आनन्द

 आनन्द


आनन्द अनुभवकर्ताका स्वभाव है, जहां हर अनुभव पूर्ण और सुन्दर होते हैं, कोई दुःख का भाव नहीं होता है; जहां सभी विपरीत भाव विलीन होते हैं और खुशि, सन्तुष्टि, पूर्णता, तृप्ति और शांति के भाव मुखरित होते है यही आनन्द है । ये अद्वैत अवस्था है, इसलिए इसको बुद्धि और शब्द में व्यक्त करना असम्भव है । सुख-दुःख, सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा, नैतिक-अनैतिक,शुन्यता-पूर्णता,स्विकार-अस्विकार आदि भाव होते हुए भी सभी भाव में सन्तुलन है, समाधि की अवस्था है; यही आनन्द है ।

अनुभवकर्ता यानि कि तत्व ही आनन्दका मूल है । सभी जीव आनन्दमें रहना चाहता है, क्यूँकि सभी का तत्व आनन्द है, स्वभाव ही आनन्द है । जीव भ्रम में जीता है । इसीलिए लोभ लालच, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, दम्भ घमण्ड, आदि के कारण भौतिक और सांसारिक सुख में आनन्द ढूँढने का प्रयास कर रहे हैं । जो मिथ्या है, मेरा स्वभाव ही नहीं उसमें आनन्द कैसे मिलेगी ? रेगिस्तान में पानी के तरह केवल भ्रम ही मिलेगा । 


जो मेरा स्वभाव है, जो अस्तित्व है, वो तो नित्य है, स्वयम्भू है, उसको कोई भी उपायद्वारा हासिल करना असंभव है । क्यूँकि वो तो पहले से है; नित्य है और शास्वत है । जीव में जो मान्यता और मतारोपणद्वारा अज्ञान भरा है उसने आनन्द को ढक लेने का चेष्टा करता है । जो बुद्धिमानी और ज्ञानी हैं वो इस प्रप‌ंचको समझते हैं और अज्ञान को नाश करके आत्म स्वरुप में स्थित होते हैं, यही परम आनन्द है । अन्धविश्वास और अनावश्यक का त्याग करना, जो भी है पूर्ण और सुन्दर है; उसमें सन्तुष्ट होना, स्विकार भाव में रहना, आत्मज्ञान लेकर उसमें में अवस्थित होना, कोई भी अपेक्षाओं से मुक्त होना आदि जीव आदन्दमें स्थित रहने का उपाए हैं जो केवल हटाना है । बनाना या प्रयास करना नहीं ।


जहाँ सन्तुष्टि और त्याग है, वहा आनन्द है । जहाँ आसक्ति और स्वार्थ है वहाँ आनन्द का विस्मरण होता है यानि कि आनन्द लुप्त होता है । आनन्द न मिलने का कारण जीव का अज्ञान मात्र है, भ्रमपूर्ण जीवन है । आनन्द सत्य स्वरूप है, जो स्वयं सिद्ध है । अस्तित्व का स्वभाव आनन्द है । इसीलिए कहीं आनन्द है कहीं नहीं ऐसा नहीं होता; क्यूँकि आनन्द सर्वत्र व्याप्त है, हर अनुभव में है । कहीं कम कहीं अधिक हो ऐसा नहीं मिलेगा; क्यूँकि आनन्द स्वयं में सम्पूर्ण है, हर अनुभव में एक समान है । आनन्द कभी आया और कभी चला गया ऐसा भी नहीं है । आनन्द हर क्षण है, नित्य निरन्तर है । कौन कितना बेचैनि में या आनन्द में रह सकता है ये उस जीव पर निर्भर होता है । “मैं बेचैनी में हूँ मेरे साथ शान्ति और आनन्द नहीं है” ये भ्रम है, बेचैनी या कोई विकार मुझे छु भी नहीं सकता । में निर्विकार हूँ, निर्गुण हूँ, में हमेशा आनन्द में हूँ यही मेरा स्वभाव है, यही सत्य है ।


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