मृत्यु
सृष्टि में जो अनुभव रचना या शरीर के रुपमें जन्म लेते हैं उन सभी का एक रुप से दूसरे रुपमें रुपान्तरण होना, शरीर का सम्पूर्ण रुपसे नष्ट होना, जीवन समाप्त होना मृत्यु हैं । मृत्यु शब्द मिट्टी से आया है । जो मिट्टी से रचना बनती है, वो मिट्टी में ही विलीन होती है । केवल शरीरधारी जीव ही नहीं सभी अनुभव क्रमशः परिवर्तन होते होते लुप्त हो जाते हैं । नादका चक्रीय परिवर्तनके कारण उठनेवाले तरङ्ग में चलनेवाले वृत्ति और प्रक्रिया का परिणाम ही जीव वस्तु या अनुभवका रचना होता है । जो सृजन और सृष्टि के लिए लाभदायक होते हैं, और विकास के अग्र गति में बढते हैं, उनको रचना माना जाता है । जो लाभदायक नहीं है उनको विनाश या मृत्यु माना जाता है ।
सारे अनुभव का आधार नाद है, और नाद में चक्रीय परिवर्तन है । यही नियम के कारण जो सृजन होता है, वो परिवर्तित हो कर सम्पूर्ण रुपमें विनाश यानि कि मृत होता है । जिसका जन्म होता है, उसका मृत्यु अवश्यंभावी है । जन्म-मृत्यु देखने के लिए साक्षी का होना अनिवार्य है । साक्षी नित्य-निरन्तर है उसका कभी जन्म नहीं होता । जिसका जन्म नहीं हुआ; उसका मृत्यु का प्रश्न ही नहीं उठता । अनुभवकर्ता अमर है और सारे नाशवान अनुभव का द्रष्टा है ।
परिवर्तन के क्रम में एक जीव में जो इच्छाएँ, वासनाएँ और कर्म होते हैं, उसकें आधारमें संस्कार पड़ता है और उसी का कर्मफल अनुरुप दूसरा जन्म होता है । जब तक कर्मबन्धन पूर्ण नहीं होता तब तक आवागमन का चक्र चल्ता रहता है । जब कर्मबन्धन समाप्त होता है तब ही वो जीव सम्पूर्ण रुपसे ब्रम्ह में विलिन हो जाता है । ये प्राकृतिक नियम है ।
कोई जीव का दुर्घटना, रोग व्याधी, संक्रमण आदि के कारण भी मृत्यु होता है । इसको अकाल मृत्यु कहतें है । भक्षण वृत्ति भी मृत्युका कारण है । सबल जीव दुर्वल को अपना भोजन बनाता है । परिवर्तन के कारण एक रचना के विनाश होने के बाद दूसरा रुप या सुक्ष्म रुप लेता है, या कारण शरीर में विलिन होता है । सूक्ष्म अनुभव में परिवर्तन धीरे होता है और स्थूल अनुभव में परिवर्तन शीघ्र होता है । इसीलिए स्थूल शरीर जल्दी नष्ट होता है, सुक्ष्म शरीर धीरे नष्ट होता है । धिरे परिवर्तन के कारण सुक्ष्म अनुभवका मृत्यु मृत्यु जैसा नहीं लगता । अन्त्य में तो कारण शरीर भी नष्ट होता है ।
जिस प्रकार शरीर चित्त के एक परत है और वो नष्ट होता है, उसी प्रकार चित्त के सम्पूर्ण परतें कभी न कभी नष्ट होते ही हैं । जो भी परिवर्तनशील है उन सभी का मृत्यु निश्चित है । परिवर्तन होना ही मृत्यु है, क्यूँकि परिवर्तन में पहला रुप नहीं मिलता । जो अर्धस्थाई रचना है, वो धिरे परिवर्तन होने के कारण स्थायी प्रतित होते है, लेकिन जरा सा परिवर्तन पूरा परिवर्तन का प्रमाण है । शरीर और सभी रचना का संगठन, विघटन होता रहता है । जगत भी नाशवान है । केवल स्थूल शरीर ही नहीं सभी सुक्ष्म से सुक्ष्म अनुभव चित्त के परतें, उर्जा आदि सभी नष्ट होतें है । केवल द्रष्टा यानि कि अनुभवकर्ता स्थायी है, अजर-अमर है, बाक़ी सब परिवर्तनशील है, नाशवान है । अनुभवकर्ता के पटल पर उभरते गिरते हैं । अस्तित्व नित्य है और यही सत्य है । जन्म मृत्यु केवल परिवर्तन है, मिथ्या है ।
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