जगत मिथ्या
सार
सारे पदार्थ, जीव, जन्तु, चराचर आदि बाहरी इन्द्रियों द्वारा होने वाले अनुभव, पंच महाभूत से बना हुआ भौतिक जगत हैं । जगत के अनुभव वस्तुनिष्ठ होते हैं, सभी को क़रीब क़रीब एक जैसा ही अनुभव होता है । अस्तित्व स्वयं माया के रूप में प्रकट है । अनुभव घटना के रूप में प्रतीत होता है और अनुभवकर्ता द्वारा अनुभव किया जाता है । अनुभवकर्ता के माया स्वरूप ही अनुभव है l जगत एक अनुभव है और सारे अनुभव मिथ्या है । नादरचनाएँ जब तक अनुभव में आते हैं, तब तक कई प्रकार के प्रारूप बदल गए होते हैं, बनावटी होते हैं । जो दिखता है वह वह नहीं होता । इन्द्रियाँ सत्य नहीं दिखा सकती । जैसे उत्तरजीवीता चलता है वैसे ही मिथ्या अनुभव कराती है । इन्द्रियां जो दिखाते हैं वही अनुभव होता है इसलिए जगत और सारे अनुभव मिथ्या है ।
अनुभव चित्तनिर्मित है । इन्द्रियां नहीं होते तो अनुभव भी नहीं होता । इन्द्रियों का समझ बाहर नहीं होता है । इन्द्रीय अधिक विश्वसनीय नहीं है, क्योंकी इन्द्रिय स्वयं मिथ्या है, भ्रम पैदा करता है । क्यूँकि उत्तरजीविता के लिए उपयोगी होता है । जीव मिथ्या अनुभव में ही जीता है । जीवन जीने के लिए सत्य नहीं झूठ आवश्यक है । सभी जीवों को उनके विकास क्रम, आवश्यकता और उत्तरजीविता के अनुसार अलग अलग स्तर में मिथ्या अनुभव होते हैं ।
जगत मिथ्या है ये कैसे प्रमाणित होता है ?
जो नहीं है उसको होने का प्रतीति ही माया है । माया अनुभव का नाम रुप है जो अनुभव को निर्मित करता है और स्वयं चित्त निर्मित होता है । अनुभव और माया आधारहीन है, परिवर्तनशील है । माया को देवी यानी शक्ति का स्वरूप माना जाता है, यह अस्तित्व और अनुभवकर्ता का ही छाया स्वरूप है । माया भी अकारण ही है, एक ही है, परंतु असत्य है, मिथ्या है। ये प्रमाणित करनेके लिए अपरोक्ष अनुभव और तर्क का ही उपयोग किया जाता है जो निम्न बमोजिम है:
१ सत्य एक ही है सत्य दो नहीं हो सकते
अनुभव अस्तित्व का रूप है । अनुभव के माध्यम से ही अनुभवकर्ता को जाना जाता है, अपरोक्ष अनुभव से अनुभवकर्ता को होने का प्रमाण मिलता है । अनुभव मिथ्या है अनुभवकर्ता सत्य है, अनुभवकर्ता ने अपने ही छाया स्वरूप का अनुभव कर रहा है । द्वेध में देखा जाए तो अनुभव और अनुभवकर्ता दो है, अद्वेत में देखा जाए तो केवल एक ही है, मैं ही हूँ, और ये अनुभवक्रिया के द्वारा जाना जाता है । जो नित्य निरंतर चल रहा है । मैं अनुभव हूँ और मैं ही अस्तित्व हूँ, एक ही है लेकिन तत्व और छाया स्वरूप के रूप में अलग होकर अनुभवक्रिया से जुड़े हुए हैं ।
वस्तु, भावना और विचार आदि का सीधा अनुभव नहीं होता । अनुभव तनमात्राओं को होता है, तन्मात्राका आधार नाद है और नाद एक परिकल्पना मात्र है । भौतिक अनुभव इन्द्रियों को माध्यम से होता है और अभौतिक अनुभव इन्द्रीय जो बताते हैं वही होते हैं । मानस पटल में जो उबर गया वही जगत का अनुभव, शरीर का अनुभव, और मन का भी अनुभव होता है । जिसका अनुभव होता है वह पूरी तरह से अज्ञेय है, जो बाहर है उसका अनुभव कभी नहीं होगा, सत्य और शुन्य का अनुभव कभी नहीं होता । अस्तित्व स्वयम् को स्वयम् का ही छाया मिथ्या रुपका अनुभव होता है । इसलिए अनुभव असत्य है । मिथ्याका अनुभव मिथ्या का ही ज्ञान होता है और ये केवल ज्ञान लेने के लिए उपयोगि है क्यूँ कि शुन्यता और सम्भावनाका ज्ञान सम्भव नहीं होता ।
३ जगत परिवर्तनशील है
अनुभवों को एक रूप से दूसरे रूप में बदलने का भ्रमपुर्ण प्रक्रिया ही परिवर्तन है । जब अनुभव ही भ्रम है तो परिवर्तन भी स्वाभाविक रूप से भ्रम है । अनुभव और परिवर्तन स्मृतियों पर आधारित है, स्मृति के कारण ही परिवर्तन दिखता है । दो स्मृतियों को तुलाना करके परिवर्तन ज्ञात हो जाता है । अनुभव और परिवर्तन चाहे वर्तमान में सामने से हो, चाहे स्मृतियों पर आधारित हो, दोनों ही अवस्था पर मिथ्या है ।
सभी अनुभव परिवर्तनशील होते हैं । जो परिवर्तित है, अनित्य है वह असत्य है । कोई अनुभव तेज़ी से बदलता है और कोई धीरे बदलता है । सभी अनुभव परिवर्तित है इसलिए ही इन्द्रियां इनकी भेद पकड़ पाता है, यानी की परिवर्तन से ही इन्द्रियॉ प्रतिक्रिया करते हैं । हमेशा यथास्थिति में परिवर्तन का पता नहीं चलता है । यथास्थिति (शून्य) मैं किस का अनुभव करें ? शून्य सदा सत्य है और शुन्य में परिवर्तन संभव नहीं है । अनुभव-असत्य में ही परिवर्तन संभव है । परिवर्तन भी भ्रम और मिथ्या है । अनुभव निरंतर होते हुए भी परिवर्तनशील है, अस्थाई है । क्योंकि यह घटना के संग्रह है । अनुभवकर्ता ने माया के रूप में प्रकट किया है । इसलिए अनुभव मिथ्या और असत्य हैं ।
४ स्थायित्व का भ्रम
जो वस्तु धीरे बदलता है उसने स्मृति में स्थाई होने का भ्रम पैदा करता है । जीवन के उपयोगी वस्तु और संबंधों को स्थायी मान लिया जाता है । स्थायितव केवल एक मान्यता मात्र है । अनुभव बदलेगा भी तो स्मृति में छाप छोड़ता है और स्थाई प्रतित करवाता है । इसको उत्तरजीविता के लिए विसत्य के रूप में स्वीकारा जाता है । जो स्मृति में है वो मिथ्या है, छाया मात्र है । वास्तवमें सारे अनुभव अस्थाई होते हैं ।
सामान जीवों के इन्द्रियों में आधारभूत समानता होता है । इसलिए प्रतीत होते हुए सारे वस्तुओं पर व्यक्तिका समान धारणा और मान्यता बनता है, सभी के अनुभव में सामानता दिखाई देता है और अनुभव वस्तुनिष्ठ हो जाता है । जगत और शरीर का अनुभव अधिकतर वस्तुनिष्ठ हो जाता है, लेकिन मन का अनुभव और अंदरूनी अनुभवों पर व्यक्तिनिष्ठता दिखाई पड़ता है । इन्द्रियों के समानता का स्तर पर अनुभवों का समानता निर्भर होता है । सभी का अनुभव एक जैसे होने के कारण अलग अलग अनुभव पर भी समानताका एक सर्वसहमति बनती है । इसी के अनुसार अनुभव को परिभाषित किया जाता है, और बुझाई समान होती है । सहमति टूटने के अवस्था पर (जैसे की व्यक्ति का अलग अलग रूचि ) क्या सत्य है और क्या असत्य ये देखना कठिन हो जाता है ।
५ धिरे परिवर्तन होने वाले रुप या संरचनाएं
उत्तरजीविता के लिए ज़रा लंबे समय तक चलने वाले अनुभव को रूप या संरचनाएँ कहते हैं । धीरे धीरे से परिवर्तन होने वाले संरचनाएँ अधिक स्थाई और अपरिवर्तनीय प्रतीत होते हैं । थोड़ा सा भी परिवर्तन पूरा परिवर्तन का प्रमाण है । इसलिए हर अनुभव परिवर्तनशील है, यहाँ तक कि सूर्य, चंद्र भी । उत्तरजीविता के आवश्यकता के अनुसार ही इन सारे अनुभव में जल्दी और धीरे परिवर्तन आता है ।
स्मृति ने धीरे बदलने वाले वस्तुओं को स्थाई होने का भ्रम पैदा करता है । भ्रम पूर्ण ही सही स्थायीकरण के लिए इन्द्रीय, बुद्धि और स्मृति में तुलना का अलग अलग भूमिका और परिणाम होता है । धीरे बदलने वाले वस्तुओं को इन्द्रियों ने बदला दिखाता है, पर बुद्धि और स्मृति ने वही पुराना स्वरूप को मानता है और स्थाई होने का भ्रम सृजाना करता है। स्मृति में संचय का कारण भी स्थायीकरण का भ्रम हो जाता है जैसे पानी के लहरें और भँवर, जीवों और बनस्पति का उमर (विकास प्रक्रिया) आदि । परंतु सभी अनुभव परिवर्तनशील और क्षणिक है ।
६ मानदण्ड और सन्दर्भ
सत्य -असत्य को ज्ञान को पूर्वानुमान लगाने के लिए मानदण्ड का उपयोग किया जाता है l उपयोगिता के आधार पर व्यवहारिकता और उत्तरजीविता के लिए इनको परिभाषित किया जाता है l ज्ञानमार्ग पर सत्य का मानदंड अपरिवर्तनीय अर्थात नही बदलने वाला होता है l जो बदलता और परिवर्तनशील है, ज्ञानमार्ग में उसको असत्य माना जाता है l
जो सत्य नहीं है, लेकिन परिवर्तनशील संसार में सांसारिक कार्य, व्यवहारिकता और उत्तरजीविता के लिए विशेष परिस्थिति में आवश्यकता अनुसार मान लिया गया सत्य को विसत्य कहा जाता है l विसत्य सापेक्षिक होताहैं l व्यवहारिक, शैक्षणिक, सांसारिक, सरलता एवं अज्ञानता के दृष्टिकोण से उपयोगी मानकर प्रयोग में लाया जाता है l सत्य सरल और सामान्य होता है l सत्य को साबित करने की कोई जरूरत नहीं पड़ती l सत्य स्वयं प्रमाणित होता है l असत्य जटिल, कठिन और क्लिस्ट होता है l
७ सगुणता
अस्तित्व में कोई गुण नहीं है, लेकिन माया से अनुभव के रूप में प्रतीत होते हैं इसलिए अनुभव सगुण है । प्रकट होने वाला हर गुण अनुभव है । अनुभव का वास्तविक स्वरूप शून्य है, संपूर्ण है, इसलिए जटिल है । मिथ्या है इसलिए अस्तित्व में प्रकट होने वाला अनंत गुण दिखाया जा सकता है, ख़ाली है कुछ भी भर दिया जा सकता है ।
८ सीमित अनुभव और अनुभव में विकार
जीवों के स्तर के अनुसार उनके उत्तरजीविता के लिए जितना और जिस प्रकार का अनुभव आवश्यक है उतना ही होता है । उसके बुद्धि, स्मृति और इन्द्रियों ने अपना स्तर और सीमा के अनुसार अनुभवों को ग्रहण करता है । अलग अलग जीवों को अलग अलग प्रकार के अनुभव होते हैं । उदाहरण के रूप में - देखने में अरे उल्लू, सूघने में कुत्ता को ले सकते हैं । इसी तरह से मनुष्य ने दूसरे भाषा का अक्षर को पढ़ना चाहें तो इन्द्रियों ने दिखा सकता है, स्मृति नें ग्रहण कर सकता है परंतु बुद्धि ने समझ नहीं सकता है । जीवों के उमेर, स्वास्थ्य और सक्रियता के अनुसार भी अनुभव भिन्न और सीमित हो सकते हैं । एक ही समय में सभी अनुभव होने लगें तो अर्थहीन हो जाता है, कोई समझ में नहीं आता है ।इसीलिए अनुभव सीमित हो जाते हैं ।
अनुभव स्वयं माया है, मिथ्या है, और असत्य हैं । जीवों की इन्द्रियों ने जो पकड़ पाता है उसी का अनुभव होता है । इन्द्रियों ने सत्य - शून्य स्वरूप को पकड़ नहीं पाता है । ज़ो नहीं है उसका प्रतिरूप बना के विकृत रूप में दिखाई देता है । इन्द्रियों के स्तर के अनुसार सत्य स्वरूप में विकृति आ जाते हैं । उदाहरण के रूप में एक ही वस्तु को बालक और वृद्ध ने अलग अलग स्वरूप में देखते हैं, तो पशुने उक्त वस्तुओं को फरक स्वरूप में देखता है ।शुन्य-सत्य स्वरूप का अनुभव हो नहीं सकता है, उत्तरजीविता के लिए जितना आवश्यक है उतना ही सत्यका विकृत रूप का अनुभव हो जाता है, इसलिए अनुभव मे विकार है ।
९ माया का अज्ञान
ऊपर बताए गए भ्रामक अनुभवों के कारण माया के सत्य को जानने में मुश्किल पैदा होता है । माया अस्तित्व का छाया है, प्रतिरूप है, मिथ्या है और भ्रम है, लेकिन नक्कली नहीं है । माया भी स्थायी प्रतीत होता है, सदा रहता है । क्योंकी यह अस्तित्व का ही मिथ्या स्वरूप ही तो है । मिथ्या ही सदा है । सत्य को देखा नहीं गया है, माया रूपी अनुभव और परिवर्तन निरंतर है, इसीलिए माया को सत्य मान लिया जाता है । माया ही मूल अज्ञान है ।
निष्कर्ष
पराभौतिक परामानसिक नाद में दो अवस्थाका परिवर्तन होता है और ये चक्र में चलता है । यसके परिणाम स्वरुप नादरचना बनता है । नाद रचना स्मृति में छप जाता है । स्मृति में संचित होकर परत बनता है । विभिन्त परत में अनेक प्रक्रिया चलता है और संगठन, विघटन, रचना, विनास होता है, वृत्ति बनता है, इसिके परिणाम स्वरुप वस्तु, जीव जैसे सारे अनुभव अपनेआप ही निर्मित होते है । इस तरह से सत्य निर्गुण और मिथ्या सगुण होता है । सगुण होनेके कारण हम इसिको सत्य मान लेते हैं । स्मृति मे संचय, संचय से संस्कार, संकार से कर्म, कर्म से कर्म फल मिलता है और यहि अनुभव होता है, सुक्ष्म और स्थूल रुप होता है । ये सारे अनुभव स्मृति में संचित होकर स्मृति सेतु के माध्याम से प्रसारित होते हैं । वस्तु निष्ठता और सर्व सम्मति के कारण अनुभवको हम विभिन्न नाम दे कर अपना उत्तरजीवीता चला लेतें हैं । इस प्रकार जगत मिथ्या है, केवल उत्तरजीवीता तक ही उपयोगि है । मिथ्या और अज्ञानको दूर करने के लिए आत्मज्ञान आवश्यक है । अनुसंधान, अपरोक्ष अनुभव और तर्क की आवश्यकता पड़ती है । माया को जान लेना ही माया से मुक्ति है और यहीं सत्य प्रकट होता हैं ।
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