व्यक्ति

 व्यक्ति


व्यक्ति अस्तित्व का एक मिथ्या अनुभव है जो उत्तरजीविता के लिए अहम भाव को धारण या व्यक्त करता है । वो एक अनुभव मात्र है जो अनुभवकर्ता द्वारा अनुभव होता है । जीवों में भी मनुष्य में अहम वृत्ति अधिक बलशाली होता है । शरीर, नाम, लिंग, गुण, योग्यता, जाति, वर्ण, कुल, घराना, व्यवसाय, आदि उसका पहचान बनतें हैं । ये सब मिथ्था है, एक वस्तु मात्र है, अनुभव मात्र है । बदलते रहते हैं अस्थायी है, एक दिन सब मिट जाता है । चित्त स्मृति के कारण स्थायी प्रतीत होता है, चित्त कि रचना मात्र है । उतरजीविता के लिए विभिन्न मान्यता और मतारोपण थोप दिया जाता है । उस जीवका जीवन अवधि तक चित्त निर्मित छायां को मैं मानकर जीता है । 


व्यक्ति मनुष्यका गणना योग्य पहचान भी है, अहम वृत्ति उसका कारण है, इसीलिए व्यक्ति से व्यक्तिव्व, व्यक्तिगत, व्यक्तिनिष्ठ आदि अहम सूचक शब्द प्रयुक्त है । अहम के कारण व्यक्ति में कर्ता भाव रहता है । जब व्यक्ति ही माया है तो कर्ताभाव भी मिथ्या ही है, लेकिन माया में उत्तरजीविता के लिए व्यक्तिका कर्ता भावका अहम भूमिका है । क्यूँकि जो नैतिक-अनैतिक कार्य उसके द्वारा होते हैं उसका उत्तरदायित्व और कर्मफल बहन करना जरुरी है । 


ब्रम्ह जो जीव के रुपमें लीला करनेके लिए अवतरण हुआ है, उस जीव का उत्तरजीविता आगे बढाने और आध्यात्मिक प्रगति करके पुनः ब्रम्ह में विलय होने के लिए व्यक्ति निष्ठता बड़ा काम आता है । क्यूँकि सभी मनुष्य का इच्छा, वासना, प्रारब्ध वही नहीं है । सोच, विचार या दृष्टिकोण एक समान नहीं है । सभी का बुद्धि और चेतना एक समान नहीं है । इसीलिए अवनति या प्रगति भी एक समान नही होता । ये सब गतिविधियाँ संचालन करके मुक्ति या बन्धन के मार्ग में गतिशिलता के लिए व्यक्ति का पृथक् भूमिका आवश्यक होता है ।


चित्त कि परतीय रचना के अनुसार जीव विकासक्रम में शून्यता के अनन्त सम्भावनाओं में से अनुभव में जब संवेदना प्रकट होता है तब अहम वृत्ति भी शुरू होती है । मानव चित्त के स्तर में पहुँचने तक संवेदना, वासना भावना, अहंकार, इच्छा, कामना, विचार,  स्मृति, बुद्धि, और चेतना का विकास होता है । मानव चित्त में बुद्धि और चेतना के कारण सत्य और मिथ्या जानने की क्षमता है । मुक्ति के मार्ग में आगे बढने का मौक़ा यही है । सभी मानव में उक्त गुण एक समान विकास नहीं होते । व्यक्ति के उक्त गुणों के अनुसार कर्म और कर्मफल भुगतान करना पड़ता है । एक ही विश्व चित्त होते हुए भी अहम और व्यक्तिनिष्ठता का कारण सभीका प्ररब्ध अलग-अलग होता है । मुक्ति और बन्धनका मार्ग जो होना है अपना अपना होता है । 


बुद्धिमान और ज्ञानी व्यक्ति बुद्धिमता और स्वचेतना के द्वारा अपना मुक्ति का मार्ग तो खोज ही लेता है,  दूसरों का मुक्ति के लिए भी ज्ञान सेवा और अनेक मानवीय सेवा करता है । जो अज्ञानी व्यक्ति है उनका उद्धार करने के लिए अवतरण होता है, अनेक प्रयत्न करता है, क्यूँकि वो जानता है कि सभी जीव अपना ही स्वरुप है । सभी के सुख और मुक्ति ही मेरा सुख है । मैं व्यक्ति नहीं हूँ, कोई व्यक्ति नहीं है, फिर भी जब मैं लीला करने के लिए अवतरित हुआ हूँ तो छुपा हुआ सत्य जानने के लिए मिथ्या व्यक्ति का उपयोग आवश्यक है । काँटे को निकालने के लिए काँटे का ही सहारा लेना पड़ता है, इससे अधिक व्यक्तिका और कोई महत्व नहीं है । व्यक्ति मिथ्या है अनुभवकर्ता यानि कि चैतन्य तत्व ही सत्य है ।


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