परिवर्तन

 परिवर्तन 


अनुभवों को एक रूप से दूसरे रूप में बदलने का भ्रमपुर्ण प्रक्रिया ही परिवर्तन है । परिवर्तन द्वैत और चक्रीय होता है, सरल और जटिल होता है । नादका एक अवस्था से निकटतम दूसरे अवस्था में छोटा छोटा परिवर्तन सरल होता है । नाद में योग होने से जटिल परिवर्तन होता है । यानि कि दो से अधिक अवस्था का परिवर्तन जटिल होता है ।  एक ही अवस्था का परिवर्तन जटिल और अर्थहीन हो जाता है । सरलतम परिवर्तन के लिए न्यूनतम दो अवस्था में परिवर्तन आवश्यक है l सरल से जटिल हो ने वाले परिवर्तनशील और अर्थपूर्ण नाद से नादरचनाएँ बनती है । इन्ही नादरचना जीव, वस्तु और मन के रुपमें हमें अनुभव होते हैं । सभी अनुभव परिवर्तनशील और क्षणिक है । जब अनुभव ही भ्रम है तो परिवर्तन भी भ्रम है । 


माया परिवर्तनशील है । परिवर्तन नहीं होता तो अनुभव भी नहीं होता । इन्द्रियों ने परिवर्तन को ही पकड पाते है और इसी से हमें अनुभव होता है । इंद्रियों से प्रतिक्रिया करने से नाद में परिवर्तन प्रतीत होता है l रचना और विनाश का आधार भी परिवर्तन है । जो जीव और जीवन के लिए उपयोगी परिवर्तन है उसको रचना कहा जाता है । जो उपयोगी नहीं है उसको विनाश कहा जाता है । वस्तु नाद रचनाएँ के समूह से बनते हैं । नियमित और धीरे से परिवर्तन होने के कारण स्थाई प्रतीत होते हैं । क्रमशः परिवर्तन होने के कारण कोई भी वस्तु परिवर्तन होने के बाद भी वही वस्तु के रुपमें जाना जाता है । अति शिघ्र परिवर्तन को इन्द्रीयाँ भी नहीं पकड पाते और अनुभव में भी नहीं आते । 


अनुभव और परिवर्तन स्मृतियों पर आधारित है, स्मृति के कारण ही परिवर्तन दिखता है । स्मृति में नाद का प्रारूप संचित होता है, इसी से परिवर्तन का और अनुभव का पता चलता है । दो स्मृतियों को तुलाना करके परिवर्तन ज्ञात हो जाता है । नियमित नाद रचना में परिवर्तन भी नियमित होता है, और क्या परिवर्तन हुआ है वह भी जाना जा सकता है । 


अनुभव और परिवर्तन चाहे वर्तमान में सामने से हो, चाहे स्मृतियों पर आधारित हो, दोनों ही अवस्था पर मिथ्या है । धीरे बदलने वाले वस्तुओं को इन्द्रियों ने बदला दिखाता है । बुद्धि और स्मृति में संचय का कारण स्थायीकरण का भ्रम हो जाता है लेकिन हर अनुभव हरक्षण परिवर्तन होता रहता है जैसे पानी के लहरें और भँवर, जीवों और बनस्पति का विकासक्रम आदि । दो परिवर्तन बीच कितने मात्रा में अंतरराल है सो ही आधार में सरल और जटिल रचनाएँ प्रकट होते है । स्मृति और नाद पराभौतिक परामानसिक है । स्मृति स्वयं को स्थाई रखने का प्रयत्न करती है, दूसरे से प्रभावित होना नहीं चाहती । इसलिए स्मृति में एक जडत्व होता है, जिसने जल्दी परिवर्तन होने नहीं देता लेकिन सभी अनुभव परिवर्तनशील है ।


यही परिवर्तनशीलता या नश्वरता माया का नियम है । प्रकट अस्तित्वका आधार नाद और इसमें होनेवाले परिवर्तन है, जो परिकल्पना मात्र है । यही परिकल्पना से माया का प्रतिरुप बना के मायाका अध्ययन किया जाता है, मायाको जाना जाता है । मायाका प्रतिरुप बनाने के लिए प्रतिरुप भी परिवर्तन पर आधारित होना चाहिए, तभी मायाका व्याख्या सही हो सकता है ।  




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