सेवा
ज़रूरतमंदों के हित एवं उपकार के लिए अपनीं रुचि के अनुसार निश्वार्थ भाव से करने वाले कर्म को सेवा कहतें हैं । सेवा भाव जीवका स्वभाव है । गुणवान व्यक्ति में दुसरों कि मानवीय आवश्यकता, दुःख कष्ट और अज्ञान से मुक्त करने के लिए सेवा भाव पैदा होता है ।
इस संसार में सभी जीवों का विकासस्तर समान नहीं है । जीवों के स्तर अनुसार समान प्रगति के लिए एक दूसरे का सहयोग एवं सेवा भाव ज़रूरी होता है । ग़रीबों के लिए भौतकि एवं वित्तीय सहायता, भूखे के लिए भोजन, अशक्त के लिए सहारा, रोगीओं के लिए औषधोपचार, वालवालिका एवं वृद्ध के लिए स्याहार-संभार, पालनपोषण,अज्ञानी के लिए ज्ञान जैसे विभिन्न प्रकार के ज़रूरतमन्दों को अलग-अलग प्रकार के भौतिक, मानवीय एवं आध्यात्मिक सहायता आवश्यक होता है ।
जीव के विकसस्तर अनुसार बुद्धि, विवेक, ज्ञान और चेतना का स्तर भी विकसित होता है । जीवका जितना विकसित परत है उतना ही मुक्ति और एकत्व की ओर चला जाता है । जीस स्तरका जीव या व्यक्ति है, उसी अनुसार उसने आपना सेवा भाव को परिभाषित करता है । उदाहरण के रुपमें एक सामान्य जीव में केवल उत्तरजीविता आगे बढाने के लिए सेवा भाव होता है । एक भाव वृत्ति प्रधान व्यक्ति को सांसारिक बन्धन सृजित दुःख पीडा से सम्वन्धित विषयों पर दया का भाव आ जाता है, दूसरों का भौतिक आवश्कता के लिए सेवा करता है । बुद्धि प्रधान व्यक्ति स्नेह और विवेक के साथ मानवीय दृष्टिकोण से सेवा करता है । ज्ञानी के दृष्टि में प्रेम, करुणा का भाव रहता है । सभी में अपना ही रुप दिखाई देता है । सभी के सुख दुःख में अपना सुख दुःख निहित मानकर बन्धनों से मुक्ति एवं अज्ञान नाश के लिए सेवा करता है ।
सेवा भाव में अपनापन, दया, करुणा, प्रेम, मानवीयता, सहानुभुति, समानुभुति, इमानदारिता, नैतिकता जैसे गुण अन्तरनिहीत होते हैं । इन गुणों रहित सहयता केवल देखावटी, स्वार्थपूर्ण और औपचारिकता के लिए मात्र होता है । जो नाफा और प्रतिफल के आशा करके किया गया हो; वो सेवा नहीं है । सेवा मे निश्वार्थता, शुद्धता और प्रेम होना अति आवश्यक है । आवश्यकता से अधिक सेवा भी हानिकारक होता है । क्यूँकि इससे व्यक्ति आलसि और अकर्मण्य होता है, पर निर्भर होता है, लोभ और आसक्ति भी बढ सकता है । इसीलिए जहाँ जितना आवश्यक है वहाँ उतना सेवा करना चाहिए । ये मानवीय धर्म है । जो सेवा ज्ञान के लिए होता है, दुःख से मुक्ति के लिए होता है, वो सर्वोच्च सेवा है ।
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