मित्था ज्ञान

मित्था ज्ञान 

यदि स्मृति मिथ्या है तो ज्ञान कैसे सम्भव है ?

अस्तित्व में सभी अनुभव का आधार नाद है, और नाद स्वयं एक परिकल्पना मात्र है । जब आधार ही मिथ्या है तो मिथ्या में प्रकट होनेवाले कोही भी चीज़ सत्य नहीं हो सकता, मिथ्या ही होता है । स्मृति मिथ्या, अनुभव मिथ्या, ज्ञान मिथ्या और जीव भी मिथ्या । इसीलिए मिथ्या को जानने के लिए मिथ्या  के अतिरक्त अन्य कोई भी विकल्प नहीं है । 


ज्ञानमार्ग में ज्ञान का साधन दो ही है;-अपरोक्ष अनुभव और तर्क । माया के ज्ञान के लिए भी यही दो साधन उपयोग होते हैं । इसके लिए माया का मॉडल बनाकर इन्हीं मॉडल पर अपरोक्ष अनुभव और तर्क का प्रयोग किया जाता है । परिकल्पना और सिद्धान्त निर्माण करके मायाका अध्ययन होता है ।


नाद में दो अवस्था का परिवर्तन जब वृत्त में चलने लगता है, तब वहाँ चलनेवाले प्रक्रिया और वृत्ति के परिणाम स्वरुप रचनाएँ बनते हैं । विश्वस्मृति का विशाल परत पर चादर में चित्र कि तरह व्यवस्थित रुपसे छप जाते हैं । अनुभवों का व्यवस्थित संयोजन ज्ञान है । ज्ञानका परत भी इसी प्रकार से विश्वस्मृति में छप जाता है । ज्ञान को विश्वस्मृति से जीव स्मृति ने अपनी सीमित इन्द्रियाँ और ग्रहणशील क्षमता के अनुसार ग्रहण करके अपने स्मृति में भर लेता और उपयोग कर लेता है । इस प्रकार से मिथ्था स्मृति का ज्ञान उस स्मृति का ही दूसरा परत (ज्ञानका परत) द्वारा संभव है । जैसे काँटे को निकालने के लिए काँटा का ही सहारा लिया जाता है; वैसे ही मिथ्या को जानने के लिए भी मिथ्या ज्ञान का ही सहारा लेना पडता है ।


सत्यको जानना सम्भव नहीं; अज्ञेय है, लेकिन उस स्तर तक पहूँचने के लिए माया का अज्ञान को नाश किया जाता है । जगत, वस्तु, पदार्थ, शरीर ,मन आदि अनुभव के बारेमें ये भी नहीं, वो भीं नहीं (नेति नेति विधि) कर कर के तत्व तक पहूँचा जाता है । इसको नकारात्मक ज्ञान माना गया है । इस प्रकार से मिथ्या को जानने के लिए माया का मॉडल पर अपरोक्ष अनुभव और तर्क का उपयोग एवं सत्य तक पहूँचने के लिए माया का अज्ञान भरा मान्यता पर अपरोक्ष अनुभव और तर्क का उपयोग करके 

ज्ञान सम्भव है ।


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