तुरीय

तुरीय


तुरीय चित्त कि एक ऐसी अवस्था है जो स्वयं ब्रम्हका मूल स्वभाव है, अवस्थाओं से परेका अवस्था है । इसको समाधि, अनुभवक्रिया आदि नाम से भी जाना जाता है । तुरीयको अवस्था कहना भी गलत होता है; क्यूाकि ये कोई अवस्था नहीं है, नित्य भाव है; फिर भी व्यक्त करने के लिए शब्दका प्रयोग करना पडता है । इसीलिए जागृति, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों अवस्था से परे का चौथा अवस्था कहा गया है ।

 


तुरीय मूल अवस्था है जो शाश्वत है । अज्ञान के कारण जीव ने ये अवस्थाको भुलाकर मायाजाल में अटक गया है । उस जाल से निकलने के लिए जाग जाना ज़रूरी है । जागनेके लिए अज्ञानका नाश करना और अज्ञान नाश करने के लिए चेतना में स्थित रहना आवश्यक है । 


ये अवस्था पहले से है और हमेशा है । नित्य और सत्य यही है । केवल अज्ञान का बादल ने ढक लिया है । जब आत्मज्ञान होता है तब से स्वयं का सत्य स्वरुपमें सब अनुभवों का द्रष्टा बनके रहा जा सकता है । जब जीवमें तत्व का चेतना रहता है, तब वो यही समाधि अवस्था में होता है । जब चेतना चला जाता है, तब जीव को इस अवस्था विस्मृत होती है, अवस्था कहीं नही जाता, क्यूँकि ये अवस्था हमेशा से है । ये अवस्था समय के बन्धन में नहीं है । जो हमे क्षणिक प्रतीत होता है, वो हमारी चेतना के कारण है । चेतना हमेशा नहीं रहती, थोड़ी देर आकर चली जाती है । जो साधक हमेशा चेतना में रहते हैं, वो यही अवस्था में रहते हैं । 


तुरीय अवस्था में स्थित होने का कोई प्रक्रिया नहीं है, क्यूँकि ये परम अवस्था है, जो पहले से है । कोई ध्यान, साधना, स्पर्श, योग, जादु-टोना, शाब्दिक ज्ञान आदि किसी भी प्रयास से ये अवस्था में आया नहीं जा सकता । जो पहले से पूर्ण है, उसमें कैसे आया जाए ? बना नहीं जा सकता, जाना भी नहीं जा सकता, केवल “ मैं इस अवस्था में नहीं हूँ” ये मान्यता को हटाना चाहिए । ये अवस्था होना मात्र है, जैसा है वैसा ही है । ये अवस्था में कोई भी मिलावट नहीं है । शुद्ध और शास्वत है, क्यूँकि ये अनुभवकर्ता यानि अस्तित्वका मूल स्वरुप है । अज्ञान को कैसे हटाया जाए ये सम्भव है । जब नेति नेति विधि के द्वारा “मैं क्या नहीं हूँ” ये जाना जाता है, तब मेरा मूल स्वरुप यानि कि तत्व का पता चलता है । इसी अवस्थामें स्थित होना तुरीय  यानि समाधि है ।


तुरीय अस्तित्वका अवस्था है, इसीलिए हर अनुभव का अवस्था यही है । ये अनुभवकर्ता और अनुभवका विलीनता का अवस्था है, योग है, अद्वैत अवस्था यही है । इस अवस्था को पाने के लिए कहीं जाना नहीं पडता । कहीं आकाश, गुफा या एकान्त में ही ये अवस्था नहीं है । समाधि अवस्था यहीं है, हर स्थान हर अनुभवमें है, इसीको हम अनुभवक्रिया भी कहतें हैं ।


तुरीय अवस्था स्वयं में सम्पूर्ण है । इस अवस्था का कोई खण्ड या विभाजन नहीं है । मोटा और पतला नहीं है । सतही और गाढ़ा भी नहीं है । हम जैसे नये साधक को ये क्षणिक प्रतीत होता है । सतही और पतला सा प्रतीत होता है, क्यूँकि हम में अज्ञान पूरी तरह से नहीं छुटा है, चेतना स्थापित नहीं हुईं है । इसीलिए इस अवस्था में रह नहीं पाते । कोई जीव इस अवस्था में न रहने से ये अवस्था कम नहीं हो जाता है ।


तुरीय अवस्था सभी अनुभव के लिए समान है । किसी के लिए कम या अधिक नहीं है । जो भी अज्ञान नाश करके स्वयंमें स्थित हो पाता है, वहीं इस अवस्था का लाभ उठा सकता है । योगी, ज्ञानी, ऋषिमुनी आदि जिसने तत्व को जानकर चेतनाको साध लिये हैं वो जब चाहे तब इस अवस्था में रह सकते हैं । एक ज्ञानमार्गी जिसने आत्मज्ञान प्राप्त कर के चेतना का प्रयोग कर रहा है वो भी यदि हमेशा अपना तत्व स्वरुप में स्थित हो कर चेताना को साध लिया तो ये परम अवस्था  पा सकता है । दृश्य द्रष्टा विवेक से द्वैत को जानकर द्वैत का मूल यानि कि तत्व जो एक है वही अवस्था में रहा जा सकता है । यही अद्वैतावस्था तुरीय है । जिसने इस अवस्था को पा लिया उसने सर्वस्व पा लिया पाने के लिए और कुछ बाक़ी नहीं होता । इस अवस्था पूर्ण भी है और शुन्य भी है । दुःख-सुख, लाभ-हानी, नैतिक-अनैतिक आदि सभी भाव भी है, और अभाव भी है लेकिन जो भी है केवल आनन्द है ।

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