नाद

 नाद

नाद प्रकट अस्तित्वका आधार है, लेकिन एक पराभौतिक परामानसिक परिकल्पना मात्र है । अस्तित्व में अनंत संभावनाएं हैं, सम्भावना से नाद और नाद से नादरचनाएँ बनते हैं ।  नाद अनंत होता हैं । नादका अनुभव नहीं होता, नाद कोई पदार्थ नहीं है । नाद में दो अवस्था में चक्रीय परिवर्तन होता है । विभिन्न प्रक्रियाएँ चलते हैं, स्वयं संगठित होते हैं, और वृत्तियाँ पैदा होते है । यहीं से नाद रचना का विकास होता है ।  नाद से ही अनुभव या घटनाएँ निर्मित होते हैं । अर्थपूर्ण नाद से नादरचनाएँ बनते हैं । रचनाएँ संगठित होते होते सरल से जटिल परतीय संरचना बनते हैं । यानि कि नाद में योग होने से जटिल होता है और वियोग होने से सरल होता है । प्रकाश ध्वनी वस्तुएँ सभी नाद है । विभिन्न इन्द्रियां जो पकड़ती है वो सभी नाद ही है । 


नाद में सृज़न का अनंत संभावना होता है । अनंत नाद नियमित और अनियमित भी हो सकते हैं, परंतु नियमित नाद से ही संरचनाएँ बनते हैं । अनियमित नाद बिखरा हुआ होता है, इसे पकड़ पाना संभव नहीं है, सृष्टि और उत्तरजीविता के लिए उपयोगी भी नहीं है । नियमित नाद रचना में परिवर्तन भी नियमित होता है, और क्या परिवर्तन हुआ है वो भी जाना जा सकता है । अनियमित नाद को अनदेखा कर दिया जाता है l 


नाद रचना का विकासक्रम परत में होता है । परतीय रचना को चित्त स्मृति कहते हैं । परत अनेक हो सकते हैं, निचली और ऊँची परत आपस में निर्भर एवं सम्बंधित होते हैं । जीवन के लिए जितना आवश्यक है उतना बनकर रचना-विनाश का चक्र चलाते हैं । विशेष प्रकार के नाद रचना स्मृति के रुपमें परत में व्यवस्थित होकर अर्थस्थायी नाद रचना बनता है । अन्य नाद रचनाका रूप भी ले सकता है, प्रतिकृति बनाके फिर से स्मृति में छपता है और स्थायी लगता है । वस्तुएँ नाद रचना के समूह से बनते हैं । नियमित और धीरे से परिवर्तन होने के कारण स्थाई प्रतीत होते हैं । छोटे छोटे नाद रचना और संबंधित संपूर्ण घटनाओं के बीच स्मृति सेतु के माध्यम संपर्क होता है । भिन्न अवस्थाओं पर भी स्मृति ने सेतु के मार्फ़त अनुभवों को निरंतरता देता है, इस से भी स्थायित्व का भ्रम दिखता है ।


नाद की गति (आवृत्ति) धीमी या तेज होती है । इस प्रकार के आवृत्ति शून्य से लेकर अनंत हो सकता है । नाद परिवर्तन का मात्रा भी शून्य से लेकर अंनत तक हो सकता है । दो परिवर्तनबीच कितने मात्रा में अंतराल है इसी आधार में भिन्न, सरल और जटिल रचनाएँ प्रकट होते है । नादरचनाएँ जब तक अनुभव में आते हैं, तब तक कई प्रकार के प्रारूप बदल गए होते हैं, बनावटी होते हैं । जो दिखता है वो वो नहीं होता । नाद स्मृति में संचित न होता तो परिवर्तन का और अनुभव का पता भी नहीं चलता । स्मृति बिना अनुभव संभव नहीं है । छोटा छोटा नाद स्मृति में संकलित होकर पूर्ण अनुभव बनता है । स्मृति में नाद रचनाओं का निकटतम सम्बंध बनता है । स्वयं संगठन होता है । इन्द्रियों ने नाद का प्ररुपण करते हैं, व्यवस्थापन करते हैं, अनावश्यक और निरर्थक को निकाल देते हैं l अनुभव में सम्बंधित ज्ञान जुड़ने से पूर्णता का अनुभव होता है, और उस चीज़ के बारे में सारे अनुमान लगाया जा सकता है । इस प्रकार से उत्तरजीविता के लिए इन्द्रियां मिथ्या अनुभव कराती है, इसी से जीवन चलता है ।


स्मृति में स्थित वस्तुएँ नाद प्रसारित करते रहते हैं । इन्द्रियॉ नाद को पकड़ते रहते हैं । सभी दिशाओं में संवेदन नाद के द्वारा प्रसारित होता है, यहीं से जीव स्मृति ने पकड़ के अपने भीतर प्रसारित करता है । नाद मे चलनेवाला प्रक्रिया नाद रचनाओं को सृजन, समायोजन और नियंत्रण करता हैं । कोई रचना का प्रक्रिया धीरे चलता है, और कोई रचनाओँ का प्रक्रिया जल्दी चलता है, इन्द्रियां भी पकड़ नहीं पाता । एक वस्तु में संरचना और प्रक्रिया दोनों होते हैं । जितनी जटिल संरचना होती है, उतना ही जटिल प्रक्रिया होता है ।


सभी परतों में प्रक्रिया, वृत्तियॉ, इंद्रियां होते हैं । संपर्क सेतु के माध्यम से जुट के नई वृत्तियॉ, संरचनाएँ बनते हैं । ये सब विश्वस्मृति में होता है । परतीय रचना में समय और स्थान का कोई सीमा नहीं होता, विभाजन नहीं होता है, परंतु वृत्तियों के विशेषता और विकास के आधार में अधिक भिन्नता आने के कारण पहचान करना कठिन हो जाने पर मनगढ़ंत वर्गीकरण किया जा सकता है । निचली परतों में जो होता है ऊँची परतों में भी वही चलता है, क्योंकि सभी परत में इन्द्रिय है और आपसी निर्भरता है । 


नाद मूलभूत है, सारे नाद रचनाएँ विश्वस्मृति में संग्रहित होते हैं और विश्वस्मृति स्वयं नाद है । सभी स्मृतियों का योग ही विश्वस्मृति है । विश्वस्मृति के अनुभव जीव ने अपने आवश्यकता के अनुसार अपने स्मृति में संग्रहित करता है, प्रतिकृति बनाता रहता है । जीव और विश्वस्मृति के बीच में कोई दीवार नहीं है क्योंकि स्मृति में कोई समय और स्थान नहीं है, पराभौतिक परामानसिक है । नाद जब तक स्मृति में नहीं छपता तब तक भौतिक और मानसिक भेद नहीं किया जा सकता है । भौतिक और मानसिक अनुभव का आधार स्मृति है । नादरचनाएँ पराभौतिक परामानसिक होने के कारण यदि कभी संपूर्ण परतीय रचना नष्ट हो भी गया तो विश्वस्मृति में उसका जो छाप छूट जाता है, उसी से उसका वैसा ही पुनर्संरचना होता है । अस्तित्व में अनंत संभावना है । वृत्तियॉ आती जाती रहती हैं, प्रक्रिया चलता रहता है, रचना-विनाश के क्रम चलते रहते हैं । एक जगह रुकी भी तो दूसरी जगह चलते हैं । नादका कोई सीमा नहीं, कभी अंत नहीं होता है, रुकता नहीं, इसी से माया का अनन्त श्रृंखला चलता रहता है ।



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