विचार

 विचार


विचार एक मानसिक अनुभव है, जो विश्वस्मृति से प्रकट होकर जीव स्मृति में प्रक्षेपित होता है और अहम् वृत्ति ने अपना स्वामित्व लेता है । विचार सुक्ष्म कर्म है, वाणी तथा व्यवहार के माध्याम से अभिव्यक्त होता है और स्मृति में संस्कार के रुपमें अपना छाप छोड़ता है । यहीं से दूसरा विचार उत्पन्न होता है और विचारों एवं कर्मका अनन्त श्रृंखला चलता रहता है । 


अन्य अनुभव के तरह विचारका आधार भी नाद ही है । इसीलिए द्वैध और चक्रीय परिवर्तन नादका जो स्वभाव है, यही विचार का भी स्वभाव है । यानि कि विचार सकारात्मक और नकारात्मक होता है, वदलता रहता है और निरन्तर चलता रहता है । स्मृति में जैसे संस्कार पड़े हैं, उन से विचार उत्पन्न होता है । संस्कार अच्छे है तो सुविचार और खराव संस्कार से कुविचार उत्पन्न होता है । विचार से वाणी, वाणी से कर्म, कर्म से कर्मफल आता है और ये चक्र चलता रहता है । 


विचारका अभिव्यक्ति व्यक्ति के स्वभाव और चेतना के स्तर अनुसार भिन्न भिन्न रुपमें होता है । एक आध्यात्मिक और चेतनशील व्यक्ति में कोई विचार उत्पन्न होता है तो वो सुक्ष्म रुपसे उसको देखता है । ये विचार अभिव्यक्त करना उचित है या नहीं ? कहाँ से आया है ? क्यूँ आया है ? इस विचार से कैसा कर्म होगा और कैसा कर्मफल आएगा ? ये सब बुद्धि और विवेकके प्रयोग करके विश्लेषण करता है । यदि उचित है तो अभिव्यक्त करता है, और यदि अनुचित है तो रोक देता है, नियन्त्रण करता है । ऐसा करने से अनुचित कर्म नहीं होंगे बुरा प्रभाव नहीं पड़ता । एक सांसारिक और अज्ञानी व्यक्ति विचार आते ही कर्म कर देता है, सोच विचार नहीं करता । उसका विचार अनियन्त्रित होता है, वाणी अशुद्ध होता है, अनावश्यक और बुरे कर्म होतें है । कर्मफल भी बुरा आएगा, सभी में नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और यही सिलसिला दोहराता रहेगा ।


वयक्तिमें दिन में जितने भी विचार आते है अधिकांश विचार नकारात्मक होते हैं । विचार का प्रभाव सभी क्षेत्रमें पड़ता है । सर्वाधिक हानि नकारात्मक विचार धारण करने वाले को ही मिलता है । विचार से मन, वाणी, शरीर, कर्म समेत आसपासका वातावरण भी प्रभावित होता है । शारिरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य और सम्वन्ध में नकारात्मक प्रभाव पड़ता है ।  विचार से भावना का परत भी अशुद्ध होता है । व्यक्ति निर्दयी, हिंसक, दुराचारी, अत्याचारी और नीच होता है । सदैव अशान्त और दुःखी रहता है । आसपास के वातावरण को प्रभावित करता है । सर्वत्र दोष ही दोष देखता है । अपने आप को सही और शक्तिशाली समझता है । 


विचार सही होने के लिए बुद्धि और चेतना का प्रयोग महत्वपूर्ण है । चेतना ने विचारोंको देखता है । गलत और अनावश्यक विचार चेतना के प्रकाश पड़ते ही निश्तेज हो जाते है । आवश्यक विचार भी नियन्त्रित होतें, परिष्कृत होतें है । वाणी, कर्म और आसपासके वातावरण में सकारात्मकता और मधुरता विखेर देता है । अहम्, आचरण, मन, भावना आदि में भी विचार के द्वारा ही शुद्धि और अशुद्धियाँ दिखाई देते हैं । जो भी अशुद्धियाँ है उनको भी चेतना के प्रकाश में लाने से शुद्धिकरण आपने आप हो जाता है । सभी अनुभव एक ही चित्तका प्रक्षेप है । इसीलिए एक का प्रभाव दूसरेमें पड़ता ही है । विचारशुद्धि से जीव स्मृतिके प्राय सभी परत शुद्ध होते है और वृत्ति नियन्त्रित होते है । व्यक्ति में दया, करुणा, क्षमा, प्रेम, भाव बढ़ जाता है । यदि आसपासके वातावरण अनुकुल नहीं है और सही करना अपने बस में भी नहीं है तो उस परिवेश से स्वयं को अलग करना उचित होता है । एकान्त में आसपास के वातावरण भी शुद्ध होता है, यानि कि स्वयं का अनुकूल होता है । इसलिए प्रभाव बुरा नहीं होता । ग़लत, अनर्गल और अनावश्यक विचार उत्पन्न नहीं हो पाते । खाली समय में सत्संग, मनन, साधना आदि आध्यात्मिक गतिविधियों में व्यस्त रखने से भी सही विचार बनाए रखने में बडा सहज होता है ।


विचार स्वच्द्दन्द है । व्यक्ति जो चाहे सोच-विचार कर सकता है । किसी ने देखता नहीं, सोचने से रोकनेवाला कोई नहीं है, कोई बन्दज नहीं है । निर्वाधरुपसे चलता रहता है । यदि व्यक्ति ने इस प्रकारके निरर्थक विचारोंको बुद्धि, विवेक और चेतना के द्वारा नियन्त्रण और शुद्धिकरण नहीं किया तो कुछ भी विचार आ सकता है । कुछ भी बचन निकलते है और कुछ भी कर्म हो जाते है । शुद्ध, नियन्त्रित और संयमित विचार से सही, शात्विक, नैतिक और आवश्यक कर्म हो जाते है । सही कर्मफल आता है, आसपास के ख़राब माहौल भी सुधरने लगेगा और व्यक्ति सुख शान्ति एवं आनन्दमें रह सकता है ।



कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें