गुरु

 गुरु 

मनुष्यों को अ‌ज्ञान के अन्धकार से मुक्त करानेवाला, गुरुक्षेत्रका प्रतिनिधि सद्गुरु है । गुरु ने व्यक्ति, एवं समाज में जो अज्ञान है, ज्ञान के संकेत और प्रयोग के माध्याम से दूर करवा देता है । सभी में विद्यमान परम ज्योति आत्मन् को प्रकाशित करवाने में हर सम्भव उपाय और सहायत करता है । गुरु ज्ञान नहीं थोपता, व्यक्ति स्वयं का अपरोक्ष अनुभव और तर्क के माध्याम से अज्ञानको हटाकर सत्य को पहचान करने योग्य बना देता है । गुरु में अज्ञान से निकाल कर अपना तत्व पहचान करवाने  का क्षमता होता है । बुद्धि, ज्ञान, बाचन और संचार कौशलता, धैर्य, विवेक, व्यक्तिका मनोदशा की समझ, सामाजिक ज्ञान, आदि से युक्त होता है । इसीलिए अस्तित्व के विकास क्रम में गुरुका स्थान बहुत उपर के स्तर पर है । स्वचेतन और मुक्त चित्त के श्रेणी में पहूँच चुका होता है । अपना निःस्वार्थ सेवा ज्ञान और साधना द्वारा अज्ञान मिटा कर मुक्ति दिलवाता है, इसीलिए सद्गुरू है, सम्मान योग्य है, आदरणीय है । 


गुरु के उद्देश्य, संलग्नता, क्षमता, स्तर आदि के आधार में विभिन्न प्रकार का गुरु होते हैं । सभी गुरुमें समान योग्यता नहीं होता हैं । भगवान शिव ने पार्वतिको जो ७ प्रकार के गुरु बताये थे, जो गुरुगीता में उल्लेख है उसके अनुसारः-

सूचक गुरु -  कला का ज्ञान एवं प्राविधिक ज्ञान देते हैं, जिससे व्यक्ति का जीवन यापन हो सके - विद्यालय, महा विद्यालयका गुरु ।

बाचक गुरु - शास्त्रों का पारंगत पण्डित गुरु ।

बोधक गुरु - मन्त्र दिक्षा देने वाले गुरु  ।

निषिद्ध गुरु - जो कार्य समाज में निषिद्ध है, वो करवाने वाले, तन्त्र-मन्त्र, सूक्ष्म शरीर के प्रयोग आदि सिखाने वाले गुरु ।

विहित गुरु - इस संसारका नश्वरता का ज्ञान करानेवाला गुरु ।

कारणख्य गुरु - वेद उपनिषद आदि का महावक्य, ज्ञान एवं संन्यासका ज्ञान देनेवाला गुरु ।

सद्गुरु/परम गुरु - अन्धकारका नाश करवाने वाला, आत्मज्ञान देनेवाला, मुक्ति के पथ पर ले जाने वाला, स्वयं से मिलवाने वाला गुरु ।

आधुनिक स्तर पर पालक गुरु, शिक्षक, कला और विज्ञान के गुरु,  मार्गदर्शक गुरु,  आदर्श गुरु, लोक गुरु,  तन्त्र गुरु,  और सद्गुरु आदि क्रियाशील हैं । 

केवल इतना ही नहीं, जीवन के हर क्षण में जिससे भी जो भी सीखने को मिलता है वो सब में गुरु के गुण होते हैं, जैसे कि नदी, पहाड़, हिमालय, जंगल, पत्थर जानवर, किट, पतंग आदि भी गुरु हैं । इन सभी से गुरुक्षेत्र द्वारा निःसृत ज्ञान ही मिलता है । फिर भी व्यवहारिक रुपसे जिसने व्यक्तिका अज्ञान देख सकता है, उपयुक्त उपाय द्वारा उस अज्ञान से बाहर निकाल सकता है और इसका उत्तरदायित्व ले सकता है वही योग्य सद्गुरु है, जो ज्ञानक्षेत्र यानी कि गुरुक्षेत्र के प्रतिनिधि बनके व्यक्ति के रुपमें अवतरित होता है ।


एक व्यक्ति के जीवन में विभिन्न उम्र और समय क्रम में जितने भी गुरु आवश्यक है, उतने गुरु हो सकते हैं, जैसे कि पहला गुरु मातापिता से लेकर स्कूल, कलेज और व्यवसायिक क्षेत्रमें विभिन्न सान्सारिक गुरु होते हैं, लेकिन संसार से मुक्ति दिलाने वाला सद्गुरु तो एक ही होता है ।


अस्तित्व के दो भाग में से जो अप्रकट है, वही सत्य है, जो प्रकट है वो मिथ्या है । हम सभी इसी माया में जी रहे हैं, इसीलिए मिथ्या को ही सत्य मान लिया हैं  । इसका कारण भ्रम और अज्ञान है, जो माया का ही लीला है । माया इससे निकलने नहीं देती, परन्तु प्रकट अस्तित्व के विकासक्रम में मानव चित्त इस स्तर तक पहूँच गया है कि अपने बुद्धिके द्वारा माया के मिथ्या खेलको समझ सके, और अपना सत्य स्वरुपको जान सके । उस स्तर तक गुरु पहूँच  गया है, वही जान गया है कि कैसे मनुष्यको अज्ञान से निकाला जा सकता है । इसी उद्देश्य हेतु ज्ञान और गुरुक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करके गुरु इस लोक में प्रकट होता है । अज्ञानी जनोंको अन्धकार हटाके सत्य स्वरुप दिखानेके लिए गुरु कि आवश्यकता है । आत्मज्ञान लेना तो फिर भी सरल हो सकता है लेकिन उस ज्ञान में स्थित होते रहना बहुत कठिन है । व्यक्ति ज्ञान लेने के बाद भी अज्ञान में, संसारमें पुनः गिर सकता है । सद्गुरू ही व्यक्ति का ऐसा कोई भी अवस्था को पहचान कर, समझकर वहाँ से उपर उठा सकता है, इसीलिए गुरु आवश्यक है ।


सद्गुरु पहचान करना सहज नहीं है । इसके लिए इच्छुक व्यक्ति ने स्वयं को ही देखना पडता है । स्वयं में कितनी अज्ञान है ? जिज्ञास है कि नहीं ? मुक्ति कि इच्छा है कि नहीं ? आध्यात्मिकता में रुचि, लगाव, और क्षमता कितना है ? ये सवाल का विश्लेषण करके ही गुरु कि आवश्यकता पता चलता है । जब व्यक्ति ने अपने लिए गुरु की  आवश्यकता जान लेता है, तब आसपास से लेकर उसके पहूँच तक गुरु के खोज में लगता हैं । समाज में तरह तरहका मार्ग एवं गुरु हैं, जो विभिन्न आकर्षण एवं प्रलोभन देकर अनुयायि बनानेका प्रयास करते हैं । सभी व्यक्ति एक ही प्रकार के नहीं होते । कोई व्यक्तिको इन सब से कोई प्रभाव नहीं पडता, कहीं उसका मन नही थमता, नही रमता । जब उसका मुमुक्षत्व किसी ऐसा व्यक्ति पर आकर रुक जाता है, दिल से गुरु रुपमें अपना लेता है वही उसका सही गुरु होता है । कोई साधक विभिन्न मार्ग और गुरु से होकर जिज्ञासा मिटाने का कोशिस करते हैं । जबतक उनके प्रश्न का सहि उत्तर नहीं आता तब तक ढुडते रहते हैं, एक दिन उनका मुमुक्षत्व उसके सदुगुरुके पास पहूँचा सकता है ।


जैसे व्यक्ति सही गुरु के तलास में भटकते हुए अन्त्य में सद्गुरु से मिल पाता है, गुरु भी साधकके प्रगति और मुक्ति के लिए अनेक साधनाद्वारा उपाय खोजता रहता है । गुरुक्षेत्र में ज्ञानका जो श्रोत है ज्ञानका जो भण्डार है, उसको सही ढंग से संयोजन और व्यवस्थापन करके प्रत्यक्षीकरण करता है । अपनी कुशलता से अज्ञान नाश और मुक्ति का मार्ग पता लगाता है । समाज में निहित अज्ञानका स्तर कैसा है ? व्यक्ति किस तरह से अज्ञान में फसा है ? वहाँ से कैसे निकाला जा सकता है ? आदि उपाय का खोज करके उपयुक्त विधि पता लगा कर अज्ञान से निकाल लेता है । केवल यही नहीं, शिष्यों को ज्ञन और सत्य में स्थापित करवाने के लिए विभिन्न उपाय अवलम्वन करता है, दुख कष्ट झेलता है । उपाय खोज करता है, जैसे किः-अज्ञान से कैसे मुक्ति पाया जा सकता है ? किस विधि के द्वारा अपने मिथ्या और सत्य स्वरुप को पहचाना जा सकता है ?, किस स्तरके अज्ञान और अज्ञानी को किस माध्याम और किस तरह से अज्ञान से निकाला जा सकता है, उसी स्तर के अनुसार उपयुक्त विधि और माध्याम कौन सा है ? इसीमें लगा रहता है । आवश्यक विधि और उपाय पहचान करके प्रत्यक्ष गुरु-साधक वार्ता, छलफल एवं प्रश्नोतर करके, अप्रत्यक्ष रुपमे किसी भी रुप में प्रकट होकर, व्यक्ति के विकास, प्रकृति और स्वभाव अनुरुप उपयुक्त मार्ग अवलम्वन करने के लिए सल्लाह एवं सुझाव प्रदान करके, उस मार्गमें प्रगति करने के लिए आवश्यक सहायत करके, कैसै प्रगति हो रही है उसको परीक्षा, समिक्षा एवं मूल्यांकन करके, परोक्ष एवं अपरोक्ष रुपसे साधकको विभिन्न कृपा करके, आवश्यकतानुसार उपयुक्त सबक़ सिखा के भी गुरु द्वारा अज्ञानका नास करवाने और मुक्ति दिलवाने में हर क्षण दत्त चित्त रहता है ।


सद्गुरू साधक के प्रगति के लिए सदैव तत्पर रहता है । व्यक्ति ने उपयुक्त समय आने पर ही गुरु को खोज पाता, पहचान पाता है । माया में कर्म के अनुसार फल आते हैं । कर्म, फल भोग, और कर्म बन्धन से मुक्ति के लिए सोहि अनुरुप के व्यक्ति के द्वारा कर्म होते हैं । इसी अनुसार व्यक्तिका अवतरण और आरोहण होता हैं । ये क्रम मे व्यक्ति किस समय किस प्रकार के कर्मबन्धन में है ? और उसको उस बख्त किस तरहके ज्ञान ज़रूरी है ? सोही अनुरुप उपयुक्त समय में उपयुक्त स्तर का गुरु मिलता है । इस तरह से व्यक्ति का ज्ञानार्जनका उपयुक्त समय उसका विकासक्रम, आध्यात्मिक प्रगति, जिज्ञासा और मुमुक्षत्व मे निर्भर होता है ।


सद्गुरू प्रकट और अप्रकट जिस रुपमें आवश्यक है उसी रुप में शिष्यों के साथ होता है । गुरुलोक, आश्रम, समाज, सांसारिक गतिविधि, अनलाइन सत्संग, ईमेल इन्टरनेट आदि प्रविधियों का उपयोग आदि जो भी आवश्यक और उपयुक्त हो वो सब करके जहां से भी ज्ञान ही प्रसार करता है । शिष्यों को गुरु की आवश्यकता जहां जहां होता है वहाँ वहाँ होता है गुरु, कहीं प्रेरणा बनके, कहीं हौसला बनके, कहीं मार्गदर्शक बनके, कहीं आदर्श बनके, कहीं सहयात्री बनके और कहीं स्वयं ब्रम्ह बनके शिष्यों के मन में प्रकट होता है । ऐसे सद्गुरू को अन्तर मन से नमन ।


अस्तित्व में स्वयं को जानने कि क्षमता होता है, और यही क्षमता सद्गुरु मार्फत प्रकट होता है । इसीलिए गुरु स्वयं ब्रम्ह स्वरुप है । प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रुपमें शिष्योंको मुक्ति दिलाने के लिए हर सम्भव प्रयास करता है । गुरु किसि घटना के रुपमे, वस्तु के रुप में, जीव के रुपमें, व्यक्ति के रुपमें, मुनी के रुपमें, चित्त के रुपमें, स्थान के रुपमें, समय के रुपमें भी प्रकट होता है । विभिन्न रुप में प्रकट होकर जो आवश्यक ज्ञान देता है । मूल ज्ञान से  आत्मज्ञान, मायाज्ञान और ब्रम्हज्ञान तक लेकर जाता है । सत्य यानि कि अपना तत्व दिखाकर वहाँ तक पहुँचा देता है जहां ज्ञानका सीमा ही समाप्त हो जाता है, जहाँ से आगे जानने के लिए कुछ नहीं बचता । यही परम अवस्था है, मुक्ति है, विलय है जहां पर गुरुशिष्य सम्पूर्णता में मिल जाते हैं ।


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