई चैतन्य रहित होता है, कोई चेतना नहीं होती । इसी तरह से सूक्ष्म अवस्था है। ऐसी हज़ारों अवस्था है इस जीवनकाल में और ये २४ घंटे में कम से कम १०/२० अवस्था तो हो जाता है। क्या इसमें चेतना बदलती है ? क्या इसमें साक्षी बदलता है ? नहीं, चित्त बदलता है, चित्त को देखने वाला नहीं बदलता, पर्दा नहीं बदलता है, दृश्य बदलता है। शुरू में बुद्धि बालक बुद्धि होती है । साधना से थोड़ा बहुत नियंत्रण में आ जाता है । ये साधक के ऊपर निर्भर है । मुक्ति की इच्छा जितनी प्रबल होगी उतनी जल्दी होगा।
नींद की अवस्था में इन्द्रियों काम नहीं करती, और मांसपेशियां भी काम नहीं करती । शरीर की अवस्था नींद में है, मन की अवस्था स्वप्न में रहती है या कुछ और ही रहती है। यदि चेतना जागृत हो गयी तो बुद्धि को भी जागृत कर के अवस्था पर नियंत्रण आ जाता है ।
४) साक्षी भाव में कौन रहता है ?
साक्षी भाव में वो साधक रहता है जिसको आत्मज्ञान हो । “मैं कोई अनुभव नहीं, ज्ञान नहीं, शरीर नहीं, सूक्ष्म और अतिसूक्ष्म वृत्ति कुछ भी नहीं हूँ” ये आत्मज्ञान है । अहम तो बार बार आ जाता है, क्योंकि यह बहुत प्राकृतिक है । वो भी एक अनुभव है जैसे बाकी अनुभव आ रहे हैं जा रहे हैं वो भी आ रहा है जा रहा है । अनुभव कर्ता वो है जो इन सब अनुभवों का द्रष्टा है । यदि चित्त सामने हैं तो अनुभव कर्ता उसकी पृष्ठभूमि है अनुभव कर्ता सामने है तो चित्त ना के बराबर है । अनुभव कर्ता कहीं नहीं जा सकता यदि अनुभव कर्ता चला गया तो सारा अस्तित्व ही विलीन हो गया, फिर चित्त को देखने वाला कोई नहीं होगा और इस अवस्था कभी नहीं होगा ।
अस्तित्व में स्वयं को जानने का, अनुभव करने का क्षमता है । इसी को आत्म भी कहते हैं ब्रम्ह भी कहते हैं । जो अस्तित्व मे वस्तुएं जीव आदि मिलती है जो आने जाने अनुभव है, उन अनुभव में स्वयं को जानने की कोई क्षमता नहीं है । उन सारे अनुभवों को जाना जाता है, अनुभव जनता नहीं है । अनुभव को जानने के लिए अनुभव कर्ता होता है । अस्तित्व का जो प्रकट रुप है वो सभी मित्थ्या अनुभव है, इसिलिए पत्थर, जानवरों, कीड़े मकोड़े आदि जैसे वस्तु और जीव एवं उन सभी अनुभवोको जानता है, उसमें भेद करना जरुरी है । वस्तु, शरीर, मन ये सभी अनुभव है ।
अनुभव कर्ता स्वयं प्रकाशित है, पर्दा पर पर्दा ही प्रकाश डाल रहा है, अपने दृश्य पर । जो अनुमान का साक्षी है वो अनुभवकर्ता है । कर्ता नहीं होता है तो हम अनुमान भी नहीं लगा सकते, कौन जानता फिर वो अनुमान को ? उसका साक्षी कौन है ? अनुभव जाना जा रहा है ? ये वस्तु नहीं है, ये सर्वव्यापी है । इसकी कोई सीमा नहीं है, असीम हैं । ये किसी लोक में नहीं है । सभी लोग इसमें है, ये स्थान में नहीं है, सभी स्थान इसमें हैं । ये किसी समय में नहीं है समय इसमें हैं ।
मनुष्य में भी नहीं है साक्षीभाव । वो कुछ नहीं जान सकता । मनुष्य अनुभव है जो शरीर और मन का बना हुआ है, एक ढांचा है, एक मशीन है, नाद रचना का एक रूप है, वो नहीं जानेगा । मनुष्य को जाना जा रहा है, अनुभव कर्ता जो साक्षी है वो जानता है । साक्षी हर तरह के अनुभव को जानता है । यदि ये भेद समझ में आ गया की साक्षी क्या है और साक्ष्य क्या है ? दृश्य क्या है और द्रष्टा क्या है ? उसके बाद ही साक्षीभाव में रह पाएंगे। एक बार भेद जान लिया उसके बाद ध्यान जो साक्षी है उसकी तरफ ले जाना है क्योंकि वो तो सर्वव्यापी है, वो तो हमेशा स्थाई रूप में मौजूद रहता है । अनुभव आते जाते हैं, अनुभव कर्ता नहीं आता जाता । अनुभव कर्ता जो स्थायी है, जो स्थिर है वो साक्षी है । यदि जो अनुभव से हटा कर जो अनुभव कर रहा है उसकी तरफ ध्यान ले जाये तो वो साक्षी बन जाता है । पहले स्वयं को समझ लेना चाहिए । एक बार स्वयं को जान लिया, उसके बाद साक्षी होना या ना होना सब बराबर है । एक बार चित्त में बीच पड़ गया कि मैं क्या हूँ वो अपने आप साक्षी भाव में आएगा ।
अज्ञानी को ध्यान पूरी तरह से इन्द्रियों पर है, जो इंद्रियों द्वारा देखा जा रहा है, उस पर है, मेरे होने का कोई ज्ञान नहीं है । जो लोग अनुभव पर ही ध्यान दे बैठे हैं, वो सांसारिक लोग हैं, जो अनुभवकर्ता मे बिलीन है, वो निर्वाण प्राप्त है, जीवन मुक्त है, जो बीच में है,वो सहज समाधि/प्राकृतिक समाधि में हैं । समाधि का अर्थ ही होता है की बीचमें स्थित होना, ये अपने आप होगा । यदि इसके लिए प्रयास करना पड़ रहा है तो अनुभवकर्ता का ज्ञान नही हुआ है । आत्मज्ञान नहीं हुआ है ।
५) साक्षी भाव कहा होता है ?
सभी वस्तुओं का वास ख़ाली स्थान (शून्यता) पर है, लेकिन वह स्थान नहीं दिखाई देता । जब वस्तुएं नहीं थी तो भी वो खालीपन था वस्तु से भर दिया तो वस्तु दिखाई देती है लेकिन वो आकाश जिसमे वस्तु है, वो नहीं दिखाई देता । जो सर्वव्यापी है, जो सभी जगह हैं, जिसमें सभी जगह हैं, वो कहाँ मिलेगा ? दृश्य हो सकता है एक जगह हो, दूसरी जगह ना हो, द्रष्टा नहीं । एक जगह हो एक जगह नहीं ये सम्भव नहीं है । जहाँ दृष्टि नहीं है केवल दृश्य है ये कभी सम्भव नहीं है ।
अनुभवकर्ता साक्षात है, अनुभव के रूप में नहीं, उस प्रकाश के रूप में जिसके द्वारा अनुभव हो रहे हैं । जब भी अनुभव होता है, वो अनुभवकर्ता के द्वारा किया जा रहा है । वो उस आकाश की तरह है जिसमें वस्तु है । खालीपन को खाली नही कर सकेगे शून्यता को हटाना सभव नही है । वो शून्यता पर ध्यान भी नही जाएगा । यदि कोई वस्तु है तो ध्यान देना आसान है, उसी को ध्यान कहते हैं। मन एक जगह टिकता नहीं है । जो अनुभव पर भी ध्यान नहीं दे पाते उनके लिए वस्तु पर ध्यान देना जरुरी है लेकिन इस ध्यान मैं अनुभवकर्ता है, उसका ज्ञान नहीं है, क्योंकि जब हम किसी वस्तु पर ध्यान दे रहे हैं तो बिना अनुभवकर्ता के तो अनुभव ही नहीं होगा । यदि उसका ज्ञान नहीं है तो उसका साक्षी भाव नहीं कहा जाएगा । ज्ञान के बिना ध्यान बेकार है । जैसे ही आत्मज्ञान होता है, जान जाते हैं कि क्या है वो शून्यता जो सभी अनुभव करती हैं तब केवल अनुभव से ध्यान हटाना है ।
अनुभव में से ध्यान हटा लिया तो ध्यान अनुभवकर्ता पर जाएगा, जो अनुभव कर रहा है उस पर ध्यान आ जायेगा, इंद्रियों से ध्यान खींच लिया है । जागृत अवस्था के प्रयोग में सभी अनुभवों को एक जगह मिला लें और उस अनुभव में स्थिर रहें । एक आम व्यक्ति के लिए अनुभव से ध्यान हटाना बहुत कठिन है, । सारे अनुभवों को एक जगह सम्मिलित कर लें । इसमें एक जगह ध्यान नहीं सभी अनुभव पर ध्यान है । जो भी होता है जो भी घटनाएं हो रही है उस पर सबको सम्मिलित करलें तो ये अनुभवकर्ता परदे के रूप में उभरता है, जिसमें सभी अनुभव हो रहा है। इसी को सहज समाधि कहा है ।
सहज समाधि अनुभव और अनुभवकर्ता के बीच में स्थिर रहना, क्योंकि अनुभवकर्ता के ऊपर स्थिर रहना वश में नहीं है। वो तो गहरी नींद के समान है, वो तो निर्विकल्प समाधि हो जाता है। साक्षी वहाँ भी है, उसको किसी का अनुभव नहीं हो रहा, दृश्य गायब हैं लेकिन साक्षी तो है, द्रष्टा है, उसका दृश्य अंधकार है । ये गहरी निंद्रा की स्थिति है । जागृति में अनुभवकर्ता और अनुभव के बीच में रहना है । जब ध्यान सम्मिलित हो जायेगा अनुभवकर्ता मैं और अनुभव में दोनों एक जगह हो जाएंगे तो सहज समाधि में पहुँच जाएंगे।
६) साक्षी भाव का फ़ायदा क्या है ?
चित्त के ज्ञान का आध्यात्मिक प्रयोग महत्वपूर्ण है । चित्त पर नियंत्रण कर के सांसारिक पीड़ा, दुख, कष्ट कम करने के लिए, मनोविकार और व्यसन हटाने के लिए, शारीरिक स्वास्थ्य तंदुरुस्त रखने के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है । श्रावण, मनन, निदिध्यासन ज्ञान प्राप्त करने विधि हैं । अनावश्यक इच्छा पर नियंत्रण कर के कर्म और कर्मफल को नियंत्रण किया जा सकता है । उपरी परतोंका ज्ञान, वासना पूर्ति, ज्ञान प्रसार, ज्ञान लाभ आदि साक्षी भाव और चेतना के प्रयोग के फायदे है । कुछ मुख्य फायदे इस प्रकार है:-
जो आत्मज्ञान हुआ है नेति नेति के माध्यम से उसका दैनिक जीवन मे अवलम्वन करके जो भी अज्ञान था उसको हटाकर अशुद्धियाँ दुर किया जाता है । बुद्धि तेज हो जाती है । जो भी अनावश्यक और अनियन्त्रित था वो हट जाता हे, नियन्त्रित हो जाता है ।
शांति, आनंद, स्थिरता, बुद्धि, सही कर्म, सही आचरण, अनावश्यक का त्याग, सम्बंध शुद्धि, सांसारिक लाभ, तेज विकास क्रम, आध्यात्मिक विकास लाभ मिलते है ।
उपरी परतोंका ज्ञान, वासना पूर्ति, ज्ञान प्रसार, ज्ञान लाभ आदि सरल होता है ।
शरीर भावना मन विचार स्मृति और आसपास के वातावरणमे क्या चल रहा है ये पता चलता है । इससे इन सभी वृत्तियाँ सन्तुलित हो जाती है ।
अनुभवकर्ता का ज्ञान साधकके दैनिक अनुभव में सम्मिलित होता है, उसका हमेशा स्मरण रहता है। अनुभव पर भी ध्यान देने से द्वैध मे अनुभव और अनुभवकर्ता का भेद पता चलता है तो अद्वैत मे दोनो का विलय का अवस्था यानी कि समाधि के अवस्था आ जायेगा।
ध्यान बीचमे रहता है इससे हर गतिविधी सन्तुलित हो जाता है । दैनिक जीवन मे सुख शान्ती प्रेम करुणा एव आनन्दका भाव भर जाता है । चित्त मे जव ऐसा आनन्दका रस चेतना अमृत चख लिया तो फिर प्रयास नहीं करने पड़ेंगे, अपने आप हो जायेगा । चित्तवृत्ति का स्वभाव ही है की एक बार कोई नया मिल गया तो पुराना छोड़ के उस में ही लिप्त हो जाता है । चित्त स्वयं आनन्द कि तरफ जाने का प्रयास करेगा ।
काम क्रोध लोभ मोह इर्स्या घृणा जैसे षट शत्रुओं का नाश हो जाता है ।
साक्षी भाव सध जाने से सुबह आंख खुलते ही चेतना याद आ जाएगी । वृत्तियॉ भी होंगी लेकिन वो सब चेतना के प्रकाश होंगी जिससे अनावश्यक और गलत कुछ नहि होगा । जो ईच्छा वासना है वो प्राकृतिक होंगे ।
जो भी गतिविधियाँ है वो पूर्व निर्धारित होंगे। जो हमारी प्रज्ञा का अनुसार नही है उसको नियन्त्रण कर सहते है । रोक सकते है । यदि चेतना और नियन्त्रण ये दो शब्द समझ मे आ गया तो सारी सृष्टि हमारे हात मे होगा । काम के पूर्व ही चेतनाका प्रकाश होगा । पूर्वानुमानित परिणाम होंगे। कर्मफल सहि आएगा ।
जागृति स्वप्न और निद्रा का हर अवस्था में नियन्त्रण आ जाएगा। चेतना विशेष प्रकार की योग्यता है । एक वार चेतना प्रकट हो जाए तो जाती नहि है, कोइ भी अवस्था मे प्रकट हो जाती है । बुद्धि बदलेगा क्यूँकि सीमित है, लेकिन चेतना कोइ भी अवस्था मे नहि बदलति । मरने के वाद भी रहती है । इसिलिए चेतना हर अवस्था को नियन्त्रित करती है ।
७) साक्षी भाव में क्या विघ्न या हानि हो सकता है ? क्या क्या सावधानी बरतना पड़ता है ?
साक्षी भाव प्रयोगिक विषय है । निदिध्यासन और साधना के क्रम में अशुद्धि और अज्ञान का कारण विघ्न आ सकते हैं । कुछ विघ्न इस प्रकार है:-
विध्न या हानी
पुरानी मान्यताओं द्वारा अवरोध
पुरानी मान्यताओं से चित्त वृत्ति इतनी शक्तिशाली है कि वो कहि जाना नहीं चाहती । वो देख रही है की अब हमारा अंत आ गया है; तो वो शरीर पर अपना शक्ति प्रदर्शन करती है । वो अनेक बाधाएं खड़ी करती है, विध्न खड़ी करती है । पहले जिसमे हमारा कोई रुचि नहीं थी, जिन चीजों में इच्छा नहीं लगती थी, जिन पर ध्यान भी नहीं देते थे अब वह कार्य होने लगेगा । यदि बलपूर्वक चेतना जगाने लगे तो ऐसा होता है ।
चित्त में अशुद्धि
चेतना के अभाव मे सारी अशुद्धियाँ व्यक्ति मे आ जाते है । जो भी बचपन से था उसके उपर ये बाहर से जो आया है उसको चित्त ने स्विकार नही करता है । इसलिए जीवका विकास रुक जाता है, और विनास होने लगता है, पतन होने लगता है । व्यक्ति व्यभिचारी, अत्याचारी, दुखि, भयभित और हिंसक हो जाता है । इसका प्रभाव व्यक्ति स्वयं और दुसरो को, घर समाज को भी पड़ता है ।
शारीरिक मानसिक विकृति
त्रुटीपूर्ण और मनमानी साधना से शारीरिक विमारी असक्तता भी आ सकते है और मानसिक विचलन भी हो सकता हे । इसिलिए आत्मज्ञान होने के वाद गुरु के निर्देशानुसार प्रयोग करना चाहिए ।
सावधानी
साक्षी भाव में रहने के लिए आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान और मायाज्ञान के विषय में श्रावण, मनन और सत्यापन अच्छे से होनी चाहिए । साक्षी भाव और ध्यान की समझ, परतों का समझ वृत्ति और अवस्थाओं का समझ साक्षी भावके लिए अति आवश्यक है ।
विना प्रयास के स्वभाविक साधना
अति नहीं करना है । साधक के योग्यता के अनुसार चेतना सध जाती है । विलक्षण प्रतिभावान को कुछ दिनमे हो सकता है, तो सामान्य साधाक को कयी वर्ष भी लग सकता है । चेतना स्वभाविक रुपसे आना चाहिए । कुछ विचार चलाना पड रहा है मनन करना पड रहा है तो चेतना नही हुआ है । चेतनाको स्थापित नही किया जा सकता । ये प्रयास से नही आएगा । दृष्य द्रष्टा भेद जानने से आएगा । ज्ञान पक्का होने से चेतना अपने आप स्थापित हो जाती है । चेतना अनुभवकर्ता होनेका ज्ञान हे ।
कुछ विचित्र या चमत्कार के रुपमे नही लेना है
नय साधक ने शुरु मे कुछ सावधानियाँ और सतर्कता वरतनी पडति है । प्रारम्भिक चरण मे कुछ नयाँ अनुभव हो सक्ता है । यदि हम पूरी तरह से प्रकाश में है और अचानक प्रकाश चली जाती है तो इतना अंधकार हो जाएगा की कुछ भी नहीं दिखेगा । थोड़ी देर बाद हल्का हल्का जो प्रकाश धीरे धीरे आता है और वस्तुएँ दिखने लगेंगे । इसी तरह से अचानक प्रकाश आगई तो आँखें चकाचौंध हो जाएँगे । थोड़ी देर के लिए कुछ भी नहीं दिखता । किसी किसी को साक्षी भाव भी इसी तरह का होता है । शुरू में ही पूरी चेतना आती है तो चमत्कार जैसा होता है । कुछ दिन के लिए चेतना के प्रकाश मै कॉन्ट्रास्ट दिखाई देता है।
पुरानी साधना मिश्रण नहीं करना और मनगढ़ंत साधना नहीं करना
चेतना मैं बल प्रयोग नहीं करना है। स्वभाविक रुपसे हो जाने देना है । कर्ता कोइ नही है करने से चेतना नही आएगा । समर्पण और गुरु कृपा आवश्यक होता है । ज्ञानीओ को विचार के साथ चेतना भी आती है । विचार वादल कि तरह और चेतना आकाश कि तरह है ।
ये मनोशरीर यन्त्र आपने आप चलेगा विश्व चित्त के वासना पूर्ति के लिए चलेगा । जो शक्तिशाली सस्कार पडा हे वो हो कर रहेगा, लेकिन उसके चेतना के प्रकाश मे होने देना चाहिए । चेतना के प्रकाश में मुर्खतापूर्ण कार्य नही होगा, और गलतियाँ भी नही होंगे । आम व्यक्ति ग़लतियों से ही सीखता है । यदि कोइ कार्य करते वख्त चेतना नही भी हो तो बडी वात नही है। ये प्राकृतिक है । जव चेतना हुइ है, तव दिनभरके कार्यो को एक सिनेमा के तरह चेतना के पर्दे पर चला कर संकल्प लेने से दुवारा वो कार्य चेतना मे होता है । समझदारी और निर्देशों का पालना, जिज्ञासा बस नहीं करना है और क्रम बद्धता आवश्यक है । भावनाओं में न बहें ।
श्रवण मनन और निद्धिध्यासन
गुरुद्वार वताए गए नियम और ज्ञानको ध्यान से सुनना अपरोक्ष अनुभव और तर्क के आधारमे उसे जाँचना सत्यापित करना जो भी ज्ञान हुआ है उसको दैनिक जीवनमे नियमित रुपमे प्रयोग करने से साक्षी भाव पक्का हो जाता है ।
अहम और अन्य वृत्ति पर नियन्त्रण
वृत्ति के स्वभाव में ही गति है, इसीलिए वृत्ति पर नियंत्रण सहज नहीं है, केवल थोड़ी देर के लिए उस पर ध्यान हटाया जा सकता है, ताकि उस वृत्ति पर कर्म ना हो जाए । वृत्ति की सक्रियता पर अनुभव आधारित होते हैं, सक्रिय परत पर ध्यान आकर्षित हो जाता है, इस अवस्था में अन्य निष्क्रिय वृत्ति पृष्ठभूमि में चले जाते हैं। जो कार्य अधिक आवश्यक है वहाँ पर वृत्ति अधिक बलशाली होता है, उसी पर सारा ध्यान जाता है । कर्म सक्रिय परत के कारण ही होता है, अन्य वृत्तियॉ भी अपना कार्य कर रही होती है, परंतु अधिक प्रभावकारी सक्रिय परत में होता है । इन्द्रियां भी इसके ही अनुसार सक्रिय हो जाते हैं, और फल भी इसी अनुरूप मिलता है । इच्छा होने मात्र से कर्म तो नहीं होता लेकिन इच्छा ही कर्म में बदलता है। बुद्धि के प्रयोग से अनुचित कर्म को त्यागा जा सकता है, इच्छा को नहीं त्यागा जा सकता। कर्म होने से संस्कार बनता है, संस्कार बनने से कर्म फल मिलता है।
सरल और स्वभाविक जीवन शैली
चेतना जागृत होने के वाद भी जीवन वैसा ही चलेगा अच्छा बुरा सब कुछ होगा विलीन नही होता है, दुर नही जाता है । कर्म का बहाव हम रोक नहि सकते । लेकिन जो होता है उसको चेतनाके प्रकाश मे देखना चाहिए । प्रकाशित होने के कारण अशुद्धियाँ दिख जाती है, इससे अशुद्ध कर्म रुक जायेगे । कर्म शुद्ध होने के कारण दुखका अन्त होगा । चेतना कुछ गलत होने नहीं देती । चेतना जागृत होने के वाद सब खेल के रुपमे देखा जाता है । जो स्मृति मे पहले से ही छपा हुवा है वही प्रकट हुवा है । हमे बस देखना है चेतना मे, ता की कल के लिए स्मृति मे अच्छे संस्कार पड़े ।
अशुद्धिओको पहिचान
डर, अनिच्छा, दुर्बल संकल्प, तरह तरह की अशुद्धियां, समाज आदि कारण है जल्दी प्रगति ना होने की । अशुद्धि के कारण अवनति होती है। निचली जो वृत्तियां है, वो इतनी शक्तिशाली है की वो चेतना को ५ मिनट भी नहीं रहने देती। साधकको यदि किसी ने अपमान कर दिया तो कुछ देर गुस्से में रहता है,जबकि एक साधारण व्यक्ति २ दिन गुस्से में रहता है। उसके बाद चेतना आ जाती है की ऐसा ऐसा हुआ, ये जीव है तो ऐसा ही होता है ।
चेतना शुद्धीकरण
“अनुभव कर्ता है” यह एक विचार हो सकता है, लेकिन उस विचार का द्रष्टा कौन है ? ये मनन करने से स्पष्ट हो जाता है। सूरज को जानने के लिए दिया नहीं दिखाना पड़ता है, वह स्वयं प्रकाशित है । उसके प्रकाश में अस्तित्व दिखता है । अनुभवकर्ता हमेशा परम समाधि स्थिति में रहता है । चित्त का सविकल्प समाधी, निर्विकल्प समाधी इत्यादि अवस्था होते हैं। शुद्धिकरण होने से चेतना अनुभवकर्ताका रूप ले लेती है। हर स्थिति में संपूर्ण रूप से सचेत होना तुरिया अवस्था होता है। चेतना की शुद्धि आत्मज्ञान से होता हैं।
माया में व्यक्ति अंधा हो जाता है । मनमानी साधना करना वर्जित है । बताए गए नियमों को पालन करके विनम्र, धैर्यवान और शांति में रहना चाहिए । ज्ञान के प्रयोग से आध्यात्मिक उपलब्धि मिल जाती है और विघ्न भी दूर हो जाते हैं । जागृति, सुसुप्त और स्वप्न के अवस्था में प्रयोग, साधना और विघ्न के निराकरण गुरु के निर्देशन में करना चाहिए । हर अनुभव अनुभव कर्ता का ही रूप है जैसे की हर गहना स्वर्ण का रूप है, हर घड़ा हर मूर्ति मिट्टी का ही रूप है, वैसे ही हर तरह का अनुभव जो भी चेतना के पटल पर आता है वो मैं ही हूँ । जब यह ज्ञान हो जाएगा तो इस तरह के भ्रम, विकर्षण, अज्ञान अपने आप दूर हो जाएगा । यदि चेतना में विभाजित है तो उसको अद्वैत में लेकर आयें, एकता में लेकर आयें, समाधि में लेकर आयें । देखें कि ना अनुभव है ना अनुभवकर्ता है । अनुभव क्रिया मात्र है, यह अनुभव क्रिया एकता है । माया मृगतृष्णा है, लेकिन माया बहुत शक्तिशाली है । माया के आगे ब्रम्ह (शिव) भी विवश है । एक बार माया का दर्शन हो गया, समझ में आ गया तो यह लीला कर भी सकते हैं, कोई बुराई नहीं है।
साक्षी भाव के माध्याम से जो आत्मज्ञान हुआ है उसका दैनिक जीवन मे अवलम्वन करके जो भी अज्ञान था उसको हटाकर अशुद्धियाँ दुर किया जाता है । जो भी अनावश्यक और अनियन्त्रित था वो हट जाता हे, नियन्त्रित हो जाता है । चित्त का ज्ञान ही स्वयं चित्त से मुक्त कर देता है इसीलिए ज्ञान ही कुंजी है। अध्यात्म में आत्म है। शब्द ज्ञान से कुछ नहीं होता, प्रयोग से होता है, ये प्रायोगिक विषय है । आम के स्वाद आम के बारेमे जानने से नहि खाने से हि पता चलता है । अनुभवकर्ता का ज्ञान नहीं है तो भी जीवन चलेगा लेकिन वो साक्षीभाव नहीं है। वो चेतना नहीं है वो अचेतन जीवन है, बेहोशी में नींद में जीना है । कोई मान्यता या चित्त वृत्ति इतनी बलशाली है कि वो चेतना तक पहुंचने से रोक लेती है । बुद्धि में मतारोपण इतना गढ़ा गया है कि बुद्दी चलने से भी मना कर सकति है । यदि चेतना में कुछ परेशानी आती हो,वहाँ पर ध्यान टिकता ना हो या फिर अनुभव कर्ता का कोई ज्ञान नहीं होता तो अशुद्धि है उनको हटाना पडता है । प्रमुख आठ प्रकार के शुद्धिकरण में चेतना शुद्धि सबसे महत्वपूर्ण है। चेतना शुद्धिकरण से अन्य शुद्धिकरण भी साथ साथ हुआ जा सकता है । चेतना शुद्धि हो गयी तो और सारे शुद्धि अपने आप ही हो जाते हैं। ऊपर के परत शुद्ध है तो निचले परत अपने आप शुद्ध हो जाते हैं। जो भी परिस्थिति है कर्म होते हैं वो चेतना के प्रकाश में होना ही शुद्धिकरण है। प्रयास करने से अशुद्धियाँ दूर नहीं हुई तो गुरु से संपर्क करना पड़ता है।
अनुभव और अनुभव कर्ता के बीच में रहना अनुभव क्रिया है, यही सहज समाधि है । समाधि का अर्थ ही होता है की वो बुद्धि जो सम हो । ना उधर हो, ना इधर हो, ना बाहर होना, अंदर हो जो बाहर हैं वहीं अंदर है । यही देखना समाधि है, और इस स्थिति में चित्त को रखना सविकल्प समाधि है । यहीं समाधि मुक्त कर देगी । यही समाधि निर्विकल्प हो जाएगी, और तब न काल है ना देश है, न नाम है, केवल मैं हूँ, यहीं केवल है, यही ब्रह्म है, यही मेरा स्वरूप है।
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