सन्यास

 सन्यास


सामान्य अर्थमें सांसारिक जीवन से छुटकारा लेकर मुक्ति के मार्ग में बाक़ी जीवन समर्पण करना सन्यास है । व्यवहारिकरुपमें अध्यात्म, उत्तरजीविता या  मनोरंजन जैसे कोई भी क्षेत्र में समर्पित होकर जो कर्म कर रहा है उस कर्म का विसर्जन करना, कर्मसे विरक्त होना, बन्धनों से अलग होना, उस कर्म का मोहपास त्याग देना और बाक़ी जीवन न्यास, ध्यान, साधना और आध्यात्मिक अनुशासनमें रहकर अवलम्बित पथ का आचरण पालन करना सन्यास है । सन्यास आचरण में सांसारिक बन्धन और गतिविधि या कर्म करना बाध्यकारी नहीं होता, मुक्त होता है । 


समाज में माया, काम र क्रोध, लोभ, मद आदि बाधाएँ है । व्यक्तिको सांसारिक परिवेश में अधिक भूमिका और जिम्मेदारियाँ है । अपेक्षा और साधन के बीच सामनजस्यता न होने से अशान्ति और विद्रोह बढ़ता है । समाज में व्याप्त निकम्मा और आलसीपन, इर्ष्यालु, प्राप्ति के लालसा, रिस राग, कलुषता जैसे दुर्गुणहरू के कारण ज्ञानी जन में सांसारिकता के प्रति वितृष्णा जाग जाता है । इन सब दुखों से मुक्ति के लिए सन्यास विकल्प के रुपमें आता है । जिसने सन्यास का मार्ग चयन किया है उसको सन्यासी कहते हैं । सामान्यतया सन्यासी द्वारा अति आवश्यक उत्तरजीविता के कर्म, साधारण एवं शात्विक  खानपान, साधा वस्त्र, कुटी गुफा या आश्रम में रहनेका प्रचलन देखने को मिलता है, लेकिन यही बाध्यकारी नहीं है । दिखावटी रुपमें नहीं विचार, व्यवहार और आचरण से सन्यासी होना महत्वपूर्ण है । 


जिसमे आध्यात्मिक चेतना हो उसको शान्ति आनन्द और मुक्ति के लिए सन्यास का आचरण अवलम्वन करना आवश्यक होता है । उचित आध्यात्मिक मार्ग और उस मार्ग का नियम पालन करना पड़ता है ।  अनुशासन में रहना, चेतनामें रहना और सेवाभाव होना ज़रूरी है । आत्मज्ञान, शरीर शुद्धि, आचरण शुद्धि, वाणी शुद्धि, विचार शुद्धि, सम्वन्ध शुद्धि, बुद्धि शुद्धि और चेतना शुद्धि आदि सन्यास का पूर्वशर्त हैं । व्यक्ति दुःख और बन्धन में है, वो कुछ कर नहीं सकता, विवश है, तथापि ज्ञान और साधनाद्वारा आग में सोनेके समान तपकर और शुद्ध होकर निकलता है ।


सन्यास का मूल मर्म बन्धनों से मुक्ति है । स्वयं मुक्त होकर समाज में उदाहरण प्रश्तुत करना है, मुक्तिका संवाहक बनना है । ज्ञान का प्रकाश फैलाना है । सांसारिक आसक्तिको त्यागकर आध्यात्मिक प्रगति सुख शान्ति और आनन्द के लिए जीवन समर्पित कर देना है । कठिन परिस्थिति में भी आवश्यक गुणों का विकास करके सभी सांसारिक ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए जो सृष्टि का सहायक एवं मोक्षका संवाहक बन सकता है वही सच्चा सन्न्यासी है; वही सफलता और मुक्तिका हकदार है ।


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