बोधिसत्ववृत्ति
जिस व्यक्ति में बोध यानि कि ज्ञानार्जन का उत्कट अभिलाषा हो और उस ज्ञान को दूसरों के भलाई के लिए प्रकाशित या प्रसारित करने का पवित्र उद्देश्य हो ऐसा स्वभाव को बोधिसत्ववृत्ति कहते हैं । जिसमें भरपूर और स्थापित ज्ञान हो, सिद्धियाँ हो, बुद्धत्व हो वो बोधिसत्व है, बोधिसत्ववृत्ति उस तरफ के यात्रा के लिए आवश्यक पूर्वावस्था है; जहाँ जिज्ञासा समाधानका प्रबल इच्छा होता है और ज्ञानार्जन के प्रक्रियाएँ चलते हैं । ये वृत्ति और प्रक्रिया व्यक्ति को चुप बैठने नहीं देता; ज्ञान के खोज और प्रसार के लिए प्रेरित करता है ।
अज्ञान को हटाने के लिए बोधिसत्ववृत्ति आवश्यक है । क्यूँकि माया को लीला ही पसन्द है, अज्ञान में ही माया का खेल बिना अवरोध के चलता है । माया का जाल ऐसा फैला है कि अधिकांश लोग जाल में ही फँसे हुए हैं । ज्ञान में माया से मुक्ति है । जो मायाजाल से निकलना चाहता है, उसको मार्गदर्शन करने के लिए गुरु प्रकट होता है, जिसमें बोधिसत्ववृत्ति पक्का होता है, अज्ञान से निकलने और दूसरों को निकालने के लिए आवश्यक गुण ज्ञान, और सिद्धियाँ भी होतें है । शिष्यों में भी बोधिसत्ववृत्ति होना चाहिए । भले ही वृत्ति अधिक विकसित न हुआ हो लेकिन मुमुक्षु, जिज्ञासु, समर्पित और साधक के अन्य गुण होने चाहिए । तभी तो वो मार्ग में निर्बाध रुपमें प्रगति कर पाएगा और अपने गुरु के बोधिसत्व में तालमेल बना पाएगा ।
बोधिसत्ववृत्ति का कड़ी ज्ञान ही है । यदि पूर्वजन्म के ज्ञान साधना हो तो ये वृत्ति जन्म से ही प्रकट होता है । यदि पूर्वजन्म कि साधना नहीं भी हो तो गुरु के सम्पर्क से ये वृत्तिको प्रकट और विकसित किया जा सकता है । ये वृत्ति व्यक्ति को अज्ञान और मान्यताओं में रहकर चुपचाप बैठना नहीं देता । ऐसे व्यक्ति में तत्व, सत्य और अस्तित्व के बारेमें अनेक जिज्ञासा होतें है । इन जिज्ञासाओं को मिटाने के लिए मार्ग और गुरु के खोज में लग जाता है । जब गुरु मिलता है और आत्मज्ञान दिया जाता है; तब वो साधना शुरु करता है, चेतना में रहता है, ज्ञान को स्थापित करता है । जब ज्ञान स्थापित होता है तब अनेक सिद्धियाँ प्रकट होने लगेंगे, और उसने बुद्धत्व प्राप्त कर लेता है । जब भीतर से ज्ञान प्रकाशित होता है, तब आसपास के वातावरण भी ज्ञानमय हो जाता है । वृत्तिका स्वभाव ही चक्रीय और निरन्तर है । इसीलिए अनेक बोधिसत्ववृत्ति प्रकट होगें, ज्ञान प्राप्त करके दूसरों को बाँटने में लग जाएँगें ।
बोधिसत्व व्यक्ति के बुद्धि और चेतना के स्तर पर निर्भर होता है । जितना तेज बुद्धि और स्थापित चेतना है; उतनी ही गति और मात्रा में बोधिसत्ववृत्ति का आवृत्ति चलता है । इसी से प्रगति धीमी या तेज निर्धारण होता है । ये वृत्ति जितना दोहोराता है उतना फैलता है; यानि कि जितना बाँटेगें उतना प्रकाशमय हो जाता है । क्यूकिँ यहाँ पर समग्र गुरुक्षेत्रका बोधिसत्ववृत्ति मिलकर ज्ञान के प्रकाश फैलाता है ।
जहाँ अज्ञानका अन्धकार अधिक हो, वहाँ का अज्ञान नाश करने के लिए बोधिसत्व प्रकट होता है और अपने ज्ञानवृत्ति के प्रभाव से असंख्य बोधिसत्ववृत्तियोंको अन्धकार से प्रकाश के ओर ले जाता है । गीता में भगवान श्री कृष्ण ने “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवती भारत, अभ्युत्थानम् अधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्” कहने का तात्पर्य भी यही है । जहाँ बोधिसत्ववृत्ति पहले से ही मौजूद है और मुक्तिका मार्ग खोज रहा है; वहाँ गुरु यानि बोधिसत्व को ज्ञान के प्रकाश फैलाने में सरल होता है, समाज का प्रगति जल्दी होता है, और अधिक जिज्ञासुओं नें लाभ उठा सकते हैं । इस प्रकार से बोधिसत्ववृत्ति हर अन्धकार मिटाने के लिए हर सम्भव उपाय के साथ तत्पर रहता है ।
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