मौन

 मौन

मन में कोई तर्क वितर्क सोच विचार भावना नहीं चलाकर शांति और आनंद भाव में रहना ही मौन है । मौन के अवस्था में भावना और बुद्धि के परत में जो भी अनावश्यक विचार, धारणा, इच्छा वासना, कामना आदि है, वो शान्त रहते हैं । केवल चेतना रहता है, क्यूँकि वही आवश्यक है । इस अवस्था में साधक केवल द्रष्टा के भाव में, साक्षी भाव में रह जाता है, जो आवश्यक है वो आपने आप होता है ।


जब मनुष्य सांसारिकता में फँसता जाता है, तब संसार में जो भी देखता है, उन सभी चीज़ों को भोगना चाहता है । मन में आसक्ति भर लेता है, अनावश्यक लोभ लालच में फँस जाता है । मोह पास में पड़ जाता है । मानसिक अशान्ति बढ जाता है, ये सब मुक्ति के नहीं गिरने के लक्षण है । 


ऋषि मुनि और ज्ञानी जनों ने मनुष्य की मुक्ति के लिए, सांसारिक दुख से निकलने के जन्मों जन्म दुःख के कीचड़ में गिरने से बचाने के लिए विभिन्न खोज किया है । प्राचीन युगों में मौन साधना के लिए ऋषि मुनि जन घर संसार छोड़ कर वानप्रस्थ में जंगल, गुफा और शांत जगह में जाते थे । साधना के प्रभाव से उन्होंने ज्ञान और मुक्ति के बड़े बड़े सूत्र और उपाय पत्ता लगाया है । इन्हीं उपायों और सूत्रों को वेदों पुराणों आदि में आवद्ध करके मनुष्य के प्रगति और मुक्ति के लिए वरदान स्वरूप छोड़ के गए हैं । 


वर्तमान सद्गुरु एवं ज्ञानी जनों ने संसार से अज्ञान को हटाकर आत्मज्ञान, मायाज्ञान और ब्रह्मज्ञान देने के लिए विभिन्न प्रयास किए हैं । मौन साधना शांति और आनंद में रहने का सर्वोत्तम उपाय  जानकर उपयोग किये हैं, और साधकों को भी मौन के आनंद सागर में स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं ।


मौन साधना का कुछ प्रयोजन ‍और आध्यात्मिक एवं सांसारिक लाभ हैं, जैसे किः

  • आत्म ज्ञान में स्थित रहना और आध्यात्मिक प्रगति कर के मुक्ति, शांति,  आनन्द जैसे उपलब्धि हासिल करना ।

  • अनावश्यक तनाव और सोच, विचार से दूर रहकर शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वास्थ रहना ।

  • जो भी कार्य हो रहे हैं, उन पर ध्यान केंद्रित कर के सरलता ‍और प्रभावकारिता से सम्पन्न करना ।

  • पारिवारिक और सामाजिक संबंध सुमधुर बनाना, आदि आदि ।


ज्ञान होने के बाद बुद्धि और भावना के नहीं चेतना के प्रयोग आवश्यक है, जो मौन साधना द्वारा ही संभव है । चाहे एक ही विचार या भावना ही क्यों न हो, मन को अशांत करने के लिए काफ़ी होता है । चेतना के प्रकाश में मन के सारे चंचलता शान्त हो जाते हैं । इसलिए चेतना में रहना ही मौन साधना के सर्वोत्तम उपाय है । 


मौनता के लिए सबसे बड़ा गुण शान्त स्वभाव और आदत है, जो प्रायः जन्म सिद्ध होता है, लेकिन ज्ञान और संकल्प द्वारा विकसित और सुधार भी किया जा सकता है । इसके लिए नय साधकों ने चरणबद्ध अभ्यास करना उचित होता है । साधना के लिए साधक में ज्ञान और अभ्यास के कुछ पूर्वाधार होना चाहिए । जैसे किः

  • अज्ञान को हटाकर ज्ञान में स्थित रहना,

  • सांसारिक मोहमाया, आसक्ति से दूर रहना,

  • त्याग, विरक्ति और स्वीकार भाव में रहना,

  • सभी उपभोग्य वस्तुओं में अति का वर्जन और और न्यूनतावादी होनाः जैसे खानपान, कपड़े, व्यवहार, संबंध, भौतिक वस्तुएँ, क्रिया कलाप, वाणी, संचार, यहाँ तक कि स्वास भी धीरे करना उपयुक्त होता है ।

  • ध्यान की साधनाः वृत्तियाँ चलना स्वाभाविक है, इनके बिना तो जीवन ही संभव नहीं, लेकिन मनमाने ढंग से चल ने नहीं देना है । नियंत्रित होना चाहिए, जो अति आवश्यक है, उतना ही चलने देना है । इसके लिए स्थूल अनुभव, शारीरिक संवेदना, भावना, विचार, इच्छा, स्मृति आदि को साक्षी भाव में ध्यान से देख लेना और साध लेना पड़ता है । जब ध्यान सध जाता है, तब वृत्तियाँ नियंत्रित होते हैं, मन शांत रहता है ।

  • चेतना में रहना: सभी शारीरिक, मानसिक अनुभवों को साक्षी भाव में, केवल द्रष्टा होकर देखना है, इन अनुभवों के ऊपर कोई विचार नहीं चलाना है, केवल सजगता मात्र आवश्यक है, मौनता अपने आप ही घट जाता है । चाहे जितने भी भीड़ भाड़ में और शोरगुल में हो, मन आपने आप शांत रहता है ।


सामान्य अवस्था में मौन साधना के लिए एकांत स्थान उपयुक्त होता है । एकान्त कमरा, जंगल, उद्यान, नदी तालाब के किनारे, गुफा आदि में मौन साधना सरल और अधिक फलदायक होता है । परन्तु आम साधक के लिए यदि ये सम्भव नहीं हुआ तो जहां कहीं भी मौन साधना किया जा सकता है । यदि मन शांत और एकाग्र चित्त हो तो शोरगुल में भी कुछ सुनाई नहीं देता और कर्म में भी मौनता और शांति दिखाई देता है ।


मौनता सभी शारीरिक, मानसिक गतिविधियों को रोक कर निष्क्रिय होना नहीं है । मौनता में कोई कार्य वा वाणी रोकने और चलाने के सवाल में उलझा भी नहीं है, जो आवश्यक है, वो स्वयं ही होता है, कुछ करना नहीं पड़ता, जो अनावश्यक है वो नियंत्रित होता है । मौन साधना के लिए कोई निश्चित समय नहीं है । हर पल मौन में रहे सकते हैं । यदि मौन सही हो तो जो भी वाणी निकलता है, जो कर्म होता है वो मौनता में रहकर भी किया जा सकता है, बाधा नहीं पड़ता, बल्कि और अधिक ध्यान पूर्वक किया जा सकता है । मौनता बढ़ने में मददगार साबित हो सकता है, लेकिन वो कर्म आध्यात्मिक प्रगति, ज्ञान, सेवा और उत्तरजीवीता के लिए अत्यावश्यक होना चाहिए, अपना प्रारब्ध पूरी करने के लिए होने चाहिए, और रुचिकर होने चाहिए । जब तक मनका उछलकुद बन्द नहीं होता तब तक ज्ञान स्थिर नही हो सकता, आध्यात्मिक प्रगति नहीं हो सकता । मौनता बढ़ाने और चेतना स्थापित करने के लिए अनावश्यक कर्म विलकुल भी नहीं करना चाहिए । कर्मफल आने वाले कर्म भी नहीं करना चाहिए । विलासी और बेकार के सांसारिक गतिविधियों से दूर ही रहना चाहिए । समर्पण, निष्ठा और संकल्प शक्तिशाली होनी चाहिए ।


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