लोभ

 लोभ 

अधिक साधन जमा करने की लालच और दूसरों का साधन छिन लेने का चेष्टा को लोभ कहते हैं । लोभ अहम् भाव वृत्ति का ही एक उपज है । अज्ञान के कारण “मुझे और मेरे सम्वन्धियों के लिए ये भी चाहिए, वो भी चाहिए, सभी साधन मैं इकठ्ठा करुँ, मुझे सुख मिले, किसी चिज की कमी न हो” इस विचार से ग्रसित होकर लोभ का भाव उत्पन्न होता है । समाज में लोभ लालच व्याप्त है । लोभ के कारण व्यक्ति में अन्य दुर्गुण भी बढे हैं । हिंसा, अनैतिकता, भ्रष्टाचार, दुराचार, असमानता, ग़रीबी फैल रहा है ।


व्यक्ति जितना साधन जमा कर लेता है और अधिक जमा करने के लिए उद्दत होता रहता है, लेकिन उसको कभी भी सन्तुष्टि नहीं मिलती । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हर क्षेत्र में मिलता है । विश्व में सर्वाधिक धनी व्यक्ति अधिक धन कमाने में लगें हैं, लेकिन उनको सदैव अशान्ति और बेचैनी है । कोई व्यक्ति कितने भी शक्तिशालि देश के सर्वोच्च पद पर हो उस पद पर चिपके रहनेका लालच है, पद से उतरना नहीं चाहता, उसको और आसक्ति है । जो मान सम्मान के लालची है वहीं निचे गिरतें हैं । जो भोजन के लालची होते है, उनको अनेक विमारीयों ने घेर लेता है । कोई भोग विलास के साधन इकट्ठे करने में लिप्त है और उसका भोग नहीं कर पाते । सन्तुष्ट इनमें से कोई नहीं । 


जो अति आवश्यक है उसके लिए प्रकृति ने स्वयं व्यवस्था कर रखी है । जो जमा करता है, इस नियम के विरुद्द जाने का प्रयास करता है, उसको सुख चैन नहीं मिलता । यहाँ पर एक प्रशिद्द रसियन कथा भी सान्दर्भिक होता है । “एक समय एक व्यक्ति ज़मीन प्राप्ति के लिए निकल पड़ा । वहाँ पर एक शर्त था कि उसने दिनभर में जितनी एरिया पैदल चलकर घेर लेगा वो सब ज़मीन उसको मिलेगा । उसने सूर्योदय के साथ यात्रा शुरु किया और दिन भर दौडता रहा । उसने सोचा कि-अधिक से अधिक ज़मीन घेर लूँगा तो जीवन भर सुख भोग करूँगा । जितना अधिक नाप लिया और अधिक लालच बढ गया; और दूर चला गया । उसने खाने पिने के लिए भी समय नहीं दिया । भूखे प्यासे भागता रहा ताकि अधिक एरिया घेराव कर सके । सूर्यास्त तक बहुत सारे एरिया नाप कर जब वो गन्तव्य पर पहुँचा, तब भूक, प्यास, थकान के कारण वहीं पर गिर गया और प्राण त्याग दिया । अंत में उसको दफन करने के लिए केवल छ फिट ज़मीन काफ़ी हो गया ।” 


साधन के विना तो उत्तरजीविता संभव नहीं है, लेकिन जो चाहिए होता है उसका व्यवस्था पहले से है इकट्ठा करना ज़रूरी नहीं है । हमें जितनी मात्रा में जो आवश्यक है, बस उतना ही उपयोग कर लेना है । किसी के दर्जनौ सेट कपडे होंगे, लेकिन पहनते तो एक ही सेट । छपन्न भोग होंगें; खाने के लिए पेट तो एक ही है । अनेक गाड़ियाँ होगें; गन्तव्य तक तो एक ही साधन पर जाना है, एक ही बार दो साधन का उपयोग तो नहीं कर सकतें । अनेक महल होंगे; रहना तो एक ही जगह पर है । इस अस्तित्व में सब कुछ अपने आप होता है । जब पेट मिला है तो खाना भी मिलता ही है । अन्य जीवोंको जमा करनेका कोई भी चिन्ता या जरुरत नहीं । मनुष्य के अलावा अन्य सभी जीवों का जीवन सुख शान्तिपूर्वक चल रहा है । मनुष्य ही सब कुछ होते हुए भी बेचैन है । ये लोभ का परिणाम है । लोभ कहीं भी उचित नहीं है, आध्यात्मिक क्षेत्र में भी नहीं । एक साधक भी जल्दी प्रगति करने का, ज्ञानी होने का, सिद्धियाँ प्राप्त करनेका इच्छा रखता है । प्रारब्ध से अधिक और समय से पहले अपेक्षा करना भी लोभ ही है । स्वभाविक साधना और अभ्यास से प्रगति होता है, अवान्छित प्रयास से नहीं । 


लोभ का परित्याग करना साधकका महत्वपूर्ण गुण है । लोभ और अन्य सभी दुर्गुण अन्तर सम्वन्धित हैं, एक को बढ़ावा देने से दूसरा बढ़ जाता है और एक को त्यागने से दूसरा छुट जाता है । हमें दुर्गुण हटाकर सद्गुणों को बढ़ाना है । ज्ञानीजन, गुरुजन और ऋषिमुनिओं नें अज्ञान को हटाकर लोभ और अन्य दुर्गुण को परित्यग करके आज हम सब के लिए प्रेरणा का श्रोत बनें हैं । स्वयं मुक्त होकर संसार को मुक्त करने में जुटे हैं । सांसारिक सुख दुःख से परे हैं । सदा निश्चिन्त और आनन्दित हैं । आध्यात्मिक हो या सांसारिक हर क्षेत्र में लोभ का परित्याग करके ही सन्तुष्टि, सुख, चैन, शांति, मुक्ति और आनन्द मिलता है ।


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