मेरा प्रारब्ध

 मेरा प्रारब्ध

मेरा जन्म क्यूँ हुआा है ? जीवनका उद्देश्य क्या है ? क्या करने से मुझे अन्तरमन से खुशी, शान्ति, सन्तुष्टि और आनन्द मिलता है ? जीवन में सब से जरुरी कर्म क्या है जो करे बिना मुझे कोई भी दृष्टिकोण से छुटकारे ना मिले वही मेरा प्रारब्ध है । जो कार्य दूसरों के, घर परिवार, आफन्त के इच्छा से नहीं आया है, किसी वाध्यता बस न किया हो वही मेरा प्रारब्ध है । मेरा प्रारब्ध मेरा ही कर्म से संचित और निर्धारित होता है । इसीलिए इसको किए बिना मुझे चैन नहीं मिलता, क्यूँकि उसका अभिनय तो पहले से ही हो चुका होता है, अब तो केवल मंचन हो रहा है । इस जन्म में करने के लिए निर्धारित कर्म, इच्छा, वासना आदि का पूर्वयोजना ही मेरा प्रारब्ध है ।


कर्ता तो मैं हूँ नहीं, सब आपने आप हो रहा है, लेकिन जो होता है, उसमें चेतना के प्रकाश जरुर डालना चाहिए । जो कार्य चेतना के प्रकाश में होतें है, वो कार्य स्वत: नियन्त्रित होतें है, अनैतिक कार्य नहीं होता । पूर्वजन्म के मेरा कर्म ही प्रारब्ध बनकर मेरा इस जीवन का दिशा निर्धारण करता है । पूर्वजन्म में मेरे माध्याम से हुए कर्म कितना चेतना में हुआ था कितना नैतिक हुआ उसी का कर्मफल आज मुझे मिल रहा है । इस जन्म का मेरा कर्म ही आगे के लिए प्रारब्ध बनेगा, पुनर्जन्म या मुक्ति के लिए कारण बनेगा । मेरा इस जीवन अब के मेरे इच्छा से नहीं चलता, लेकिन पूनर्जन्म वा मुक्ति के लिए यही कर्म और इच्छा संचित होकर संस्कार बनेगा । इसीको ध्यान में रखते हुए इस जन्म के कर्म द्वारा अगले जन्मका प्रारब्ध निर्धारण करना चाहिए । मेरा प्रारब्ध क्या है ? ये जानने के लिए ये कुछ विचार उपयोगी होंगें-

  • जो मेरा अन्तरमन से आता है, जो मेरा ही स्वप्रेरणा से आया है, जिसको छोडने के लिए मैं जो भी करुँ असम्भव है ।

  • जो कर्म अपने आप होता है, यहाँ तक कि स्वयं के इच्छा और अनिच्छा से भी नहीं ।

  • जिसको करने में मुझे थकान, दुख, झन्झट आदि महसूस नहीं होता बल्कि सुख, सन्तुष्टि और आनन्द मिलता है ।

  • जिसका परिणाम सुखद या दुखद जो भी हो वो स्वयंको भुगतना पडता है, दूसरों से बाँटा नहीं जा सकता ।

  • जो कर्म करने के लिए मन बार बार खिंचे चले आता है, और रोकना असम्भव होता है ।


अज्ञानी सांसारिकता में ही लिप्त होना चाहता है । जैसे भी हो वो सुख, सयल, भोग विलास करना चाहता है । उसको प्रारब्धका कोई चेतना या मतलब नहीं होता । भौतिक साधन, खानापिना और होडबाजी में ही जीवन गुजार देता है । अल्पज्ञानी प्रारब्ध अच्छा बनाने के लिए प्रयास करना चाहता है । क्या करुँ ? किस मार्ग में कर्म के अच्छे फल मिलेंगें ? किस का पूजा प्रार्थना करना होगा ? किसका सेवा सुश्रुषा करना होगा ? इत्यादि विचार में भ्रमित हो जाता है । प्रारब्ध प्रयास करने से होनेवाला विषय नहीं है । जो अवश्यम्भावी है, उसके लिए कोई प्रयास नहीं लगता, प्रारब्ध यही है । 


मेरा आगामी प्रारब्ध शुद्ध, सही और अच्छा बनाने के लिए मुझे इस जन्म में क्या करना होगा ? कैसे इच्छा, वासना और कर्म उचित होंगें इसके लिए कुछ ये विचार सहायक बनेंगें-

  • जो कर्म अपने और दूसरों के मुक्ति के लिए किया गया हो ।

  • जो कर्म करने के लिए मुझे स्वच्छन्दता और स्वतन्त्रता हो ।

  • जो कर्म मेरे मार्गदर्शक गुरु और आध्यात्मिक परिवार के साथ आध्यात्मिक उद्देश्य से किया गया हो और सामुहिक आध्यात्मिक लाभ मिले ।

  • जो कर्म नैतिक और अच्छी इच्छा से प्रेरित हुआ हो । अनैतिक और बुरा न हो ।

  • जो दूसरों से थोपा हुआ न हो और दूसरों का निहित स्वार्थ के लिए न हो ।

  • जो कर्म सांसारिक कर्म बन्धन बनाने वाले न हो । 


जो कर्म अज्ञान में होतें है उनको ज्ञान के प्रकाश से आलोकित करना आवश्यक है । इतना ही करने से अनैतिक कर्म नहीं होंगें, अरुचि के कर्म नहीं होंगें । मजबूरी में कर्म करना नहीं पडता । किसी से निर्भर होना नहीं पडता, जीवन में स्वतन्त्रता होता है । दूसरों के लिए आहूति देना, कष्ट उठाना नहीं पडता । सांसारिकता में धकेलनेवाला कर्म करने में विवश होना नहीं पडता । सभी कार्य चेतना में करना, सांसारिक बन्धन सृजना होने वाले कर्म नहीं करना, जो अति आवश्यक है वही करना, आसक्ति त्याग देना और स्विकार भाव में रहना, अनावश्यक कर्मों के प्रति विरक्तिका भाव होना जरुरी है । इससे बुरे संस्कार नहीं पड़ेगा, कर्म अच्छा होगा और प्रारब्ध सुगम होगा ।


जहा‌तक मेरा व्यक्तिगत प्रारब्ध का बात है तो मेरा प्रारब्ध भी सायद मुझे समझ में आया है । लक्ष्य क्या है इसके पिछे भागना नहीं पडता । क्या करना है इसमें द्विविधा नहीं होता । बेचैनी नहीं है, ये करुँ ? वा वो करुँ ? इसमे भ्रमित होना नहीं पडता । जो अपूर्ण था वो पूरा हो गया जो उद्देश्य है वो अपने आप आगे बढ रहा है । जो करना है वही है । थोपा हुआ नहीं है, मै इसको त्याग नहीं सकती, इसीमें खुशी और आनन्द है । अब मेरा अधूरा खोज बाक़ी नहीं है, जो खोज था वो मिला । जो भी होगा अच्छा ही होगा । मेरा इच्छा और कर्म नहीं है, जिसका है वो पूर्ण करेगा । पूर्ण रुपसे समर्पित कर दिया है, इसीलिए निश्चिन्त हूँ । क्यूँकि मेरा लक्ष्य, मार्ग, गुरु और कर्म मिल गया है . मार्गदर्शन मिल गया है, अच्छा प्रारब्ध और आनन्द के लिए यही तो सबको आवश्यक है ।


प्रारब्ध पूरा कर के ही इस जन्म छुट जाएगा । अगला प्रारब्ध जैसा होगा वैसे जन्म और कर्मफल भुगतना पड़ता है लेकिन आत्मज्ञान के द्वारा संचित कर्म नष्ट भी किया जा सकता है । दिशा बदला जा सकता है, आध्यात्मिक परिवार बीच बाँटा भी जा सकता है । प्रारब्ध कर्म कारण शरीरके स्मृति क्षेत्रमें संचित होता है । वहीं से जिस प्रकार का फल मिलना हो, वही अनुरुप का जीव के रुपमें जन्म लेना और प्रारब्ध भोगना पडता है । यदि जन्म अन्य जीव के रुपमें हुआ तो अच्छा, बुरा, नैतिक, अनैतिक आदिका चेत नही रहता । ज्ञान और मुक्ति के लिए कार्य नहीं होंगें, इसीलिए मनुष्य जन्म ही अच्छा प्रारब्ध के लिए उपयोगी है, या ये कहना उचित होगा कि आगे का सुन्दर प्रारब्ध के लिए ही मनुष्य जीवन मिला है । मेरा आगामी प्रारब्ध मुक्ति के लिए होना चाहिए । 





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