दृश्य द्रष्टा विवेक
अस्तित्व में जो भी प्रकट है वो सब दृश्य है । केवल यहीं नहीं सभी पराभौतिक परा मानसिक अनुभव भी “दृश्य” ही है । ये सभी परा भौतिक परा मानसिक अनुभव (जगत शरीर मन का अनुभव) का अनुभवकर्ता “द्रष्टा” है, जिससे ये सारे अनुभव प्रकाशित हो रहा है । वास्तव में दृश्य और द्रष्टा अलग-अलग नहीं एक ही है, लेकिन यही एक को समझने के लिए दृश्य और द्रष्टा को अलग करके देखना पड़ता है । अलगाव क्यूँ और कहाँ पर है और वास्तविक सत्य यानी विलीनता कहाँ पर और क्यूँ है ये समझ ही “दृश्य द्रष्टा विवेक” है ।
मनुष्य बुद्धि के सीमा में जहां तक जाना जा सकता है, वहाँ तक अस्तित्व को जानने के लिए कहाँ और कब दृश्य और द्रष्टा को किस रुप से देखना पड़ता है ?, दृश्य और द्रष्टा का अलग-अलग भूमिका, प्रायोजन, गुण और विशेषताएँ क्या क्या है, और ये कैसे चल रहा है ? ये जानने के लिए ये विवेक आवश्यक होता है । क्यूँकि यदि हमें दृश्य द्रष्टा विवेक नहीं हुआ तो सत्य और मिथ्या के बारे में पता नहीं चलता, मान्यता और अज्ञान का नाश नहीं होता । यदि ये विभाजन में ही अटक गए तो ब्रम्ह स्तर तक नहीं पहुँच पाएँगे और यदि अद्वैत में ही रह गए तो भी उत्तरजीवीता कठिन हो जाएगा क्यूँकि वहाँ केवल होना मात्र है, इसीलिए ये विवेक ज़रूरी है कि कहाँ पर भेद करना आवश्यक है और कहाँ पर विभेद समाप्त हो जाता है ।
सर्वप्रथम अस्तित्व को द्वैत के स्तर पर देखना पड़ता है । जब स्वयं को जानना होता है, सत्य और मिथ्या को जानना होता है तब चित्त ने दृश्य और द्रष्टा को अलग-अलग रुपमें विभाजन करता है । क्यूँकि जो है वो स्वयं को नहीं देख सकता, नहीं जान सकता । जो देखता और जानता है वो दिखता नहीं । दृश्य द्रष्टा विवेक से अस्तित्व को एक अनुभवकर्ता और एक अनुभव के रुपमें समझ सकेंगे । जब बुद्धि ये स्तर तक पहुँच जाए कि दोनों एक ही ब्रम्ह है, तब अद्वैत के स्तर तक पहुँच जातें है और ये विभाजन समाप्त होता है ।
बुद्धि या चित्त में ये विवेक होता है । साक्षी भाव में रह कर चेतना द्वारा साधक ने कहाँ पर कैसा समझ/विवेक अवश्यक है उसका प्रयोग करता है, और आत्मज्ञान, मायाज्ञान एवं ब्रम्हज्ञान में स्थित हो पाता है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें