साक्षीभाव
सभी अनुभव का दृष्टा मैं हूँ ये साक्षीभाव है, आत्मज्ञान और अनुभवकर्ता के ज्ञान के साथ चेतना में स्थिर रहना है । साक्षीभाव अनुभव नहीं एक सूक्ष्म वृत्ति है, चित्त की एक योग्यता है, उन्नत चित्त वृत्ति है जो आता जाता है । चेतना स्वयं प्रकाशित अनुभवकर्ता का छाया है । जब ध्यान में अनुभवकर्ता का ज्ञान सम्मिलित होता है वो चेतना होता है । ये प्रयोगिक विषय है । अनुभवकर्ता का सीधा ज्ञान संभव नहीं, जब तक चित्त में प्रतिबिम्बित नहीं होता तब तक अनुभवकर्ताका ज्ञान नहीं होता । “जो भी अनुभव हो रहा है उसका अनुभव करने वाला भी है” ये ज्ञान स्मृति में जब जाता है तब चेतना बनता है । अनुभवकर्ता और चित्त/अनुभव के बीच का मिलन बिन्दु चेतना है । साक्षीभावको स्थाई करने के लिए लगातार साधना आवश्यक है । साधना सरल और प्राकृतिक होना चाहिए । आत्मज्ञान के स्मरण से ही साक्षीभाव आ जाना चाहिए ।
चेतना में अनुभवकर्ता का होना अनिवार्य है । कर्ता का नाश होता है, केवल कर्म के साक्षी का भाव रहता है । अनुभवकर्ता साक्षीभाव का भी साक्षी है । साक्षीभाव में वो साधक रहता है जिसको आत्मज्ञान हो । जो लोग अनुभव पर ही ध्यान दे रहें हैं, वो सांसारिक लोग हैं, जो अनुभवकर्ता मे बिलीन है, वो निर्वाण प्राप्त है, जीवन मुक्त है, जो बीच में है,वो सहज समाधि/प्राकृतिक समाधि में हैं ।
साक्षीभाव का मुख्य प्रयोजन आत्मज्ञान में स्थित रहना, अनावश्यक और पुरानी ग़लत वृत्तियों को नियन्त्रण करना, मुक्ति के मार्ग में आगे बढ़ना है । जो आत्मज्ञान और चेतनाका उद्भव हुवा है उसको बनाए रखने के लिए, चित्त शुद्धि, सिद्धि और ज्ञानके लिए, सभी अवस्था में अपना सत्य खोजने के लिए साक्षीभाव उपयोगी है ।
चेतना चित्त की अवस्था है, शुरू में बहुत नाजुक होती है, बार बार गिर जाती है । चेतना को साधना पड़ता है, जो भी आवश्यक हो वही होता है, गलत कार्य नहीं होता । चेतना ने अनियंत्रित भीड़ को नियंत्रण करती है । सब चित्तवृत्ति और परतें शांत और अनुशासित हो जाते है, जो आवश्यक हो उतना ही करते हैं, चेतना में वो बल है । चेतना प्रयास करके होनेवाली चीज नहीं है, दृढ संकल्प होना चाहिए बस चेतना प्राकृतिक रुपसे अपने आप स्थिर हो जाता है । इसके लिए कुछ स्वभाविक उपाय इस प्रकार है-
चित्त वृत्ति, अहम, चेतना, साक्षीभाव, और अनुभवकर्ता के भेद पहिचान करना चाहिए । अनुभव और अनुभवकर्ता को जानने के लिए दृश्य द्रष्टा भेद जानना आवश्यक है ।
बार बार स्मरण, ध्यान वस्तु का उपयोग और ध्यान में चेतना को समावेश करना चाहिए । ज्ञान की शुरुआत ध्यान से होती है । ध्यान में चेतना का लाना आवश्यक है । जब ध्यान में चेतना मिला देते हैं तो ध्यान तरल हो जाता है, बहने लगता है । उसमें अन्य अनुभव समावेश होने लगते हैं । चित्त शांत होने लगता है । अनुभव बंद नहीं होते, ध्यान फैल जाता है ।
समर्पण आवश्यक है । जो बुद्धि के सीमा में हो उसको होस पूर्ण होकर पालन करना एवं बुद्धि के बाहर जो है उसको अज्ञेय समझ कर अस्तित्व पर छोड़ देना पड़ता है ।
कर्म पर चेतना के प्रकाश आवश्यक है । चेतना आने के बाद वृत्तियाँ नष्ट नहीं होते, नियंत्रित होते हैं । चेतना का कार्य कर्मों को प्रकाशित करना है। चेतना में कर्मों पर अहं भावना नहीं होता है । कर्म सही और प्राकृतिक रूप से होते हैं । अनावश्यक कर्म नहीं होंगे, और जो भी होगा आनंद और शांति के पृष्ठभूमि में होगा । विते हुए कर्मो पर चेतना के प्रकाश और साधना मे निरन्तरता देना चाहिए । चित्त में समय नहीं है । जो अंधकार में हुआ है उस पर प्रकाश डाल दें तो, वो संस्कारों के बीज उस प्रकाश में नष्ट हो जाएंगे, जल जाएंगे । संस्कारों से जो आवेग, भावनाएँ, ग्लानी उठते हैं वो शिथिल हो जायेंगे । जितना पुराना संस्कार होगा उसको जलाने में उतना समय लग सकता है ।
बुद्धिको सरल, सीधा और, तेज करना ज़रूरी है । परिष्कृत बुद्धि के बाद चेतना आती हैं । ये एक प्रकार की बुद्धि है, जो ज्ञान होने के बाद प्रकट होती है । बुद्धि से ऊपर की परत है । चेतना स्थिर नहीं है, आती जाती है, चेतना की परत कहीं नहीं जाती, वहीं रहती है, चेतना आता जाता है । जितनी मन्द बुद्धि और अशुद्धियां होंगी, उतने समय लग जाएगा और बुद्धि जितनी शुद्ध और तेज होता है उतनी ही जल्दी होता है ।
ध्यान मे क्रम बद्धता होनी चाहिए । आस पास के वातावरण पर चेतना युक्त ध्यान, आस पास के व्यक्ति और उनके व्यवहार पर चेतना युक्त ध्यान, अपने शरीर पर चेतनायुक्त ध्यान, सभी परतों के ऊपर चेतना युक्त ध्यान होनी चाहिए । संवेदना, भावना, विचार बुद्धि, चित्त, चेतना, अहम् कारण शरीर आदि हर परत पर क्या चल रहा है उस पर सचेत होना चाहिए । ध्यान को साध लेना साक्षीभाव के लिए जरुरी है ।
ज्ञान के लिए ध्यान और अज्ञानका दिशा बदलनी है; तब अज्ञान ज्ञान में बदल जाता है और यही साक्षीभाव है । ध्यान इंद्रियों से हटाकर जो इंद्रियों के स्वामी हैं, जो इंद्रियों को जानता है उसकी तरफ ले जाना है । सभी अनुभव अनुभवकर्ताद्वारा ही प्रकाशित है, इसीलिए वो दिखाई नहीं देता ।
चरणबद्ध रुपमे विभिन्न अवस्थाओं में साक्षीभाव का प्रयोग करना चाहिए । जागृति, स्वप्नावस्था और सूक्ष्म तीनों ही अवस्था में चेतना में रहना है । जागृत अवस्था से शुरू करना है । धीरे धीरे संपूर्ण चेतना आ जाएगी । उसके बाद ही चेतना स्वप्नावस्था में दिखेगी, और वही चेतना सूक्ष्म अवस्था में दिखेगी । संपूर्ण जीवन चेतना युक्त हो जाएगा । साक्षीभाव अलग-अलग अवस्थाओं में अलग-अलग नहीं मिलेगा, क्यूँकि ये एक ही है, साक्षी एक ही है । अवस्थाएं बदलती है । यदि चेतना जागृत हो गयी तो बुद्धि को भी जागृत कर के अवस्था पर नियंत्रण आ जाता है ।
साक्षीभाव प्रयोगिक विषय है । निदिध्यासन और साधना के क्रम में अशुद्धि और अज्ञान का कारण विघ्न आ सकते हैं, हानी होता है । चेतना के अभाव मे सारी अशुद्धियाँ व्यक्ति मे आ जाते है । जो भी बचपन से था उसके उपर ये बाहर से जो आया है उसको चित्त ने स्विकार नही करता है । इसलिए जीवका विकास रुक जाता है, और विनास होने लगता है, पतन होने लगता है । व्यक्ति व्यभिचारी, अत्याचारी, दुखि, भयभित और हिंसक हो जाता है । इसका प्रभाव व्यक्ति स्वयं और घर समाज को भी पड़ता है । त्रुटीपूर्ण और मनमानी साधना से शारीरिक विमारी, असक्तता भी आ सकते है और मानसिक विचलन भी हो सकता है । इसिलिए आत्मज्ञान होने के वाद गुरु के निर्देशानुसार प्रयोग करना चाहिए ।
विना प्रयास के स्वभाविक साधना उचित है, अति नहीं करना है । साधक के योग्यता के अनुसार चेतना सध जाती है । कुछ विचित्र या चमत्कार के रुपमे नही लेना है । पुरानी साधना मिश्रण नहीं करना, मनगढ़ंत साधना नहीं करना, श्रवण मनन और निद्धिध्यासन में रहना, अहम् और अन्य वृत्ति पर नियन्त्रण सरल और स्वभाविक जीवन शैली अवलम्वन करना, अशुद्धिओंको पहिचान करना जरुरी है । डर, अनिच्छा, दुर्बल संकल्प, अशुद्धियां, समाज आदि जल्दी प्रगति ना होने का कारण है । अशुद्धि के कारण अवनति होती है ।
चित्त के ज्ञान का आध्यात्मिक प्रयोग महत्वपूर्ण है । अज्ञान हटाने के लिए, चित्त पर नियंत्रण कर के सांसारिक पीड़ा, दुख, कष्ट कम करने के लिए, बुद्धि तेज करने के लिए, शान्ति आनन्द स्थिरता के लिए, सही आचरण के लिए, वासना पूर्ति करने के लिए, मनोविकार और व्यसन हटाने के लिए, शारीरिक स्वास्थ्य तंदुरुस्तता शुद्धिकरण सांन्सारिक और आध्यात्मिक गतिविधियों पर नियन्त्रण और सन्तुलन रखने के लिए भी प्रयोग किया जा सकता है । श्रावण, मनन, निदिध्यासन ज्ञान प्राप्त करने विधि हैं । अनावश्यक इच्छा पर नियंत्रण कर के कर्म और कर्मफल को नियंत्रण किया जा सकता है । उपरी परतोंका ज्ञान, वासना पूर्ति, ज्ञान प्रसार, ज्ञान लाभ आदि साक्षी भाव और चेतना के प्रयोग के लाभ है ।
हर स्थिति में संपूर्ण रूप से सचेत होना तुरिया अवस्था है । चेतना की शुद्धि आत्मज्ञान से होता हैं । चेतना शुद्धिकरण से अन्य शुद्धिकरण भी साथ साथ हुआ जा सकता है । चेतना शुद्धि हो गयी तो निचले परत अपने आप शुद्ध हो जाते हैं । जो भी परिस्थिति में कर्म होते हैं वो चेतना के प्रकाश में होना ही शुद्धिकरण है । साक्षीभाव में रहने के लिए आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान और मायाज्ञान के विषय में श्रावण, मनन और सत्यापन अच्छे से होनी चाहिए । साक्षीभाव और ध्यान की समझ, परतों का समझ वृत्ति और अवस्थाओं का समझ साक्षी भावके लिए अति आवश्यक है ।
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