डर

डर


डर जीव के भावनात्मक परत से सम्वन्धित एक भाव है जो असुरक्षा, ख़तरा, लज्जा या आशंकाओं के कारण उत्पन्न होता है । डर को भय, त्रास आदि नाम से भी जाना जाता है । जीव में जीवन रक्षा के लिए डर आवश्यक वृत्ति है । ये भाव सभी जीव में होता है । अहम् का स्वभाव अनुसार डर का मात्रा कम या अधिक होता है । ज्यादा कम या ज्यादा अधिक डर दोनों हानिकारक है, इसीलिए डर का भाव सन्तुलित मात्रा में रखना जरुरी है ।


जीवन रक्षा और उत्तरजीविता आगे बढ़ाने के लिए उचित मात्रा में डर होना आवश्यक है । क्यूँकि यदि जीव में डर नहीं हुईं तो कोई भी खतरापूर्ण अवस्था में भी वो निश्चिन्त रहेगा, अपने प्रतिरक्षा के लिए कोई भी प्रयास नहीं करेगा । दूसरा शक्तिशाली जीव उसको आक्रमण करके हानि या नुक़सान पहुँचाएगा, मार भी सकता है । डर का भाव होने से ही जीव खतरापूर्ण परिस्थितियों के आँकलन करके सचेत रह सकता है । प्रकृति के नियम और समाज में जो व्यवस्था है उनके प्रति आस्था, विश्वास और पालना करने के लिए कर्तव्यबोधका भाव उत्पन्न करने में भी डर का भूमिका होता है । डर से ही अनैतिक इच्छा, वासना, कर्म को नियन्त्रण करने में सहजता आता है । इस प्रकार से  प्रतिरक्षा, सजगता, अनुशासन और सन्तुलन के लिए डर आवश्यक है ।


अहम् वृत्ति अपना सुरक्षा, विकास और स्वतन्त्रता चाहता है । जब ये चाहत में कोई किसिमका जोखिमयुक्त अवरोधों का महसूस करता है, तब डर अपने आप उत्पन्न होता है । ये प्राकृतिक नियम है, स्वभाविक है । अधिक मात्रा में डर होने से व्यक्ति कोई भी क्षेत्र में उचित प्रगति नहीं कर सकता । क्यूँकि वो सामाजिक समालोचना से डरता है । कोई भी काम करने लगा तो “सफल होगा या असफल होगा” ये द्विविधा या आशंका में रहता है । कोई क़दम उठाने से हिचकिचाता है । वार्तालाप, प्रश्नोत्तर, तर्क-वितर्क, करने से घबराता है । प्राकृतिक एवं मानवीय नियम से डरता है । भयावह और शंकास्पद कार्य का परिणाम झेल नहीं सकता । डर के कारण ही शंका उत्पन्न होता है । लज्जाबोध और हीनताबोध होता है । इन सभी कारणों का प्रभाव उसके सांसारिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में भी पडता है । 


आवश्यक मात्रा से कम या नगन्य मात्रा में डर होना भी उचित नहीं है । इससे व्यक्ति में दुराचार, अनैतिकता, दमन, अनुशासनहीनता, दम्भ-घमण्ड, मालिकियतपना आदि आ सकता है । क्यूँकि जब भय नहीं रहता तब व्यक्ति स्वच्छन्द होता है । किसी नियम या अनुशासन को पालना करना उचित नहीं समझता । कोई उसका उदण्डता पर उँगली नहीं उठा सकता । किसी ने कुछ बोलने का सहास भी किया तो उसका दमन करता है, अनेक भय दिखाता है, धाक और घम्कि देता है । इस प्रकार से कम या अधिक मात्रा में डर होना दोनों हानिकारक है । 


डर को सन्तुलन में रखने के लिए नियन्त्रण आवश्यक है । चेतना इसका कुंजी है । चेतना में रहने से कोई भी स्थूल या सूक्ष्म भाव दिखाई देता है । वो भाव कहाँ से आया है, कैसे स्वयं को प्रभावित कर रहा है, कितना उचित और कितना अनुचित है, कैसे सन्तुलन में रखा जा सकता है, ये सब निर्णय करने में सहायक होता है । जिसमें डर का भाव सन्तुलित हो, वो हर क्षेत्रमें प्रगति कर सकता है । चाहे वो सांसारिक हो या आध्यात्मिक हर क्षेत्र सुगम्य होता है । जहाँ असुरक्षा या ख़तरा हो वहाँ का परिस्थिति आँकलन करके उचित उपाय कर सकता है । नियमों का सचेतना और अनुशासनपूर्वक पालन करता है । उसका मन और स्वभाव निर्मल होता है । चेतना हरपल बना रहता है । अन्य गुणों का भी विकास हो जाता है, क्यूँकि इस अस्तित्व में जो भी भाव है उन में पूरक सम्वन्ध होता है, यही नादका यानि कि प्रकृतिका नियम है । इसीलिए हर जीव में सन्तुलित निडरता उचित है ।

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