प्रेम
प्रेम ब्रम्हका अभिव्यक्ति है । एक शाश्वत भाव है, अस्तित्वका गुण और अनुभवकर्ता का स्वभाव है । प्रेम एक दूसरेके प्रति आसक्ति, आकर्षण या मोह के कारण उनत्पन्न होनेवाला भाव नहीं है । प्रेम में कोई भी अपेक्षा, स्वार्थ या मिलावट नहीं होता । ये निर्मल और निर्गुण भाव है । प्रेम में कोई अपना पराया नहीं होता, सबके प्रति समान दृष्टिकोण होता है । सब बराबर है, सभी का स्वरुप एक ही है, दूसरा कोई नहीं, कोई भिन्न नहीं, सभी स्वरुप मैं ही हूँ, मेरे होनेका भाव जैसा होता है वही प्रेम है ।
प्रेम सच्चिदानन्द का साक्षात् स्वरुप है । प्रेम कोई भी कारण या प्रभावके अधिन नहीं है । यदि कोई कारण या प्रभाव से है तो वो प्रेम नहीं भ्रम होगा, मोह और आशक्ति होगा । यदि कोई अपेक्षा है तो वो सौदा होगा, व्यवसाय होगा क्यूँकि प्रेम मे कोई लेनदेन नहीं होता । प्रेम मुफ़्त में है, निर्बाध है, अविराम है, सत्य और नित्य है ।
अज्ञानी लोग प्रेम को मात्रा में तोलना चाहते हैं । मैंने इतना प्रेम दिया और मुझे प्रेम नहीं मिला, कम या ज्यादा मिला; मैं ये करुँगा तो मुझे प्रेम मिलेगा; मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ सभी को मुझे प्रेम करना चाहिए; या मैं तो सब को प्रेम करता हूँ लेकिन मुझे वैसा प्रेम नहीं मिलता; यदि ये प्रेम नहीं मिला तो मेरा जीवन बेकार है; मैं मर जाउँगा; इस तरह के सबाल और मनोभाव प्रकट करते रहते हैं । इसी गलत समझ के कारण समाजमें दुःख है । अशान्ति और असन्तुष्टि है, हिंसा, अनैतिकता और व्यभिचार फैल रहा है ।
संसार में अज्ञान है, इसीलिए प्रेम का समझ ग़लत है । अधिकांशतः दो विपरित लिङ्गी के बीचका मोह, आकर्षण या आसक्ति को प्रेम समझा जाता है । माता-पिता, पति-पत्नी, सन्तान या अन्य कोई भी रिश्ते-नाते, सम्बन्धी के प्रति जो माया, ममता होता है वो भी प्रेम नहीं है । क्यूँकि वहाँ भी कुछ इच्छाएँ, कामनाएँ, वासनाएँ, अपेक्षाएँ और स्वार्थ होतें है ये मिलावट है । मोह, आसक्ति, असुरक्षा का भय, सही होनेका कामना आदि भाव मिला हुआ होता है । जिसने प्रेमको नहीं पहचान सका, गलत और विपरित अर्थ में समझा है, उसमें कठोरता, घृणा एवं नफ़रत प्रकट होता है । वो सदा व्याकुल रहता है, कुण्ठित और भ्रमित होता है । जिसने प्रेमको व्यवसाय समझा है उसको लाभ हानी ही मिलेगा । जिसने प्रेम को अज्ञान के अन्धकार में ही ढके रहना देता है उसको प्रेम नहीं मिलेगा ।
सम्पूर्ण अस्तित्व प्रेममय है । हर अनुभव में प्रेम व्याप्त है । प्रेम सर्वत्र एक समानरुपमें वरष रहा है । जो प्रेम में भीगना चाहेगा वो प्रेम में समा जाएगा । जिसने शास्वत प्रेम को पहचान पाया उसी में प्रेम प्रकट होता है, वही सुखी शान्त और आनन्द में रहता है । उसमे कोई विकार उत्पन्न नहीं होंगे । करुणा और सेवा भाव से दूसरों का भी मुक्ति के लिए कार्य करेगा ।
प्रेम अनुभवकर्ता का पर्याय है । इसीलिए प्रेम बिना अस्तित्वका परिकल्पना सम्भव नहीं है । प्रेम ही अन्य सभी अनुभव उद्भवका श्रोत है । प्रेम पहले से विद्यमान है । इसको पाने के लिए केवल अज्ञान हटाना आवश्यक है । प्रेम में मेरा-तेरा भाव नहीं होता । लेना-देना, खोना-पाना नहीं, स्वयंको होनेका भाव है, स्वयं प्रसारित है, अविरल है । ये कम या ज़्यादा नहीं हो सकता । सभी में समान और सभी के लिए समान होता है । प्रेम तो निर्मल है, कुछ भी मिलावट नहीं होता । प्रेम स्वयं में परिपूर्ण है । मोह, माया, आकर्षण स्वार्थ और अपेक्षाओं से परे है, स्वच्छ और कंचन होता है । प्रेम के प्रति श्रद्धा और समर्पण जरुरी है, उसके बाद प्रेम व्यक्तिको सम्पूर्णरुपसे ओतप्रोत कर देगा, आनन्द के सागरमें डुबो देगा । परम शांति में स्थापित करवाएगा ।
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