शास्त्र

 शास्त्र

जन कल्याण के लिए कोई विषय पर लिखा हुआ गहन एवं गुढ ज्ञान समाविष्ट ग्रन्थ को शास्त्र कहते हैं । वेद, पुराण, शिक्षा शास्त्र, न्याय शास्त्र, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र आदि शास्त्र के कुछ उदाहरण है । शास्त्र जिसने लिखा है उसके अपरोक्ष अनुभव, तर्क और परिकल्पना में आधारित होता है । 


पूर्वीय दर्शन शास्त्रों के क्षेत्र में अत्याधिक सम्पन्न है । इन्हीं शास्त्रों के आधार में ज्ञान विज्ञान के क्षेत्रमें आज का ये भौतिक प्रगति सम्भव हुआ है । पश्चिमी संस्कृति में भी पूर्वीय दर्शन का महत्व एवं प्रयोग बढ़ता जा रहा है । ज्ञानमार्ग में शास्त्र को ज्ञानका मुख्य साधन नहीं माना गया है । क्यूँकि सत्यका ज्ञान किसी माध्यम से सम्भव नहीं है; अज्ञान नाश करने के लिए स्वयं के अपरोक्ष अनुभव और तर्क पर आधारित होना पड़ता है । फिर भी “इस संसार में अज्ञान है, हम भ्रम में जीवन जी रहें हैं” ये पता करने के लिए भी शुरु में तो शास्त्रों का सहारा लेना ही पड़ता है । 


वर्तमान में सूचना प्रविधि का विकास के कारण इन्टरनेट पर लिखित, मौखिक, श्रव्य-दृष्य सामग्री का प्रचलन बढ गया है । लिखित ग्रन्थ शास्त्र का महत्व कम हो गया है । इसीलिए आधुनिक गुरुजन, ज्ञानी जन, साधक गणों ने भी प्रविधि का उपयोग करके अनलाइन सत्संग एवं अनेक विधि द्वारा ज्ञान प्रसार करते हुए समाज से अज्ञान का नाश करने में प्रयासरत हैं । प्रविधि मैत्री उपायों का खोज, अनुसंधान एवं प्रयोग कर के अधिकाशं लोगों का अज्ञान दुर किए हैं । 


शास्त्र अपरोक्ष अनुभव और तर्क से प्रमाणित नहीं भी हो सकते हैं, हुआ भी तो लेखक का ही हो सकता है । कोई शास्त्र में किसी महापुरुषका जीवनी, इतिहास, परिकल्पना, अनुमान आदि भी लिखे हुए होतें हैं । ऐसे में व्यक्तिनिष्ट विचार और मन गढन्त कहानी हो सकता है । लेखक का विचार पाठक से मेल नहीं खा सकता, विरोधाभाष हो सकता है । अरुचिकर हो सकता है । उद्देश्य भिन्न हो सकता है, और असान्दर्भिक हो सकता है । भाषा में अशुद्धि और क्लिष्टता हो सकता है । जन कल्याण के वजह स्वयं का भावना और इच्छा हावी हो सकता है । ऐसे शास्त्र व्यक्तिको भ्रमित भी कर सकता है । अज्ञान को और बढ़ा सकता  है ।


शास्त्र लिखने के लिए कुक्ष योग्यता चाहिए होता है । जो जिस विषय में रुचि रखते हैं, उस विषयमें पारंगत है, परिपक्क ज्ञान है, उन्हीं से शास्त्र लिखा जाता है । कोई भी व्यक्ति प्रशिद्ध और जनोपयोगी शास्त्र नहीं लिख सकता । प्राचिन ऋषिमुनि एवं ज्ञानी जनों नें अस्तित्वके बारेमें रुचि लेकर सत्यका खोज किए हैं । सघन तपस्या, ध्यान, साधना, खोज, अनुसंधान, अपरोक्ष अनुभव, आदि के आधार में यथार्थ तथ्यों को खोजकर शास्त्रों के माध्याम से माया का व्याख्या किए हैं । वेद, पुराण, उपनिषद आदि लिखे हैं ।


समाज में जितना भौतिक विकास हुआ है उतना ही उत्तरजीविता जटिल होता जा रहा है । अध्ययन अनुसन्धान के क्षेत्र व्यापक एवं विस्तार हो रहे हैं । इसीलिए व्यवहारिक ज्ञान, विसत्य और दिनचर्या के लिए भी शास्त्र का आवश्यकता और महत्व को नजरअन्दाज करना उचित नहीं है । जिसका अच्छा साधना है, जिसने अपरोक्ष अनुभव और तर्क के द्वारा सत्य को जान लिया है, जिसका उद्देश्य पावन और जन कल्याण एवं मुक्ति के लिए हो; उन द्वारा लिखे गए जनोपयोगी एवं प्रामाणिक शास्त्र अनेक ज्ञान के याचक और इच्छुक लोगों के लिए बहुत उपयोगी हैं । 


जो सत्य और मिथ्या जानने के लिए खोज करके लिखे गए है वो शास्त्र जनकल्याण एवं मुक्ति के लिए आवश्यक है । कोई व्यक्ति पूर्वजन्म के साधना के प्रभाव से जन्म से ही ज्ञानी और सिद्ध हो सकते हैं, लेकिन अधिकाशं व्यक्ति अस्तित्व, सत्य और मिथ्या के विषय में अनभिज्ञ हैं, भ्रमित हैं । उन के लिए आधुनिक शास्त्र के साथ साथ वेद, पुराण, उपनिषद एवं अन्य व्यवहारिक शास्त्र भी उपयोगी हैं । शास्त्रों में जो लिखा है उसको यूँही भरोसा करना नहीं चाहिए । उसमें उल्लेख किए गए बातों को अपना अपरोक्ष अनुभव और तर्क से जाँच करके ही ग्रहण करना चाहिए । 






कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें